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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

४६ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
कहों अब बिधि बरतंत, संत कहनि मन मत गही।
लही जो तुलसी अंत, ज्ञान चक्र चित चेति कै ॥
अर्थ-मैं अब विधिपूर्वक समस्त वृतान्त ( बरतंत ) का वर्णन करता हूँ क्योंकि मेरी मति 'सत' कहने
के प्रति प्रतिबद्ध हुई है। चित्त में ज्ञान चक्र को समझकर तुलसी साहब ने जो कुछ कहा है, वही उनकी
परमार्थ ज्ञान की प्राप्ति का अन्तिम सत्य है ॥
॥ चौपाई ॥
अब सोई बिधि बरतंत सुनाऊँ। राह रीति मन मत दरसाऊँ ॥
मन मत चक्र घेर के मारा। ज्ञान चक्र जब जीव सम्हारा ॥
काल मारि मुख फेरि चलावै। काल भागि त्रिकुटी में आवै ॥
जीव सब्द गहि खेदि चलाई। अधर कँवल बिच काल छिपाई ॥
भर्म चक्र जब काल चलावा। भरमित जीव भरम जब आवा ॥
संसय सोग जीव उपजाई। साहेब सब्द बिसरि गयो भाई ॥
भगिया जीव गगन मग माहीं। यह कोड काल गहैगो नाहीं ॥
जीव वहाँ से निसरि पसाई। नाल बंक में जाइ समाई ॥
बंकै नाल काल गति लइया। जीव भागि आगे चलि गइया ॥
परम कँवल में जीव छिपाना। वहाँ काल जो जाइ समाना ॥
सोला गगन जीव फिरि आई। तहाँ काल पुनि खेदत धाई ॥
अर्थ-अब मैं उसी प्रकार वृत्तान्त सुनाता हूँ तथा मन की गति के अनुसार मार्ग तथा इस साधना की
प्रणाली का वर्णन करता हूँ। जब से जीव ने ज्ञान चक्र को सम्भाला, तभी से अज्ञान को (मन गति) को
चक्र से मार कर नष्ट कर दिया ॥
काल को मार कर पुनः मुख दूसरी तरफ करके उस चक्र को चलाया गया। भयवश काल भाग
कर त्रिकुटी में छिप गया ॥ जीव ( अज्ञानी जीव ) को पकड़कर पुनः उस पर चलाया गया। अधर कमल
के बीच पुनः काल जाकर छिप गया ॥
जब काल ने भ्रम चक्र चलाया-भ्रमित जीव, उस समय भ्रमवणित हो उठा। जीव में उस समय
संशय योग उत्पन्न हुआ और वह जीव साहेब ( परमात्मा ) शब्द भूल गया ॥
जीव भाग कर पुनः गगन में गाया और बोला इस काल को कोई नियंत्रित करेगा (गहौंगो) या
नहीं। जीव वहाँ से भागा और नाल बंक में जाकर घुस गया ॥
काल की गति ने बंकनाल को भी वश में ले लिया फलतः जीव भाग कर आगे चला गया। परम
कमल में जीव जाकर छिप बैठा-वहाँ भी काल जाकर समा गया। सोलह आकाशों में जाकर जीव
भागकर लौट आया और वह जहाँ-जहाँ गया, वहाँ वहाँ काल उसे खदेड़ता रहा ॥
॥ सोरठा ॥
सोला गगन मँझार, जीव काल खेदत फिरै।
बूझै बूझनहार, घट निहारि अंदर लखै ॥