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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

१३६ / घट रामायण
सब चलि आये कुटी के पासा। जब तुलसी मन कियौ हुलासा ॥
उठि के चरन गहे सब केरे। कीन्ही दया दीन तन हेरे ॥
बाम्हन पंडित धर्मा जैनी। सेख तकी से कीन्ही सैनी ॥
नैनू पंडित सैन सँवारा। धर्मा हिये उठै जस झारा ॥
यह दोनों मिलि मता बिचारी। सेख तकी को आगे डारी ॥
नैनू नोक टोक इक झारा। यह इनके हैं गुरू बिचारा ॥
पूछे भेद कहैं निरवारा। इन कस भाखा झूठ पसारा ॥
अर्थ-शेख तकी और पंडित एक हो गए और धर्मा ने धर्म की टेक बाँध ली। ये तीनों तुलसी
साहब के पास गए इनके हृदय उद्विग्न थे और बाहें चढ़ी हुई थीं।। उनके साथ और अनेक मूर्ख जन थे-
कोई सीधे चलता था को कोई टेढ़े चलता था। हृदय अहीर के साथ सब एक हो चले और वहाँ आए,
जहाँ तुलसी ने अपनी कुटी सँवार रखी थी॥
हृदय अहीर के साथ बड़ी भीड़ थी, तब तुलसी साहब ने मन-ही-मन विचार किया। सब उनकी
कुटी के पास चलकर आए तब तुलसी ने मन में आनन्द प्रगट किया।। उन्होंने उठकर सबके चरणों में
प्रणाम किया (स्पर्श किया) और कहा कि आप सब इस दीन की ओर देखकर दया करें॥
ब्राह्मण, पंडित, जैनी धर्मा और शेख तकी की ओर देखा। नैनू पंडित ने नेत्रों से इशारा किया और
धर्मा जैनी के हृदय में आग की लपट जैसी उठ पड़ीं॥ उन दोनों ने मन में विचार करके शेख तकी को
आगे कर दिया।
नैनू पंडित ने पहले नोक झोंक शुरू कर दी-ये बेचार के इनके (हृदय अहीर के) गुरु हैं। इनसे
ज्ञान के भेदों की बात आप पूछिये ये इसका निराकरण करेंगे और आप इनसे पूछे कि इन्होंने इस प्रकार
असत्य का प्रसार क्यों किया है।
॥ सोरठा ॥
हिरदै कहै निहोर, स्वामी तुलसी विधि सुनौ।
मैं कछु कही न और, ये अबूझ बूझी नहीं ॥
अर्थ-हृदय अहीर ने सम्बोधित करके कहा कि हे स्वामी तुलसी साहब? इसे विधिपूर्वक सुनें-मैंने
अपनी तरफ से कोई नई बात नहीं कही (आपकी ही बातें बताई) किन्तु उस अबूझ वाणी को ये सब
समझ नहीं पाए॥
॥ चौपाई ॥
हिरदे कहै सुनौ हो स्वामी। मैं कछु कही रीति गति ज्ञानी ॥
नैनू पंडित कहै बिचारी। इन सब ज्ञान कही गति न्यारी ॥
इन सब धर्म कर्म जग पेला। अस कस ज्ञान कहै यह चेला ॥
इन सब बेद कितेब उठावा। जौगी जैन नहीं ठहरावा ॥
और अनेक बात नहिं मानै। अस कह मन्त्र सुनायौ कानै ॥
तब तुलसी सुनि आदर कीन्हा। प्रीति भाव उठि आसन दीन्हा ॥
दीन बिधी सब अपनी गाई। चरन परसि कै सीस चढ़ाई ॥
मैं अनाथ हौँ तुम्हरौ बारा। छिमा करौ मैं दास तुम्हारा ॥

घट रामायण / १३७
मैं औगुन की खानि अपारा। तुम गुन सीतल अपरम्पारा॥
तुम पंडित मैं अपढ़ अयाना। करौ दया तुम कृपानिधाना॥
ये हिरदे कछु ज्ञान न पावा। औगुन ज्ञान जो तुम्हें सुनावा॥
सीतल भये धीर तब आई। सुनि अस बचन बैठि भुँइ माई॥
अर्थ-हृदय अहीर ने कहा, हे स्वामी सुनें, मैंने ज्ञानियों की रीति के अनुसार ही कुछ बातें कही हैं।
नैनू पंडित ने विचार कर कहा कि इन सबने ज्ञान की विलक्षण गति कही है। इस व्यक्ति ने तो धर्म, कर्म
को संसार से नष्ट कर दिया- यह कैसा ज्ञान है, जिसे आपका यह शिष्य (हृदय अहीर) कहता है। इसने
सम्पूर्ण वेदों, पुराणों आदि को निरर्थक बताया है तथा योगी एवं जैनियों का अस्तित्व ही नकार दिया
है॥ यह धर्म की अनेक बातों को नहीं मानता ऐसा कहकर उन्हें (हृदय अहीर का) ज्ञानमंत्र सुनाया॥
यह सुनकर, तुलसी साहब ने नैनू पंडित का अत्यन्त आदर किया और प्रीतिभाव से उठकर उन्हें
बैठने के लिए आसन दिया। उन्होंने नैनू पंडित से अपनी दीनता का वर्णन किया और उनके चरणों का
स्पर्श करके उसे अपने सिर पर रख लिया।
मैं तो अनाथ हूँ-मुझे आपका ही आधार है-आप क्षमा करें मैं तो आपका दास हूँ॥ मैं अपार
अवगुणों का भंडार हूँ और अपरम्पार शीतल गुणों के (भंडार) हो। आप पंडित ज्ञानी हैं और मैं अपढ़
और अज्ञानी हूँ-आप कृपा निधान हैं तुम मुझपर दया करों। इस हृदय ने किसी भी प्रकार के ज्ञान को
नही प्राप्त किया है जो इसने आपको सुनाया है वह पूर्णतः दोष भरा (अवगुण) ज्ञान है॥
इसे सुनकर वे लोग शीतल (शान्त) हुए और उनमें धैर्य (सहजता) आया और इन बातों को
सुनकर वे सभी भूमि पर बैठ गए॥
॥ सोरठा ॥
तकी तुरक कह बात तुलसी सुनियो भेद अब।
सब हृदय विख्यात जो गुनाह इनने कियो॥
अर्थ-तुर्क तकी ने यह बात कही कि हे तुलसी साहब! सारा रहस्य अब सुनो, जो पाप इस हृदय
अहीर ने किया है, वह सबको ज्ञात है।
॥ चौपाई ॥
सेख तकी जब बचन सुनाई। तुलसी सुनियौ चित्त लगाई॥
हिरदे कुफर बात सब कीन्हा। रोजा निमाज मेटि सब दीन्हा॥
और कितेब कुरान उठाये। खुदा नबी कर खोज मिटाये॥
अर्थ-शेख तकी ने जब यह बात सुनाई तो तुलसी ने ध्यान देकर बात सुनी। हृदय अहीर ने कुफ्र की
बातें की तथा रोजा तथा नमाज़ आदि सबको झूठा कह दिया। उन्होंने धार्मिक पुस्तकों और कुरान को
उठा (समाप्त घोषित कर) दिया और खुदा एवं नबी (ईश्वर के दूत) का अस्तित्व मिटा डाला॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तकी विचार, सब सँवारि विधि मैं कहौं।
कहुँ कुरान निरधार, जो किताब भाखी सबै॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने सब को सँवार कर विधिपूर्वक बातें कही हैं। कहीं कुरान
निराधार थोड़े है-उसका किताब में वर्णन तो सभी ने किया है॥

