घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हे धर्मा, उसके विषय में बताओ जो अपनी आँखों से दिखाई पड़े,
उससे जीव का कार्य सिद्ध होगा और उस पार जाकर कह उस विशुद्ध मुक्ति को प्राप्त करेगा और उसे
देखेगा॥
॥ चौपाई ॥
सो साँची भानैं हम भाई। ऐसी धर्मा कहौ सुनाई॥
अर्थ-हे धर्मा, ऐसी बातें कहकर सुनाओ, जिसे हे भाई! हम भी अनुभव करें॥
॥ उत्तर धर्मा ॥
कहै धर्मा तुलसी सुनौ, कहौं भे बिस्वास।
बिन संजम पावै नहीं, तप जप बिना उपास॥
अर्थ-धर्मा ने कहा कि, हे तुलसी साहब! सुनें, किसी के बताने से यह विश्वास हुआ कि बिना
संयम एवं जप, तप एवं उपवास के कुछ प्राप्त नहीं होता॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
॥ सोरठा ॥
सुनु धर्मा बिधि बात। संजम तप मुक्ती नहीं॥
पद पावै निरबान। चढ़ि अकास मुक्ती मिलै॥ १॥
निज निरबान बिधान। कहौं भेद भिन भिन सुनौ॥
पद निर्बान निज पार। संत सार आगे चखै॥ २॥
अर्थ-हे धर्मा! मेरी बात सुनो, संयम एवं तपस्या मुक्ति नहीं है, जो निर्वाण पद को प्राप्त कर लेता
है, उसे शून्याकाश में मुक्ति मिलती है॥ १॥
अपने निर्वाण विधान के भिन्न-भिन्न भेदों को मैं बतलाता हूँ-निर्वाण का पद अपने (चित्त) के उस
पार है-और उसके सारतत्त्व आनन्द का आस्वादन मुक्ति के बाद चखते हैं॥ २॥
॥ रेखता ॥
निकट निरबान की सान जग में लखौ।
फटिक बिच सिला पर स्याम माई॥ १॥
काल की जाल दरहाल जा को कहैं।
भये चौबीस भौ मुक्ति पाई॥ २॥
गुन मिलि गोह चौधा गुनष्ठान हैं।
चौधा जमराय जहँ कसत भाई॥ ३॥
अधर अठबीस लख लोक राचू कहैं।
काल निरबान रत रहत गही॥ ४॥
देव मुनि दैत्य गंधर्व और मानवी।
केवली काल मुख सकल जाई॥ ५॥
दास तुलसी निबान पद निरखि कै।
छाँड़ि ये राह घर अधर माई॥ ६॥