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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

घट रामायण / ४३
कई साधु इतने तत्त्वों का जब ज्ञान कर लेता है तो वह काल के फंदे में नहीं पड़ता। आगे जो उसके
अनुपम भेदों का वर्णन करेगा-वह भ्रमर गुफा में ज्योति स्वरूप समझा जाएगा। मैं अब छः भ्रमर
गुफाओं का वर्णन करता हुआ उनके भिन्न-भिन्न भेदों को बता रहा हूँ॥
॥ भँवर गुफा के नाम ॥
परथम बेहद नाम सुनइया। भँवर गुफा बिच बास करइया ॥
दूसर नाम निरखि निरधारी। तीसर नाम मुक्ति पद प्यारी ॥
चौथा नाम उनमुनी स्यामा। सोइ सब जोगिन का बिसरामा ॥
पंचम नाम हरी हद सूना। छठवाँ चदर अधर पर धूना ॥
छई छर भँवर गुफा दरसाई। तुलसी नैन नजरि में आई ॥
आगे भाखों भेद निहारा। छै त्रिकुटी घट माहिं सिहारा ॥
जा कौ नाम ठाम दरसाऊँ। भिनि भिनि भाव भेद समझाऊँ ॥
अर्थ-भ्रमर गुफा का प्रथम नाम 'बेहद' सुना गया है-वह भ्रमर गुफा के बीच निवास करता है।
दूसरा भेद 'नरधारी' नाम से समझो। तीसरा नाम 'प्रिय' मुक्तिपद है। चौथा नाम भेद श्यामल उनमनी है-
वही सम्पूर्ण योगियों के लिए विश्राम स्वरूप है। पाँचवाँ नाम ( भेद ) हरीहद शून्य है। छठवाँ 'चंदर' है-
जिसका स्थल ओष्ठ है। छठवाँ भँवर गुफा में 'छर' के रूप में दिखाई पड़ता है-तुलसी साहब कहते हैं
कि वह निरन्तर दृष्टि में आती रहती है।
घट के भीतर स्थित छः त्रिकुटियों का वर्णन करता हूँ आगे मैं उनके भेदों को देखकर वर्णन कर
रहा हूँ। मैं इन त्रिकुटियों का नाम तथा स्थान बताऊँगा और उनके भिन्न-भिन्न भाव भेदों को भी
समझाऊँगा ॥
॥ त्रिकुटी के नाम - चौपाई ॥
प्रथम कहौं रुकमन्दर नाऊँ। काल कौ चक्र फिरै तेहि ठाऊँ ॥
दूसर बली बिजै बल सोई। षटदल कँवल फूल जहँ होई ॥
तीसर नाम मुकर मनि जोई। मन बुधि निद्रा से सुख सोई ॥
चौथा नाम सब्दनी होई। नौ नाड़ी सुपने दे सोई ॥
पंचम नाम गोमती गाऊँ। अठदल कँवल फूल तेहि ठाऊँ ॥
हंसमुखी छठवीं कर नामा। हंस बिहंग बसै तेहि ठामा ॥
अर्थ-प्रथम त्रिकुटी का नाम एकमन्दर है। उस स्थान पर काल चक्र विचरण करता रहता है। दूसरे
का नाम बली है जो अपने विजय बल से युक्त है तथा उसके पास ही घट दल कमल पुष्प स्थित
है ॥ १॥
तीसरे का नाम 'मुकुरमणि' है, जहाँ मन और बुद्धि निद्रा में सुखपूर्वक सोते रहते हैं। चौथी त्रिकुटी
का नाम शब्दनी है-वह नौ नाड़ियों को स्वप्न में रखकर सोती रहती है। ॥२॥
पाँचवाँ नाम गोमती है, उस स्थान पर अष्ट दल कमल फूल के रहता है। छठें का नाम हंस मुखी
है-उस स्थान पर 'हंस पक्षी' निवास करते हैं ॥ ३ ॥
॥ दोहा ॥
छै त्रिकुटी बिधि बिध कही, दृग निज नैन निहार।
तुलसिदास घट भीतरे, देखि कही सब सार ॥