१३८ / घट रामायण
॥ सम्बाद साथ तकी मियाँ के ॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी कहै तकी सों बाता। या का तकी सुनौ बिख्याता ॥
चौधा तबक कुरान बताया। और चौबीस पीर पुनि गावाँ ॥
फजल मुहम्मद कीन्ह जहाना। आब तब पट अबर निदाना ॥
सुनौ तकी कहुँ खोज न पावै। कहा किताब ज्वाब नहिं आवै ॥
काजी मुल्ला पढ़े कुराना। खुदा खुदा कहे खोज न जाना ॥
कोलि कितेब देखिये भाई। खुदा आदि कहौ कहँ से आई ॥
खुद खुदाइ कर कहै कुराना। खुद खुदाई का मरम न जाना ॥
ये खुदाइ ना कहिये भाई। ये तौ खुद खुदाइ की छाँहीं ॥
जहँ खुदाइ रहता है साँईं। उस खुदाइ का अंत न पाई ॥
तकी खुदा तुम एक बतावो। खुद खुदाइ का खोज लगावो ॥
अर्थ—तुलसीदास शेख तकी से अपनी बात कहते हैं, हे शेख तकी! इस विख्यात तथ्य को आप सुनें।
कुरान ने चौदह तबक (आधार स्थल) बताया है और फिर चौबीस पीरों के विषय में गाया है।
मुहम्मद साहब की कृपा ने यह सृष्टि बनाई, सूर्य तथा आकाश उन्हीं के बनाए हैं। भिन्न-भिन्न
चौदह तबक (आधार स्थल) बतलाए गए हैं और उनके अलग-अलग पीर भी दिखाए गए हैं॥
किस तबक में किस नबी (ईश्वर के दूत) का निवास है। हे शेख तकी उस ईमान हक्क के विषय
में कहिये ॥
जहाँ वह स्वामी खुदा रहता है, उस खुदा का कोई अन्त नहीं पाता। हे तकी! तुम खुदा को एक बता
रहे हों और स्वयं उस खुदा की खोज लगाओ।
अल्लाह ने अपने मुख एवं जुबान से जो कुछ कहा उससे किताब कुरान (धर्मग्रन्थ) बना। भाई
पैगम्बर ने यह स्पष्ट किया कि सारा संसार उसकी खिलकत (सृष्टि) है। ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तकी तलास, खुदा बास कहु कहँ हता।
नहिं जब जिमीं अकास, कोड़ किताब स्वाँसा नहीं ॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि हे तकी खोजो, कि खुदा की निवास स्थली कहाँ हैं। इस समय
वह कहाँ था, जब कोई धर्म ग्रन्थ नहीं था, न पृथ्वी थी न आकाश था और न वायु थी।
॥ दोहा ॥
मंसूरमियाँ पश्तो कहै तकी बूझ दिल माहँ।
खुद खुदाइ की राह का खुदा खोज नहिं पाइ ॥
अर्थ—मंसूर मियाँ पश्तों में यह बात समझाते हैं तू इसे दिल से समझो। स्वयं खुदा भी खुदा की तरह
की खोज नहीं कर पाता ॥

घट रामायण / १३९
॥ तुलसी साहब बाच ॥
॥ दोहा ॥
तकी तोल जाना नहीं, कहौ कुरान की बात।
दिल दरियाप्त अपने करो, जो कुरान बिख्यात ॥ १ ॥
खुदा चून बेचून है, अस अस कहत कुरान।
बिन जुबान अल्ला मियाँ, कस कस किया बखान ॥ २ ॥
अल्ला अलिफ जुबान, बिना बदन जाहिर नहीं।
जुबाँ बदन के माहिं, तौ बेचूँ कहना नहीं ॥ ३ ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं हे शेख तकी उस निर्णय को जानते नहीं और कुरान की बातें करते हो।
जो कुरान में विख्यात (सुप्रसिद्ध) है, उस तत्त्व की खोज अपने दिल में करो॥ १ ॥
ऐसा कुरान कैसे कह सकता है-अल्ला मियाँ ने बिना जुबान के ईश्वर (खुदा) स्वयं कुछ कह
सुन नहीं सकता।
कैसा-कैसा वर्णन कर दिया है, यह समझ में नहीं आता। कैसा ऐसा कैसा कर दिया है, समझ में
नहीं आता॥ २ ॥
अलिफ अल्ला की वाणी बिन मुख के कैसे प्रकाश में आई-अगर मुख में जुबान नहीं है तो कहने
का क्या आधार है॥ ३ ॥
॥ चौपाई ॥
तकी मियाँ हक बोल सुनावौ। अल्ला तौ बेचून बतावौ॥
उनके बदन जुवाँ नहिं भाई। कैसे कितेब कुरान बनाई॥
कागद स्याही कस लिख मारा। बिन जुबान कैसे बिस्तारा॥
अल्ला मियाँ कितेब बनाई। कहौ जुबाँ बिन कैसे गाई॥
ये तौ दिल बिच साँच न आवै। तुलसी तकी बोल नहिं भावै॥
बिन जुबान मुख कहा कुराना। अल्ला के नहिं बदन जुबाना॥
चूँ बेचून नमून न ज्वाबा। सुनौ तकी म्याँ कहै किताबा॥
वहि कितेब कह खुदा जुबाना। अल्ला मुख से भये कुराना॥
जो जुबान नहिं उनके भाई। तौ कस कहे कुरान बनाई॥
या की तकी तोल बतलावौ। दिल में समझ बूझ समझावौ॥
दिल और रूह राह बतलैयै। तब कुरान का गाना गैयै॥
रूह रकान असमान ठिकाना। केहि बिधि गई राह पहिचाना॥
सो घर का म्याँ भेद बतावौ। चौधा तबक तोल समझावौ॥
सुनकर तकी तका नहिं बोला। मुख भया बंद जुबाँ नहिं खोला॥
तुलसी कहै कहौ कस भाई। जा से दिल बिच होइ निसाई॥
सुनकर तकी ज्वाब अस दीन्हा। मुरसिद मियाँ मरम हम चीन्हा॥

१४० / घट रामायण
तुलसी तकी दीन जब देखा। तब भाखा बिधि भेद बिसेखा॥
साँची महजित तन को जाना। जा में चौधा तबक समाना॥
मक्का भिस्त हज्ज येहि माई। मुल्ला काजी राह न पाई॥
मुहम्मद नूर जानि सब केरा। दोजख भिस्त में किया बसेरा॥
नूर नबी ने सब का कीन्हा। तुम हलाल बकरी कस कीन्हा॥
गुनहगार दोजख की रीती। करौ खून ये बहुत अनीती॥
जो महजित उन आप बनाई। सो हलाल करि कै तुम खाई॥
मिट्टी महजित कबर बनाई। झूठा हक ईमान बताई॥
साँची महजित तन मन साईं। खिलकत खुदा खलक के माईं॥
नूर नबी सब माहिं बिराजा। जाकी हर दम उठै अवाजा॥
नूर नबी सब माहिं बिचारा। तब दोजख से होईहै न्यारा॥
नासुत मलकूत जबरुत भाई। लाहुत राह नबी की पाई॥
लामुकाम रब साहिब साँई। वाको खोज भिस्त तब पाई॥
सेख तकी तक थक रहे भाई। ज्वाब स्वाल मुख से नहिं आई॥
अर्थ-हे शेख मियाँ। हक के विषय में बोलकर बताओ। अल्ला मियाँ को बेचून कहते हो। उनके न
मुख है, न जुबान है-उन्होंने कितेब (धर्मग्रन्थ) और कुरान कैसे बनाया॥
उन्होंने कागज पर स्याही से कैसे लिख डाला, और बिना जुबान के उसका कैसे वर्णन करके
विस्तार किया। यदि अल्ला मियाँ ने कितेब (धर्मग्रन्थ) बनाया है तो बताओ कि बिन जुबान के कैसे
गाया॥
यह बात तो दिल में सच्ची तरह से उतरती नहीं-तुलसी साहब कहते हैं किमेरे इस प्रश्न पर तकी
मियाँ बोल नहीं पा रहे थे। यदि अल्ला मियाँ के न मुख है, न जुबान तो बिना जुबान के उन्होंने कुरान
कैसे कहा?
चून, बेचून और नमून का कोई जवाब नहीं है। हे तकी मियाँ, सुनो, यह किताबें बताती हैं। उसी
कितेब (धर्मग्रन्थ) को खुदा की जुबान कहा जाता है और यह भी कहा जाता है कि अल्ला मियाँ के
मुख से कुरान निकला था। हे भाई! यदि उनके पास जुबान नहीं है, तो उन्होंने कुरान कैसे कहा था। हे
तकी मियाँ! इसका रहस्य समझाइये।
दिल और आला की राह भी बतलाइये तब समझकर कुरान की आयतें गायें। आत्मा रकान
(नियंत्रक) आसमान पर रहती है। यह किस तरह अपने राह से आसमान तक गई क्या आपने इसे जाना
है? हे मियाँ! उस घर का आप भेद बताइये चौदह तबकों (पृथ्वी और सृष्टि) का तोल (मानदण्ड) भी
बतलाएँ॥
इसे सुनकर, तकी ने तुलसी साहब को देखा किन्तु बोल नहीं सके-मुँह बन्द हो उठा, जुबान नहीं
खुली। तुलसी साहब ने प्रश्न किया कि हे भाई! कुछ कहो न, जिससे दिल को कुछ शान्ति मिल जाएँ।
उसे सुनकर तकी ने इस प्रकार जबाब दिया। हे मियाँ इस मुरशीद (पथ प्रदर्शक) ने आपके रहस्य को
पहचान किया है-तुलसी साहब ने जब तकी मियाँ को असहाय की तरह देखा तब उन्होंने विशेष रूप
की विधियों का वर्णन किया।
हे मियाँ! इस शरीर को ही सच्ची मस्जिद समझो, इसी में उसके चौदह तबके समाए हुए हैं।
मक्का, हज, स्वर्ग सभी इसी में हैं। इसके भेद की राह मुल्ला काजी आदि नहीं पा सके। सबको

