घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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अर्थ-जैसा विधिपूर्वक बताया गया है, उस प्रकार की छः त्रिकुटियों का वर्णन अपने नेत्रों से
देखकर किया है। तुलसी साहब कहते हैं कि इन सबके सार तत्त्वों को इस पिंड के भीतर देखकर
उनका वर्णन करते हैं॥
॥ चौपाई ॥
त्रिकुटी छई नाम निज गाया। तुलसी भिन भिन भेद लखाया॥
जोगी जीत रीत कोई जानै। त्रिकुटी चढ़ै भेद पहिचाने॥
आगे सतमत द्वार लखाऊँ। सुकिरत सेत द्वार दरसाऊँ॥
जौन दिसा सुकिरत है भाई। तौन दिसा सत द्वार लखाई॥
अष्ट कँवल दल दरपन माई। नाभि सेत नल मध के ठाई॥
नल नागिनि करि बैठी भेषा। जीव भखन वो करै अनेका॥
पुनि सरवर तेहि पास बिराजै। ता पर बैठि सभा बहु गाजै॥
तेहि सरवर जल नीर अपारा। जीव उतरि कोइ जाइ न पारा॥
कौन दिसा नागिनि रस रूखा। कौन दिशा सरवर रहै सूखा॥
अभि अंतर सुकिरत सत बासा। करिया कँवल में काल निवास॥
अष्ट कँवल नागिनि रस रूखा। सरवर बिरह कँवल में सूखा॥
यह सत रीति द्वार दरसाई। अब मैं कहौं सुनो तुम भाई॥
आगे तरवर भेद अपारा। चारि बिरछ पर सुरति सम्हारा॥
जीव पैठि सोइ मारग पावै। गगन कँवल भीतर चलि आवै॥
उलटै चक्र सुन्न में धावै। सिध साधक जहँ ध्यान लगावै॥
बिरछ चारि सोइ कहौं बुझाई। जाकर नाम ठाम गति गाई॥
जहँवाँ कागभसुण्ड कहु काला। बट पीपर पाकरी रसाला॥
कागभसुण्ड काया के माईं। तन मन बिरछ संत समझाई॥
बिरछा ऊपर तालबिराजै। निरखत काल कला सब भाजै॥
अर्थ-मैंने अपनी छः त्रिकुटियों के नामों का वर्णन किया है और उनके भिन्न-भिन्न भेदों को
दिखाया। कोई योगी ही इस संसार की जीत की रीति को जानता है, तो वही त्रिकुटी पर चढ़कर उनके
भेदों को समझेगा॥
आगे सतमत का द्वार दिखाऊँगा-ये सुकीर्ति के द्वार हैं। हे भाई जिस दिशा में जिस दिशा में वह
सुकीर्ति है-उसी दिशा में 'सत' द्वार हैं॥
जहाँ अष्ट दल कमल दर्पण की भाँति हैं-वह स्थान नाभि के श्वेत नाम से मध्य में है। उसी नाल में
नागिन वेषबदल कर बैठी है-जो अनेक जीवों का भक्षण कर लेती है॥
पुनः उसके पास एक सरोवर है-वहाँ बैठकर आत्मनिष्ठ अनेक सभाएँ करता है। उस सरोवर का
जल अगाध है-उसको पार करके कोई जीव जा नहीं सकता॥
किस दिशा में नागिन रस से रुष्ट रहती है, किस दिशा में सरोवर सूखा रहता है। उस सरोवर के
मध्य में सुकीर्ति धर्मी सत् निवास करते हैं। काले कमल में यहाँ काल निवास करता है॥