घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण-भाग १ / ४१
३८. सतसूक पवन ५४. उपमीत पवन ७०. पदमूर पवन
३९. बीज बन्द पवन ५५. दरतीत पवन ७१. करकीत पवन
४०. बीज बन्द पवन ५६. उपमार पवन ७२. धरजीत पवन
४१. अज सार पवन ५७. अभियार पवन ७३. मनमास पवन
४२. नितनाल पवन ५८. अतरीत पवन ७४. सरसूत पवन
४३. शब्दाल पवन ५९. ताइंत पवन ७५. अवधूत पवन
४४. गिरनाल पवन ६०. सुषमंद पवन ७६. आकाश पवन
४५. शुषपाल पवन ६१. असमद पवन ७७. जगबास पवन
४६. रूपान पवन ६२. सोराठ पवन ७८. सुनसूत पवन
४७. विधान पवन ६३. लैघाद पवन ७९. मनभूत पवन
४८. सुभपती पवन ६४. करिहाट पवन ८०. निरधार पवन
४९. छेरती पवन ६५. करुनाट पवन ८१. सतसार पवन
५०. उतरंग पवन ६६. बैराग पवन ८२. आसोग पवन
५१. तितरंत पवन ६७. लैजार पवन ८३. तन भोग पवन
५२. पुरवो पवन ६८. लैलार पवन ८४. जग जोग पवन
५३. सरभो पवन ६९. नदमूर पवन ८५. मन रोग पवन
।। चौपाई ।।
पवन पचासी भाखि सुनाई। कोइ साधू घट भीतर पाई॥
घट में पवन पचासी जाना। निरखा नैन सैन धरि ध्याना॥
साधु आदि कोई करै बिबेका। सोइ निज सार पवन का लेखा॥
तुलसी जिन जिन नैन निहारा। पवन पचासी बरनि सिहारा॥
जिन जिन घट की सैल सँवारा। पवन भवन सोइ गवन गुहारा॥
आगे सुनहु गगन का लेखा। सोला गगन पिंड में देखा॥
जिन जिन सैल सुरति से कीन्हा। सोला गगन भाखितेहि दीन्हा॥
जो सोला का भेद बतावै। सोह सज्जन सत साध कहावै॥
भिन्न भिन्न सोला बिधि भाखों। गगन नाम निज एक न राखौं॥
बिधि बिधि नाम कहौं समझाई। चित दे सुनौं गगन कर नाई॥
अर्थ-पचासी पवनों को कहकर बताया है। इसे कोई कोई साधु ही घट के भीतर प्राप्त करता है घट
पवनों को संख्या पचासी समझो। नेत्र दृष्टि पर ध्यान लगा कर ही इसे मैंने देखा या समझा था॥
कोई विलक्षण साधु ही इसका ज्ञान करता है-वही अपनी साधना के सार तत्त्व पवन का लेखा-
जोखा भी करता है। तुलसी साहब कहते हैं कि जिन-जिन इसे नेत्रों से देखा है-पचासी पवनों का वर्णन
करके वह आनन्दित होता है॥
जिस-जिस पिंड का पर्वत शिखर सँवारा गया है-उसी-उसी ने वायु स्थल के गमन को पुकारा है-
(वर्णन किया है) आगे आकाश का वर्णन देखो-मैंने सोलह आकाश इसी पिंड में देखा है॥१३॥