घट रामायण / १४
मुहम्मद साहब ने प्रकाश समझकर स्वर्ग तथा पृथ्वी दोनों पर अपना निवास बनाया। उस नबी (ईश्वर के
दूत) ने सबको नूर दिया फिर तुमने बकरी को उससे अलग समझकर क्यों उसका हलाल किया॥ इस
नरक के ये गुनहगार हैं-तुम रक्तपात करते हो, यह बड़ी अनीति है।
जिस (शरीर रूपी) मस्जिद को ईश्वर ने स्वयं बनाई है, उस (बकरे के शरीर) को हलाल करके
तुम खा जाते हो। तुम झूठे ईमान और अधिकार से प्रेरित मृत (मिट्टी) की शरीर (मस्जिद) को का
बनाते हो।
इस स्वामी की सच्ची मस्जिद यही तन-मन है और उसी के द्वारा खुदा इस संसार के बीच
खिलकत (आनन्दित) है। समस्त नूर एवं नबी उसी में विद्यमान हैं-जब तक ऐसा नहीं समझोगे उस
इस संसार से अलग कहते रहोगे।
नासुत (संसार), मलकूत (देवलोक) जबरूत (स्वर्गलोक) तथा लाहूत (मृत्युलोक) इन
चारों ने यहीं ही नबी (ईश्वर के दूत) की राह पाई थी।
वह स्वामी (मालिक) बिना मुकाम का है (सब जगह है, कोई निश्चित स्थान उसका मुकाम नहीं
है) उसी की खोज से तुम स्वर्ग की खोज पा सकते हो।
इतनी बातें सुनकर मियाँ शेख तकी पूरी तरह से थक रहे और उनके मुख से प्रश्न एवं उत्तर दोनों
नहीं निकल रहे थे॥
॥ पश्तो १ ॥
खोल देखो रे किताबें, आद अव्वल कौन था (मियाँ)।
नहिं जमीं असमान खिलकत, खुद खुदा तब था कहाँ ॥ १॥
कुफल खोले रे कुराना, मूल म्याना भेद का।
था कलम स्याही न कागज, और न था आदम मियाँ ॥ २॥
नहिं मुहम्मद रब न रे जब, नहिं पैगम्बर पीर थे।
नहिं नबी का नाम निसबत, भिश्त दोजख नहिं रचे ॥ ३॥
काजी मुल्ला रे बेहोशो, खोज करो दिलदार का।
मन मुआ मनसूर जब से, आशिक जो चश्मे यार का ॥ ४ ॥
अर्थ-हे मियाँ शास्त्र की पुस्तकों को खोल कर देखो, सबसे पहले कौन था? उस समय न पृथ्वी
थी, न आसमान था तब उस समय खुदा कहाँ था ॥ १ ॥
कुरान के कुफल के (रहस्य) को खोलो, उस मूल म्याना (तत्त्व) का रहस्य क्या था। उस समय
न कलम थी, न स्याही थी, न कागज था, और न कोई मनुष्य था ॥ २ ॥
न मुहम्मद साहब रब (स्वामी) थे, न पैगम्बर और पीर थे, न नबी का निश्वत (अस्तित्व) नाम
था। न स्वर्ग तथा पृथ्वी लोक रचा गया था ॥ ३ ॥
हे ना समझ (बेहोशो) काजी-मुल्ला, उस दिलदार (ईश्वर) की खोज करो-जब से वह मुआ मन
चश्मे यार (सर्वदर्शक ईश्वर का) मंसूर बना ॥ ४ ॥
॥ पश्तो २ ॥
यह खुदा ना है रे कुदरत, खुद खुदा कोइ और है (मियाँ)।
जिन खुदा को तख्त बख्शा, वह सकस कहो कौन है ॥ १ ॥
दिल दिया और रूह रोशन, है हसन तन हुस्न को।

१४२ / घट रामायण
अब तबक चौधा दिये हैं, आदि खुदा को जानिये ॥ २ ॥
कुल जहाँ आलम है कुन से, पट अबर अल्ला से है।
यह हर इक ना कोइ किसी पै, भेद दोस्ती दिल मिलै ॥ ३ ॥
महरम मियाँ मनसूर आशिक, वह है बेचूँ बेनमूँ।
यह किताबों में नहीं है, खुद खुदा का राज है ॥ ४ ॥
अर्थ-हे मियाँ! यह खुदा स्वयं कुदरत (प्रकृति) नहीं है-स्वयं खुदा (ईश्वर) इससे भिन्न कोई
अन्य और है। जिन खुदा को आदि शक्ति ने संसार का अधिक सौंप दिया, बताओ वह शख्स कौन है?
जिसने सबको दिल दिया, आत्मा को प्रकाश दिया, इस शरीर को सौन्दर्य प्रदान किया, जिसने
चौदह तबकों को आकाश के नीचे की धरती को प्रदान किया, उस आदि खुदा को समझें ॥ २ ॥
यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर के मुँह से निकलने वाले शब्दों से सम्बद्ध हैं और इस सारे संसार का
नियंत्रण उसी ईश्वर से ही जुड़ा है यहाँ कोई किसी का नहीं है और दिल मिलने के बाद ही एक दूसरे से
लोग जुड़ जाते हैं।
लोग राज़दार हैं, उनके दिल की बातें मालूम नहीं होतीं और उनका प्रिय भी विलक्षण है और वह
ईश्वर तो बड़ा विलक्षण तथा सारे मन की बातें समझ लेता है। ये बातें किसी धर्मग्रन्थ में नहीं लिखी गई
हैं-यह ईश्वर का प्राकृतिक रहस्य है।
॥ पश्तो ३ ॥
ऐन अन्दर चश्म को रे, खोल देखो कौन है (म्याँ)।
कुल खलक आलम इसम बिच, दिल हिये में खसम है ॥ १ ॥
नहिं किताबों में रे है कुछ, कुल कुरानै छूछ है।
वह पिया आलम की आँखियाँ, और कहीं नहिं पूछ ले ॥ २ ॥
हुस्न है रे हंस जा से, हुस्न तन बिच में रहा।
भूल अपनी आद अव्वल, कट मेरे मन मौज में ॥ ३ ॥
होश गाफिल है रे दोजख, दिल दिया नहिं यार को।
बूझ बिल-आखिर खराबो, इश्क ज्यों मनसूर हो ॥ ४ ॥
अर्थ-हे मियाँ! ऐन (आँखों) के अन्दर अपने चश्म (नेत्र शक्ति) को खोल देखो। सम्पूर्ण सृष्टि में
उसका आलम (संसार) इसके बीच स्थित है और उसके दिल में उसका खसम (स्वामी) स्थित
है॥ २ ॥
हे मियाँ! इन कुरान जैसी किताबों में यह कुछ भी नहीं है और सारी कुरानें इस दृष्टि से खाली पड़ी
हैं॥ यदि कोई (सिद्ध साधक मिल जाए) मिल जाए तो उससे पूछो तो वह बताएगा कि वह ईश्वर
आलम (सृष्टि) की आँखों में ही है॥ २॥
हे हंस (आत्म) जिससे हुस्न (सौन्दर्य) बरकरार है और इस शरीर के बीच में हुश्न (सौन्दर्य)
बरकरार है तू आदि मूल आदिम स्थिति को भूल रहा है और मन की मौज में कटकर रहा है॥ ३॥
हे गाफिल (बेखबर) तुझे (इस नरक का होश नहीं है और उस परमात्मा रूपी मार को अभी तक
अपना दिल नहीं दिया है। अब अन्तिम समय की स्थिति के बारे में समझो-तुम्हारा प्रेम अब कैसे मनसूर
(एक साधक का नाम) हो॥

