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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 40

घट रामायण / ४७
अर्थ—सोलह आकाशों के मध्य में जीव को काल खदेड़ता फिरता रहा। अपने घट के अन्दर देखो,
इसे समझो, कोई बूझने वाला ही इसे बूझता है॥
॥ चौपाई ॥
वहाँ जीव कोइ बचन न पावै। रहस नाल जिव पैठि समावै॥
वहँ कहुँ काल सुनन जब पावै। समाधान होइ काल सिधावै॥
रहस नाल से भागि पराई। भँवर गुफा में जाइ छिपाई॥
आपै काल ध्यान धर कीन्हा। अपनी सुरति गुफा में दीन्हा॥
सूरति जीव काल पर आवै। काल आप पर ध्यान लगावै॥
अपनी सुरति गुफा में लावै। भीतर सुरति जीव समावै॥
अपना घर बिधि काल न पावै। पीछे काल तहाँ लगि धावै॥
तब लग काल जीव को घेरा। घर सुधि बिन जो फिरै अनेरा॥
धनि वे जीव आप को जानी। उलटि काल को बाँधै तानी॥
जानै जीव जो नाम सहाई। नाम निअच्छर जाइ समाई॥
पुरुष नाम जीव लखि पावै। जीव नाम लखि ब्रह्म कहावै॥
नाम छाँड़ि जग जीव कहाये। भरम भरम भौसागर आये॥
अभि अंतर जिव पैठे जाई। राई के दस भाग समाई॥
अंतर काल बड़ा मग लागा। एक राई का दसवाँ भागा॥
अंतर बड़ा जीव को सोका। काल की आँखि तीनों लोका॥
जीव की आँखि पुरुष को देखा। काल दृष्टि जब होय बिसेषा॥
आँखी जीव चकोर समाना। पाँचों करै दृष्टि जस बाना॥
धरती दृष्टि प्रकिरती उद्गा। दृष्टि अकास करै नर मुद्रा॥
तत्त पाँच पाचौं हैं नारी। बचै नाम निज सुरति बिचारी॥
अर्थ—वहाँ कोई जीव बचने नहीं पाता। जीव रहस्य नाल में प्रवेश करके उसी में समा जाता
(समावै) है। जब वहाँ स्थित जीव के विषय में सुन पाता है तो सावधान होकर काल चल देता है॥
जीव रहस नाल से दौड़ भागता है और भ्रमर गुफा में जाकर छिप जाता है तब काल स्वयं का ही
ध्यान धारण करके अपनी सुरति गुफा में देता है॥
सूरति समाधि में जीव भी काल पर आता है और काल भी स्वयं पर ध्यान लगाए हुए हैं। काल
अपनी सुरति गुफा में लगाए हुए हैं और गुफा के भीतर जीव सुरति ध्यान में खो गया है। विधाता का
काल अपना घर यहाँ नहीं पाता—पीछे-पीछे यद्यपि काल यहाँ तक दौड़ा (आया है)॥
तभी तक काल जीव को घेरता है—जब तक अपने घर (भ्रमर गुफा) की याद के बिना अकेला
(अनेक) घूमता रहता है। वह जीव धन्य है—जिसने अपने को जान लिया है, वह जानने वाला जीव
उलट कर काल को ही कस कर बाँध लेता है॥
अपनी सहायता करने वाले का नाम जीव जब जान लेता है, तब वह उसी अक्षरविहीन नाम में
आकर समा जाता है। मनुष्य नाम से जीव की प्रतीति होती है—जीव ब्रह्म का नाम जानकर ब्रह्म
कहलाता है॥