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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 141

१४८ / घट रामायण
अर्थ—कर्मचन्द नामके एक पालीवाल जाति वाले थे और उन्होंने श्रावग जैन मत स्वीकार कर रखा
था। वह बनियागीरी था और केवल बजाजी (कपड़े की दुकानदारी) करता था। उसकी दूकान मेरी
उस बाग में थी।
कर्मचंद ने मुझे देखकर सलाम किया और उन्होंने अति आदरपूर्वक मेरा सम्मान भी किया। शेख
तकी ने उनसे कहा कि हे भाई सुनो! उसे मैं फकीर कहूँ याकि ( अक ) मालिक ही कहूँ।
उन कर्मचन्द को तकी मिया ने सारा वृत्तान्त सुनाया, उसे सुनकर कर्मचंद तुलसी साहब के पास
आए। कर्मचंद और धर्मा दोनों जैनियों ने मिलकर सारे कथनों के विषय में पूछा॥ किस धर्म से सम्बद्ध
यह साधु कहा जाता है, जैन धर्म का रहस्य किसने जाना है। उन धर्मचन्द तथा कर्मा जैनी ने मिलकर
तुलसी साहब से अपनी (जैन धर्म के सिद्धान्त की) बातें रखीं॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
कहि तुलसी तुम मर्म बताओ। जैन धर्म का भेद सुनाओ॥
अर्थ—तुलसी साहब ने पूछा, कि आप अपना रहस्य बतलाएँ और जैनधर्म के मर्म के विषय में भी
बतलाएँ।
॥ उत्तर कर्मचंद और धर्मा ॥
कर्मचंद और बोले धर्मा। होइ मुक्ति जब काटै कर्मा॥
तप कर संजम बन को जावै। हरी त्याग कर जीव बचावै॥
टाटक ध्यान जपै नौकारा। जब या जीव को होइ उबारा॥
कोसिस ऐसी कठिन अपारा। काटै कर्म जीव निरबारा॥
तीर्थंकर चौबीसो जाना। कर्म काटि पहुँचे निरबाना॥
अर्थ-धर्मा एवं कर्मचन्द साथ-साथ बोले, मुक्ति तब मिलती है, जब व्यक्ति कर्म संसक्ति को नष्ट
कर डाले॥ तप के संयम बरत कर व्यक्ति बन में जाए और विष्णु (ब्रह्म) को त्यागकर मनुष्य में
निहित जीवत्व की रक्षा करे॥
तुरन्त नौ प्रकार के ध्यानों में अपनी साधना लगा दे, तभी इस जीव का उद्धार सम्भव है। इसी के
द्वारा कठिन तपस्या करके एवं कर्म बन्धन को काटकर अपने को मुक्त करना चाहिए।
तीर्थंकर चौबीस हो गए हैं-जिन्होंने कर्मबंधन काट कर निर्वाण पद को प्राप्त कर लिया है।
॥ सोरठा ॥
धर्मा कही जनाइ, जैन धर्म संजम बिधी।
तुलसी सुनौ समाइ, तब पुनि फिरि आगे कहौं॥
अर्थ-धर्मा ने सारे जैन धर्म के मर्म को बताते हुए समस्त धर्म एवं संयम विधि बतलाई। वे बोले, हे
तुलसी साहब, भली भाँति सुन लो, तब इसके बाद आगे पूछना॥
॥ प्रश्न तुलसी साहिब ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी पूछै ताइ, भेद कहो निरबान को।
तुम कस पायौ जाइ, सो देखी अपनी कहौ॥