घट रामायण / १४३
॥ पश्तो ४॥
देख कुछ नहिं इस जहाँ में, सब फना हो जायँगे (मयाँ)।
रहै रब का नाम मरदो, लोग लशकर कूँच है॥ १॥
चार दिन खूबी खलक में, अन्त मरना इक है (मयाँ)।
ज्यों धुएँ का मेघडम्बर, कुल मिटै इक पलक में॥ २॥
तन को देखो आशिको, बस खून चमड़ी हाड़ है।
जब निकल जाबै पवन, तब गांड़ मिट्टी में मियाँ ॥ ३॥
यार अजीजों ने कफन में, बाँध धरा ताबूत पर।
जोरू अम्मा कुल कुटम सब, मनसूर तन मन झूठ हैं (मयाँ) ॥ ४॥
अर्थ--हे तकी मियाँ? देखो इस जगत में कुछ भी स्थायी नहीं है और एक दिन सब कुछ गायब हो
जाएँगे। हे पुरुषों! केवल रब (परमेश्वर) का ही नाम बचेगा और यहाँ सारे मनुष्य और उनके समूह
कूच कर जाएँगे॥ १॥
इस संसार की खूबी केवल चार दिनों तक के लिए ही है, और अन्त में एकमात्र मृत्यु ही शेष है।
जैसे, धुएँ के बादल की घटाएँ एक ही पल में सारी की सारी नष्ट हो उठती हैं॥ २॥
हे प्रेमियों! इस शरीर की तरफ देखो, इसमें केवल इसमें खून है, चमड़ी और हड्डियाँ ही हैं और इस
शरीर से जब वायु निकल जाती है तो हे मियाँ! इसे मिट्टी में गाड़ देते हैं॥ ३॥
मंसूर कहते हैं कि हे यार अपने साथियों में फिर कफन में बाँधकर उसे ताबूत पर रखा और फिर
पत्नी, माँ, परिवार, कुटुम्ब, शरीर, मन आदि सभी झूठे हो उठते हैं॥ ४॥
॥ पश्तो ५ ॥
खोज मुरशिद रे मुरीदो, राह रोशन यार को (मयाँ)।
रूह मेहर मुरशिद के दस्तों, दिल फिजल दिलदार में॥ १॥
रूह चढ़ावौ रे अबर को, हो खबर उस यार को।
लावै जब रब राह चीन्है, फल में लखै इसरार को॥ २॥
कुफल खोले रे अधर के रूह से फोड़ असमान म्याँ।
जान मलकूत नासूत को, जबरूत की कर कदर म्याँ ॥ ३॥
जा मिलै लाहूत रे जब, होश हो हाहूत का।
लौ लगी जो ला के अन्दर, रब मिले मनसूर को॥ ४॥
अर्थ--हे मुरीदों (शिष्यों) मुरशिद (गुरु) की रोशनी भरी राह को खोजो। उस दिलदार की आत्मा
प्रकाश है, मुरशिद (पथ-प्रदर्शक गुरु) के दस्त हैं और उस दिलदार में दिल फजल (कृपा) हैं।
उस परमात्मा के प्रति अपनी आत्मा समर्पित करो जिससे उस साथी को इस बात की खबर हो जाए
और जब उसे रब (परमेश्वर) मार्ग पर ले आए तो वह मार्ग पहचान कर उस इसरार (परमेश्वर) को
पल भर में देख ले॥ २॥
हे शेख तकी मियाँ! वह अन्तरात्मा के कुफर (धर्म के प्रति दुर्भाव) खोले और आत्मा से
शून्याकाश को फोड़ दे॥ तुम इस प्रकार मलकूत (देवलोक) तथा नासूत (मृत्युलोक) को समझो और
जबरूत की इज्जत करो॥ ३॥

१४४ / घट रामायण
जब साधक को हाहूत ( स्वर्गलोक ) का होश हो तब वह लाहूत ( मृत्यु लोक ) परमात्मा से जाकर
मिल जाए। मंसूर साहब कहते हैं कि यदि अल्हा के आनन्द की लौ लगी है, तो निश्चित ही रब
( परमेश्वर ) उसे मिल जाएगा ॥ ॥४॥
॥ दोहा ॥
रब्ब राह लौ लाह में, खुदा खोज दिल माह।
रब खोदाइ से अलग है, खुद खुदाइ तेहि नावँ ॥ १ ॥
बूझौ खोज किताब में, सब कुरान कुल झार।
कर तलास काजी सुनौ, कहि मनसूर पुकार ॥ २ ॥
अर्थ-'रब' की ओर जाने वाले मार्ग पर लौ लगाकर दिल के अन्दर खुदा की खोज करो। यह रब
( परमात्मा ) खुदाई से अलग है और खुदा तो स्वयं उसे के अन्दर हैं ॥ १ ॥
मंसूर पुकार कर कहते हैं कि मेरी बात सुनो ईश्वर को पुस्तकों में खोजो खोजकर समझो, कुरान
में भी अच्छी तरह ठोंकपीट कर समझ लो उसके बाद उसकी इनसे अलग तलाश करो ॥ २ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तकी निहार, कहि पुकार मनसूर ने।
मुरसिद खोज बिचार, बन मुरीद मुरसिद मिलै ॥
अर्थ-तुलसी साहब तकी शेख को पुकार कर कहते हैं कि मन में अच्छी तरह देखो विचारपूर्वक
धर्मगुरु की खोज करो, मन के मुताबिक वह धर्मगुरु मिलेगा।
॥ चौपाई ॥
तुलसी कहै तकी सुन बाता। खुद खुदाइ मालिक है दाता ॥
उनका खोज खुदा नहिं पाया। नहिं कितेब लिखने में आया ॥
काजी मुल्ला खोज न पावै। दे दे बाँग खुदा गोहरावै ॥
अब खुदाइ का खोज बताओं। खुदा राह और भिस्त लखाओं ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हे तकी! मेरी बातें सुनो, खुदा स्वयं स्वामी और दाता दोनों हैं। उस
मूल खुदा की खोज खुदा भी करके नहीं प्राप्त कर सका है, और लिखी हुई धर्म की पुस्तकों में कहीं
भी पढ़ने में नहीं आया है॥ अब मैं आपको खुदा की खोज बताता हूँ और स्वयं आपको खुदा का मार्ग
तथा स्वर्ग को दिखाता हूँ।
॥ रेखता ॥
अजब अनार दो भिस्त के द्वार पै।
लखै दुरवेस फक्कीर प्यारा ॥ १ ॥
ऐन के अधर दोउ चस्म के बीच में।
खसम को खोज जहँ झलक तारा ॥ २ ॥
उसी बिच फकत खुद खुदा का तखत है।
सिस्त से देख जहँ भिस्त सारा ॥ ३ ॥

घट रामायण / १४५
तुलसी तत मतं मुरसिद के हाथ है।
मुरीद दिल रूह दोजख नियारा ॥ ४ ॥
अर्थ—स्वर्ग के द्वार पर दो आश्चर्यजनक अनार हैं— जिसे प्रभु के प्यारे फकीर एव दरवेश देखते हैं॥
ऐनक के नीचे दोनों चश्मों के बीच, उस स्वामी को खोजो, वहाँ (स्वतः) एक तारा झलक रहा
है॥
उसी के बीच में फकत स्वयं खुदा का तख्त है, उसे सिस्त से देखो जहाँ सम्पूर्ण स्वर्ग है ॥ ३ ॥
तुलसीसाहब कहते हैं कि यह मत मुरशिद (धर्मगुरु) के हाथों में है और ईश्वर के मुरीद के दिल
और आत्मा दोनों इस जगत से भिन्न हैं॥ ४ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी भिस्त मिलाप, खुदा खोज येहि बिधि मिलै।
चौधा तबक निवास, कहौ कुरान किस बिधि कहै॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि आत्मा और स्वर्ग के मिलन में खुदा को खोजो, वह इस प्रकार
प्राप्त हो सकता है, उस खुदा का निवास तो चौदह तबको (पृथ्वी की परतों) में है—बताइए वह कुरान
द्वारा किस प्रकार पाया जा सकता है?
॥ चौपाई ॥
तुलसी तबक तरक पहिचानौ। तब मियाँ तकी भिस्त को जानौ ॥
बिन मुरसिद पावै नहिं घाटा। ये सब समझ खोज ले घाटा ॥
सुनकर तकी बहुत भये दीना। बन्दा गुनहगाह नहिं चीन्हा ॥
चरन पकड़ पुनि सीस गिरावा। तुम फकीर हम मरम न पावा ॥
तुम खुदाई की जाति अजाती। हम इनके सँग भये सँगाती ॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि हे शेख तकी! पहले 'तबक' का मर्म समझो, तब स्वर्ग को
समझो। बिना मुरशिद (गुरु ....) के साधक किनारा नहीं प्राप्त कर सकता—यह परमात्मक की खोज
के मार्ग पर आने से होता है॥
इसे सुनकर तकी मियाँ बड़े दुखी हुए, और बोले, यह बन्दा! गुनहगार है क्योंकि आपको पहचान
नहीं सका। उन्होंने तुलसी साहब के चरणों को पकड़ कर अपना सिर उस पर गिरा दिया और बोले,
आप सिद्ध फकीर हैं, मैं आपका मर्म नहीं समझ सका। आप स्वयं अज्ञेय खुदा की जाति के फकीर हैं,
मैं तो इन सबका साथी बनकर आपके पास आया था॥
॥ दोहा ॥
तकी कहै तुलसी मियाँ, तुम गुरु पीर हमार।
गुनह बक्स अपना करौ, बंदा तकी तुम्हार ॥ १ ॥
तकी दीन तुलसी लखा, पका दीन मत माँईं।
झका तका अपनी तरफ, गुनहगार तुम पाईं ॥ २ ॥
तकी तबक जाना नहीं, नबी नूर नहिं पाइ।
भिस्त दोजख में तुम रहे, कैसे मिलै खुदाइ ॥ ३ ॥

१४६ / घट रामायण
अर्थ-तब तकी ने कहा कि तुलसी साहब आप हमारे गुरु और पीर हैं। मेरी गलतियों को क्षमा
करके मुझे अपना बना लें और यह बंदा तकी अब आपका है॥ १॥
तुलसी साहब ने जब तकी को उस दुखी अवस्था में देखा समझा कि यह पूरी तरह से मेरे मतों में
'पक गया है। तब बोले कि तुम अपने को गुहगार पाते हो, अब इससे ऐसा लगता कि तुमने अपनी तरफ
से (मन के अन्दर) झाँका और देखा है, आत्मालोचन किया है॥ २॥
तुलसी साहब कहते हैं कि हे तकी! तुमने तबक (सृष्टि की परतें) नहीं समझा और नवी
(धर्मगुरु) तथा नूर को भी नहीं प्राप्त किया है-स्वर्ग समझ कर इसनरक में तुम रहते रहे, तुम्हें खुदा
कैसे मिल सकते हैं॥ ३॥
॥रेखता नसीहत॥
तुलसी तबक जाना नहीं, बेहोस गाफिल हो रहा।
जिस ने तुझे पैदा किया, उस यार को चीन्हा नहीं॥ १॥
नाहक अदम दम खोवता, मुरसिद पकड़ नहिं डूबही।
तुलसी खलक कुल ख्याल है, आसिक मुहब्बत कर सही॥ २॥
खोजो मुहम्मद दिल-रहम, जिस इस्म से आलम हुआ।
तुलसी नबी निरखै नहीं, जहाँ लग मुसल्लम है नहीं ॥ ३॥
रब रूह मरहम ना हुआ, रब देख अंदर है सही।
तुलसी तकी बूझा नहीं, जग में जिया तो क्या हुआ ॥ ४॥
गन्दा नजिस क्यों हो रहा, इस जक्त में रहना नहीं।
अरे ऐ तकी तल्लास कर, तुलसी फना होना सही ॥ ५॥
चारो चसम को खोल कर, देखो जुलम जालिम वही।
जबरील को तैंना लखा, तुलसी खबर खोजा नहीं॥ ६॥
रोजा निमाज हर दम किया, उस यार को दिल ना दिया।
खोजा नहीं अपना पिया, तुलसी तकी दोजख लिया॥ ७॥
नासूत मलकूत जबरूत हैं, लाहूत लौं तैं ना लिया।
हाहूत हिये खोजा नहीं, ला में रबी जीता पिया॥ ८॥
तुलसी तकी तालिम दिया, हर दम गुनह बंदा हुआ।
मुरसिद मुरीदी दस्त है, पावै तकी अपना किया॥ ९॥
तुलसी रहम राजी हुआ, तोला तकी अपना किया।
दिया दस्त दरदी जान कै, तुलसी तकी मुरसिद हुआ॥ १०॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हे शेख तकी तुमने तबक (सृष्टि) नहीं समझा और अपने गर्व में
बराबर बेहोश तथा गाफिल (भयग्रस्त) होता रहा। जिसने तुम्हें जन्म दिया है, इस दोस्त ईश्वर को तुमने
पहचाना नहीं॥
॥ दोहा॥
तकी दीन तुलसी लखा, दीन्हा पंथ लखाइ।
सुरति सैल असमान कर, चढ़े गगन को धाइ॥

घट रामायण / १४७
अर्थ-तुलसी साहब ने तकी को दुखी देखकर उस निर्गुण ब्रह्म का मार्ग दिखा दिया। वे सुरति से
जुड़कर पर्वत शिखर पर जाकर शून्य पर दौड़कर चढ़ गये॥
॥ चौपाई ॥
तकी दीन गति गाइ सुनाई। दीन्हा सूरति पंथ लखाई॥
अर्थ-दीन सेख तकी के मार्ग को गाकर सुनाया और उसे सुरति का मार्ग दिखला दिया।
॥ सरन में आना तकी मियाँ का ॥
॥ दोहा ॥
तकी दस्त दोउ जोड़ि कै, करि सलाम सिर टेक।
नेक नजर अपनी करौ, बन्दा तकी निहाल॥
अर्थ-तकी मियाँ दोनों हाथों को जोड़कर तथा नमस्कार करते हुए शिर टेक कर बोले कि यह
बन्दा तकी निहाल हो चुका है, अब आप मेरे ऊपर कृपा करें॥
॥ चौपाई ॥
नेक निहाला नजर निहारौ। तुलसी बंदा तकी सम्हारौ॥
हमरा गुनह माफ सब कीजै। फजल करौ फिर अज्ञा दीजै॥
चले तकी मारग को जाई। कासी नगरी पहुंचे आई॥
अर्थ-थोड़ी देर के लिए तकी को निहाल करते हुए तुलसी साहब ने शेख तकी को सम्हाला। तकी
कहने लगे हे स्वामी जी! हमारी गलतियों को आप क्षमा करें-अब मुझे आज्ञा देकर मुझ पर फजल
(कृपा) करे। शेख तकी अपने मार्ग की ओर चल पड़े और धीरे-धीरे काशी नगरी में पहुँच गए॥
॥ दोहा ॥
चले तकी मारग गये, बीच बजार मँझार।
कर्मा पल्लीवाल की, गये दुकान के पास॥
अर्थ-शेख तकी उस मार्ग से चलते हुए काशी के बीच बाजार में पहुँचे और कर्मा पालीवाल की
दुकान पर गए॥
सम्बाद जैनियों के साथ
॥ चौपाई ॥
कर्मचंद इक पल्लीवाला। स्रावग जैन धर्म मत पाला॥
सो करै बनिज बजाजी कौरा। ताहि दुकान बाग तैहि मोरा॥
कर्मचंद ने कीन्ह सलामा। आदर बहुत कीन्ह सनमाना॥
सेख तकी कहै सुन रे भाई। कहौं फकीर अक खुदा गुसाईं॥
ता को सब बरतंत सुनावा। कर्मकंद तुलसी ढिंग आवा॥
कर्मचंद और धर्मा जैनी। सब पूछी पुनि हमरी कहेनी॥
कौन धर्म यह साध कहावा। जैन को धर्म मर्म जिन पावा॥
धर्मचंद और कर्मा जैनी। थापी उन निज अपनी कहेनी॥

१४८ / घट रामायण
अर्थ—कर्मचन्द नामके एक पालीवाल जाति वाले थे और उन्होंने श्रावग जैन मत स्वीकार कर रखा
था। वह बनियागीरी था और केवल बजाजी (कपड़े की दुकानदारी) करता था। उसकी दूकान मेरी
उस बाग में थी।
कर्मचंद ने मुझे देखकर सलाम किया और उन्होंने अति आदरपूर्वक मेरा सम्मान भी किया। शेख
तकी ने उनसे कहा कि हे भाई सुनो! उसे मैं फकीर कहूँ याकि ( अक ) मालिक ही कहूँ।
उन कर्मचन्द को तकी मिया ने सारा वृत्तान्त सुनाया, उसे सुनकर कर्मचंद तुलसी साहब के पास
आए। कर्मचंद और धर्मा दोनों जैनियों ने मिलकर सारे कथनों के विषय में पूछा॥ किस धर्म से सम्बद्ध
यह साधु कहा जाता है, जैन धर्म का रहस्य किसने जाना है। उन धर्मचन्द तथा कर्मा जैनी ने मिलकर
तुलसी साहब से अपनी (जैन धर्म के सिद्धान्त की) बातें रखीं॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
कहि तुलसी तुम मर्म बताओ। जैन धर्म का भेद सुनाओ॥
अर्थ—तुलसी साहब ने पूछा, कि आप अपना रहस्य बतलाएँ और जैनधर्म के मर्म के विषय में भी
बतलाएँ।
॥ उत्तर कर्मचंद और धर्मा ॥
कर्मचंद और बोले धर्मा। होइ मुक्ति जब काटै कर्मा॥
तप कर संजम बन को जावै। हरी त्याग कर जीव बचावै॥
टाटक ध्यान जपै नौकारा। जब या जीव को होइ उबारा॥
कोसिस ऐसी कठिन अपारा। काटै कर्म जीव निरबारा॥
तीर्थंकर चौबीसो जाना। कर्म काटि पहुँचे निरबाना॥
अर्थ-धर्मा एवं कर्मचन्द साथ-साथ बोले, मुक्ति तब मिलती है, जब व्यक्ति कर्म संसक्ति को नष्ट
कर डाले॥ तप के संयम बरत कर व्यक्ति बन में जाए और विष्णु (ब्रह्म) को त्यागकर मनुष्य में
निहित जीवत्व की रक्षा करे॥
तुरन्त नौ प्रकार के ध्यानों में अपनी साधना लगा दे, तभी इस जीव का उद्धार सम्भव है। इसी के
द्वारा कठिन तपस्या करके एवं कर्म बन्धन को काटकर अपने को मुक्त करना चाहिए।
तीर्थंकर चौबीस हो गए हैं-जिन्होंने कर्मबंधन काट कर निर्वाण पद को प्राप्त कर लिया है।
॥ सोरठा ॥
धर्मा कही जनाइ, जैन धर्म संजम बिधी।
तुलसी सुनौ समाइ, तब पुनि फिरि आगे कहौं॥
अर्थ-धर्मा ने सारे जैन धर्म के मर्म को बताते हुए समस्त धर्म एवं संयम विधि बतलाई। वे बोले, हे
तुलसी साहब, भली भाँति सुन लो, तब इसके बाद आगे पूछना॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी पूछै ताइ, भेद कहो निरबान को।
तुम कस पायौ जाइ, सो देखी अपनी कहौ॥

घट रामायण / १४९
अर्थ-तुलसी साहब धर्मा से पूछा, कि तुम निर्वाण के भेदों के विषय में बताओ। उसे जानकर तुमने
किस तरह देखा है और जिसे देखा है, उससे जुड़े अनुभवों के बारे में बताओ॥
॥ चौपाई ॥
तुम देखी अपनी बतलावौ। करनी और और की गावौ॥
साँची करनी अपनी भाई। तुम कुछ और और की गाई॥
तीर्थङ्कर पहुँचे निरबाना। कर्म काटि वे जाइ समाना॥
तुम तेहि करनी भाखि सुनाई। हाथ कहा कहौ तुम्हरे आई॥
जीवत मिले देखिये आँखी। ता की करनी कह कर भाखी॥
खावै भूख जाइ पुनि ताही। ऐसी बात कहौ समझाई॥
अब जो तुरत तलब सो पावै। तब तुलसी की प्यास बुझावै॥
तुम तौ कही जुगन की बानी। देखौं अबै सुनौं जो कानी॥
देखौं अबै तो मन पतियावै। ऐसी तत्त बात मन भावै॥
ये सब कही सुनी हम जानी। मुए मुक्ति की करौं बखानी॥
मुए पर कोइ आवै न भाई। जीवत में केहु पहुँचि न पाई॥
ता की खबरिं साँच कस आई। सो धर्मा तुम कहौ सुनाई॥
ये तौ अंध अंध कर लेखा। मानौ जो जोड़ नैनन देखा॥
अर्थ-तुम अपनी देखी हुई बतलाओ, करनी किसी ने की है, तुम दूसरे बनकर उसे गा रहे हो। हे
भाई! अपनी सच्ची आध्यात्मिक करनी बताओ, तुम तो दूसरे हो और दूसरे की करनी गाते हो॥
तुमने तीर्थंकरों की करनी मुझे कहकर सुना दी-उस करनी की समझ तुम्हें कितनी आई। इसे
बताओ। जो आँखों के सामने जीवित मिले, उसकी करनी कहकर कहनी चाहिए॥ जिसको भूख है, उसे
खाना चाहिए (और उस खाने का अनुभव उसे बताना चाहिए) तुम झूठे अनुभव को मुझे क्यों समझा
रहे हो।
जो सही ढंग से ईश्वर के अनुभव के नशे में डूब जाता है, वही तुलसी की जिज्ञासा भरी प्यास बुझा
सकता है। तुम तो अनेक युगों के पूर्व के ज्ञान की वाणी कहते हो-जो अभी अभी आँख से देखते हो
और कान से सुनते हो, उस ज्ञान के विषय में क्यों नहीं बताते।
जिसे अभी देख लोगे, उस पर मन विश्वास करने लगेगा और तत्त्व की ऐसी ही बातें मन को
अच्छी लगती हैं॥
जो तुमने सारी बातें कही है, उसे हमने भी सुन रखी है-तुम मुझसे उस मुक्ति की बात करते हो जो
मर चुकी है॥ हे भाई! मरने के बाद कोई आता नहीं और जीवन में जीवित रहते कोई मृत्यु तक नहीं
पहुँच सकता॥
उस पूर्वमृत की खबर तुम्हारे पास कैसे आ गई, हे धर्मा! इसे सच-सच सुनाकर बताओ॥ यह
तुम्हारा प्रश्न अंधे के द्वारा अंध को ले जाने जैसा है, मन तो उस पर विश्वास करता है, जिसे उसने अपने
नेत्रों से देखा है।
॥ सोरठा ॥
तुलसी तुरत बताइ जो निज नैननि लखि परै।
सरै जीव को काज परै पार गति देखिये॥

१५० / घट रामायण
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हे धर्मा, उसके विषय में बताओ जो अपनी आँखों से दिखाई पड़े,
उससे जीव का कार्य सिद्ध होगा और उस पार जाकर कह उस विशुद्ध मुक्ति को प्राप्त करेगा और उसे
देखेगा॥
॥ चौपाई ॥
सो साँची भानैं हम भाई। ऐसी धर्मा कहौ सुनाई॥
अर्थ-हे धर्मा, ऐसी बातें कहकर सुनाओ, जिसे हे भाई! हम भी अनुभव करें॥
॥ उत्तर धर्मा ॥
कहै धर्मा तुलसी सुनौ, कहौं भे बिस्वास।
बिन संजम पावै नहीं, तप जप बिना उपास॥
अर्थ-धर्मा ने कहा कि, हे तुलसी साहब! सुनें, किसी के बताने से यह विश्वास हुआ कि बिना
संयम एवं जप, तप एवं उपवास के कुछ प्राप्त नहीं होता॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
॥ सोरठा ॥
सुनु धर्मा बिधि बात। संजम तप मुक्ती नहीं॥
पद पावै निरबान। चढ़ि अकास मुक्ती मिलै॥ १॥
निज निरबान बिधान। कहौं भेद भिन भिन सुनौ॥
पद निर्बान निज पार। संत सार आगे चखै॥ २॥
अर्थ-हे धर्मा! मेरी बात सुनो, संयम एवं तपस्या मुक्ति नहीं है, जो निर्वाण पद को प्राप्त कर लेता
है, उसे शून्याकाश में मुक्ति मिलती है॥ १॥
अपने निर्वाण विधान के भिन्न-भिन्न भेदों को मैं बतलाता हूँ-निर्वाण का पद अपने (चित्त) के उस
पार है-और उसके सारतत्त्व आनन्द का आस्वादन मुक्ति के बाद चखते हैं॥ २॥
॥ रेखता ॥
निकट निरबान की सान जग में लखौ।
फटिक बिच सिला पर स्याम माई॥ १॥
काल की जाल दरहाल जा को कहैं।
भये चौबीस भौ मुक्ति पाई॥ २॥
गुन मिलि गोह चौधा गुनष्ठान हैं।
चौधा जमराय जहँ कसत भाई॥ ३॥
अधर अठबीस लख लोक राचू कहैं।
काल निरबान रत रहत गही॥ ४॥
देव मुनि दैत्य गंधर्व और मानवी।
केवली काल मुख सकल जाई॥ ५॥
दास तुलसी निबान पद निरखि कै।
छाँड़ि ये राह घर अधर माई॥ ६॥

घट रामायण / १५१
अर्थ—अपने ही निकट निर्वाण की गरिमा को देखो—स्फटिक की शिला (चित्त शिला पर) वह
श्याममयी है—उसे काल के क्षण-क्षण का समाचार कहा जाता है, चौबीसरूपों (चौबीस तीर्थंकरों) के
रूप में इन्होंने मुक्ति प्राप्त की है॥ १-२॥
गुणों से मिलकर चौदह अनुष्ठान हैं—जहाँ चौदह यमराज निवास करते हैं॥ ३॥
अन्तरात्मा में अट्ठाईस दिखाई पड़ने वाले लोक हैं—काल-निर्वाण द्वारा इन्हें सभी गृहीत रहते हैं॥ ४॥
देव, मुनि, दैत्य, गंधर्व एवं मानव के बीच क्या ज्ञानी (कवली) मुक्ति का अधिकारी हो गया
है॥५॥
तुलसीदास कहते हैं कि निर्वाण के पद को देखकर, इस मार्ग को छोड़ दो—और अपनी अन्तरात्मा
के घर में निवास करो॥ ६॥
॥ गजल १॥
जैनी जो जैन नैन सूझै नाईं।
आतम को छाँड़ि पूजें पाहन जाई॥ १॥
कर कर पूजा बिधान अष्टक गावैं।
भादों बिधि मंदिर सब स्रावग आवैं॥ २॥
चावल रँग माँड मँडे मनसैं आप का।
नंदेसुर पूजि दीप करें बाप का॥ ३॥
और अढ़ाई दीप माँड़ि करते पूजा।
अंदर आतम्म ब्रह्म नाहीं सूझा॥ ४॥
करते कल्यान पाँच कामधेनु की।
पूजें बेहोस फूटि हिये नैन की॥ ५॥
जिन ने तन साज किया जानौ भाई।
वा की विधि भूलि भाव पाहन लाई॥ ६॥
तुलसी ये फंद कीन्ह काल पसारा।
धरमन की टेक बाँधि बूड़े सारा॥ ७॥
अर्थ—जैनी को ज्ञान के नेत्रों से कुछ भी नहीं सूझता और वे आत्मा को छोड़कर पत्थर की पूजा
करने जाते हैं॥ १॥
पूजाविधान कर करके अष्टक गाते हैं और भादों के महीने में सभी मन्दिर में (पूजा) के निमित्त
आते हैं॥ २॥
चावल को रंगकर माँड़ को रजाकर स्वयं अपनी स्वेच्छा से नंदेसुर की पूजा करके अपने मृत पिता
के लिए दीपदान करते हैं॥ ३॥
उन्हें अपनी अन्तरात्मा में स्थित ब्रह्म नहीं सूझता और उधर ढाई दीपक सजा कर पूजन करते
हैं॥४॥
वे पांच कामधेनु जैसी गायों को खिलाते-पिलाते हैं तथा हृदय के नेत्रों से वंचित (फूटि) अज्ञानी
जैसे पूजा करते हैं॥ ५॥
हे भाई! समझो, जिसने तुम्हारे इस शरीर की रचना जैसी साज सज्जा की है, उसको भूल करके
अपने भावचित्त में पत्थर ला रहे हो॥ ६॥

१५२ / घट रामायण
तुलसी साहब कहते हैं कि काल ने फंदा बनाकर चारों ओर फैला रखा है और इन धर्मों के टेक
के अन्तर्गत बँधे हुए तुम सारे के सारे लोग डूब जावोगे ॥ ७॥
॥ गजल २॥
ढूँढ़त गिरिनार सिखर आबू जाते।
सतगुरु बिन मेहर नहीं काबू पाते॥ १॥
बूझैं सतसंग संग संतन माई।
अंदर पट खोल बोल देत दिखाई॥ २॥
जिनके बड़े भाग सोई निरखि निहारा।
रहते जग बीच बीच जग से न्यारा॥ ३॥
उनकी वोहि चाल हाल घट में देखें।
पूछै कोइ चीन्हें नहिं बात बिसेखै ॥ ४॥
खोजत पहाड़ सिखर मूरति माई।
तुलसी नौकार जपैं सूझै नाई॥ ५॥
अर्थ-आबू पर्वत या गिरनार के शिखर पर जिसे खोजने जाते हो, किन्तु सतगुरु की कृपा बिना पूजा
करने वाले अपने पर नियंत्रण नहीं कर पाते ॥ १॥
हे भाई! संतों के साथ होने वाले सत्संग को समझो जो अन्तरात्मा के पर्दे को खोल कर उस
परमात्मा को दिखा देते हैं॥ २॥
वे लोग, जिनके बड़े भाग्य हैं, वही उसे निरखते और निहारते हैं और संसार में रहते हुए भी संसार
से असंसक्त हैं॥ ३॥
उनकी उस चाल तथा हाल कि वे घट के भीतर ही तत्त्व का दर्शन कर लेते हैं, वे पूछने पर भी
किसी को पहचानते नहीं, यह विशेष बात हैं अर्थात् निरन्तर आत्मरत रहते हैं॥
हे धर्मा! पर्वत शिखरों पर उनकी मूर्ति को खोजते हुए नौकार जाप करते हैं किन्तु यह सूझ नहीं
पड़ता-यह कौन-सी साधना है॥ ५॥
॥ चौपाई ॥
पद निरबान भूमि बतलाई। केवलि ज्ञान तिर्थंकर गाई॥
तप संजम पूजा बिधि बानी। ये गति चारि माहिं भौ खानी॥
अर्थ-मैंने निर्वाण पद की मूलभूमि का वर्णन किया है और केवल तीर्थंकरों के विषय में बताया है।
तप, संयम, पूजाविधि, और कीर्तन ये चारों गतियाँ इस सांसारिक बन्धन की खानि हैं॥
॥ दोहा ॥
जब नौकार निकाम सब, आदि सार नहिं जान।
पद निरबान के पार की, तुलसी करत बखान॥
अर्थ-जब नौ प्रकार की सभी पूजाएँ व्यर्थ हैं-और कोई मूल स्तर सार तत्त्व नही समझता, (तो
निर्वाण पद को क्या समझेंगे) तुलसीदास जी कहते हैं कि इसलिए मैं निर्वाण पद के उस पार की
स्थिति का वर्णन करता हूँ॥

घट रामायण / १५३
॥ शब्द ॥
अद्भुत आज अलेखा री, सखि सइयाँ कौ भेषा॥ टेक॥
उदित मुदित दोइ सहर सुहावन, स्याम सेत नित देखा।
अजर खेत्र नभ फटिक, सिला पर, पद निरबान बिसेखा॥ १॥
सिलि पिलि बिजै खेत्र बिंदाचल, लील सिखर पर ठेका।
समुँदर सात पार जल खण्डा, अंडा अब ले पेखा॥ २॥
निरखत चारि खानि गति चारी, बिधि बिधि जीव बिसेखा।
केवलि ज्ञान होत गुंकारा, देखे केवली अनेका॥ ३॥
ये निरबान भूमि मत मारग, आगे जान न लेखा।
स्रावग जैन धर्म मत माहीं, इनके वोही टेका॥ ४॥
आतम ज्ञान ध्यान बतलावैं, आगे भेद न पावैं।
सास्तर साखि भाखि बिधि देखें, खोजत मुए अनेका॥ ५॥
या के परे भिन्न गति न्यारी, सूनि बाइस बिधि देखा।
ता के परे पार सत साहिब, सो पद संतन लेखा॥ ६॥
सुन्न सुन्न प्रति प्रति पद माहीं, जहाँ निरबान न पेखा।
केवलि ज्ञान आतमा नाहीं, धरम करम नहिं एका॥ ७॥
सूर चंद नहिं धरनि अकासा, तेज पवन जल छेका॥
ता के परे पार निर्ख न्यारा, तुलसी हिये दृग देखा॥ ८॥
अर्थ-हे सखी! आज स्वामी (ब्रह्म) की वेषरचना अद्भुत एवं अलेख्य है। उदित तथा मुदित नाम
के दो सुहावने नगर हैं और वहीं मैंने उनको, श्याम तथा श्वेत इन दो रूपों में देखा है। वह क्षेत्र अजर है,
शून्याकाश में एक स्फटिक शिला है-उनका विशेष निर्वाण पद वही है॥ १॥
वह जल खंड सात समुद्रों के उस पार है और वहीं ब्रह्मांड रूप इस विश्व को देखा है॥ २१॥
यहाँ चारों प्रकार के ज्ञान विभव के स्रोत तथा चारों प्रकार की मुक्ति की गतियाँ और नाना प्रकार
के जीव हैं। यहाँ केवल गुंकार (ध्वनि रूप) ज्ञान सुनाई पड़ता है- इसे केवल वे ही देखते हैं जो
'केवल ज्ञानी हैं॥ ३॥
यही निर्वाणभूमि ही धर्म का मार्ग है, आगे कोई न ज्ञान है और न उसे लेखा-जोखा (विवरण) है।
श्रावग, जैनधर्म मत के अन्तर्गत इनकी यही अन्तिम मान्यता है॥ ४॥
ध्यान ही आत्म ज्ञान बतलाता है, उसके आगे क्या है, वे उसका भेदभाव नहीं प्राप्त कर पाते। शास्त्र
की साक्षी अनेक प्रकार से कह देते हैं किन्तु इसी को खोजते-खोजते वे मर जाते हैं॥ ५॥
इस शास्त्र से परे एक विलक्षण ज्ञान की भिन्न गति है, सुनो! उसे बाईस प्रकार से मैंने देखा है
(देखा जाता है)। उसके उस पार सत्य ब्रह्म जैसा स्वामी है-उस स्थान को केवल संतों ने देखा है॥ ६॥
प्रति पद-पद में शून्य-ही शून्य है-वहाँ निर्वाण नहीं दिखता-वहाँ न ज्ञान है, न आत्मा है, न धर्म है, न
कर्म है-अर्थात् एक भी नहीं है॥ ७॥
वहाँ न सूर्य हैं, न चन्द्रमा हैं, न पृथ्वी है, न आकाश है-और सभी कुछ तीक्ष्ण वायु एवं जल से
घिरा हुआ है। उसके पार उस प्रिय विलक्षण ब्रह्म को देखो, और तुलसीदास ने भी हृदय की आँखों से
उसे देखा है॥ ८॥

१५४ / घट रामायण
॥ दोहा ॥
तुलसी भूमि निरबान की, धर्मा सुनौ बयान।
केवलि ज्ञान गोंकार का, तुलसी करत बखान॥ १॥
फटिक सिला नभ ऊपरै, केवलि करत बखान।
तुलसी चढ़ि असमान पर, निरखा भिनि भिनि छान॥ २॥
निरबान निरखि आगे चली, सुनि अंड बाइस पार।
नहिं निरबान गति वहँ चलै, तुलसी देखा झार॥ ३॥
जीव अचर चर अंड के, जो ब्रह्मांड के माहिँ।
सूरति चढ़ि असमान पर, तुलसी देखा जाइ॥ ४॥
अर्थ-हे धर्मा! मेरी बात सुनो, निर्वाण की भूमि, वह केवल 'गोंकार' ज्ञानी भूमि है, ऐसा,
तुलसीदास कहते हैं॥ १॥
शून्याकाश के ऊपर स्फटिक शिला कैवल्य ज्ञान युक्त सन्तजन उसका वर्णन करते हैं। तुलसी
साहब कहते हैं कि मैंने भी शून्याकाश पर चढ़कर उन भिन्न-भिन्न केन्द्रों को देखा॥ २॥
निर्वाण पद को देखकर आत्मा के आगे चलने पर उसे बाइस ब्रह्मांड दिखाई पड़ते हैं। उन बाइस
अंडों के आगे निर्वाण की गति नहीं चलती-तुलसी ने इस साफ-साफ देखा है॥ ३॥
इस अंड के चराचर जीव जो ब्रह्मांड के मध्य हैं-तुलसी साहब कहते हैं कि शून्याकाश पर चढ़कर
मैंने उन्हें भी देखा है॥ ४॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी धर्म बिलोके सारी। तुरक जैन बाम्हन मत झारी॥
जग थापन जैनी बतलावैं। ऋषभ देव कीन्हा बिधि गावैं॥
तीथंकर चौबीसों बानी। तुरक पीर चौबीस बखानी॥
मुहम्मद थापन कीन्ह जहाना। बाम्हन ब्रह्मा बेद बखाना॥
मुहम्मद तुरक बाम्हन बतलावैं। तीसर जैनी अस अस गावैं॥
अस अस तीनों कहत बखाना। झूठ साँच कहौ केहि को माना॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि तुर्क, जैन एवं ब्राह्मण धर्म से सम्बद्ध सारे मतों को मैंने देखा है,
जैसा कि जैन मतावलम्बी बतलाते हैं-'ऋषभदेव' ने इस संसार की स्थापना की है॥
चौबीस तीर्थंकरों की ये कहते हैं और तुर्क, पीर भी चौबीस की ही बातें करते हैं। मुसलमान कहते
हैं कि मुहम्मद साहब ने इस संसार की स्थापना की है और ब्राह्मण ब्रह्मा तथा वेद को बतलाते हैं॥
मुहम्मद साहब को तुर्क एवं ब्राह्मण ब्रह्मा को तथा तीसरे जैनी इस प्रकार की बातें करते हैं। इस
प्रकार से तीनों कहते हैं और बताइए-इनकों किस तर्क से झूठ या सच माना जाए॥
॥ दोहा ॥
गुनष्टान चौधा कहे, जैन मते में जान।
तुरक तबक चौधा कहे, बाम्हन भुवन बखान॥ १॥

घट रामायण / १५५
चौधा भुवन बाम्हन कहैं, तीनौ मत इक सार।
आदि पार कोइ ना कहै, लखा न रचनेहार ॥ २ ॥
अर्थ-जैन मत के अनुसार यह समझो कि गुणगान चौदह कहे जाते हैं। मुसलमान भी चौदह तबक
( योनियाँ ) बताते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मणों के भी चौदह भुवन हैं।। १ ।।
ब्राह्मण भी चौदह भुवन कहते हैं-ये तीनों मत एक जैसे हैं, लेकिन इसके उस पार क्या है? इसके
विषय में कोई नहीं बताता। इस रचने वाले ईश्वर को किसी ने भी नहीं देखा है॥
॥ रेखता ॥
चौधा तबक किताब कुरान में।
पीर चौबीस पुनि वोहू गावा ॥ १ ॥
अल्ला रचि खेल सब जहान आलम किया।
आब और ताब पट अबर आवा ॥ २ ॥
सरा का खेल मुहम्मद से करि कहैं।
येही बिधि तुरक तकरीर लावा ॥ ३ ॥
जैन मत माहिं गुनष्टान चौधा कहैं।
बिधी भगवान चौबीस गावा ॥ ४ ॥
ऋषभजी रचन संसार की थापना॥
आपने मते की वोहू लावा ॥ ५ ॥
बेद पुरान संसार बाम्हन कहै॥
विधी भगवान चौबीस गावा ॥ ६ ॥
चतुरदस लोक लीला बरनन करैं।
रचना बैराट जग बिधि बनावा ॥ ७ ॥
झूठ और साँच कहौं कौन को कीजिये।
हिन्दू और तुरक पढ़ भूल पावा ॥ ८ ॥
जैन सोइ जिंद बुन्द आदि को ना लखा।
तीनि में किनहुँ नहिं चीन्ह पावा ॥ ९ ॥
दास तुलसी कहै अगम घर अधर है।
संत बिन भेद नहिं हाथ आवा ॥ १० ॥
अर्थ-पुस्तकों में चौदह तबकों ( योनियों ) का वर्णन है, और पीर उन्हीं चौबीसों का गान करते रहते
हैं॥ १॥
अल्ला मियाँ ने खेल खेल में रचकर सम्पूर्ण सृष्टि को सुशोभित कर दिया और उस पर जल तथा
चेतना अलग से भर दी॥ २ ॥
अपनी इस रचना के खेल को बनाकर मुहम्मद साहब से बताया और जो कुछ बताया है, उसको
मुसलमान तर्क और बहस के रूप में पेश कहते हैं॥ ३ ॥