घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १४९
अर्थ-तुलसी साहब धर्मा से पूछा, कि तुम निर्वाण के भेदों के विषय में बताओ। उसे जानकर तुमने
किस तरह देखा है और जिसे देखा है, उससे जुड़े अनुभवों के बारे में बताओ॥
॥ चौपाई ॥
तुम देखी अपनी बतलावौ। करनी और और की गावौ॥
साँची करनी अपनी भाई। तुम कुछ और और की गाई॥
तीर्थङ्कर पहुँचे निरबाना। कर्म काटि वे जाइ समाना॥
तुम तेहि करनी भाखि सुनाई। हाथ कहा कहौ तुम्हरे आई॥
जीवत मिले देखिये आँखी। ता की करनी कह कर भाखी॥
खावै भूख जाइ पुनि ताही। ऐसी बात कहौ समझाई॥
अब जो तुरत तलब सो पावै। तब तुलसी की प्यास बुझावै॥
तुम तौ कही जुगन की बानी। देखौं अबै सुनौं जो कानी॥
देखौं अबै तो मन पतियावै। ऐसी तत्त बात मन भावै॥
ये सब कही सुनी हम जानी। मुए मुक्ति की करौं बखानी॥
मुए पर कोइ आवै न भाई। जीवत में केहु पहुँचि न पाई॥
ता की खबरिं साँच कस आई। सो धर्मा तुम कहौ सुनाई॥
ये तौ अंध अंध कर लेखा। मानौ जो जोड़ नैनन देखा॥
अर्थ-तुम अपनी देखी हुई बतलाओ, करनी किसी ने की है, तुम दूसरे बनकर उसे गा रहे हो। हे
भाई! अपनी सच्ची आध्यात्मिक करनी बताओ, तुम तो दूसरे हो और दूसरे की करनी गाते हो॥
तुमने तीर्थंकरों की करनी मुझे कहकर सुना दी-उस करनी की समझ तुम्हें कितनी आई। इसे
बताओ। जो आँखों के सामने जीवित मिले, उसकी करनी कहकर कहनी चाहिए॥ जिसको भूख है, उसे
खाना चाहिए (और उस खाने का अनुभव उसे बताना चाहिए) तुम झूठे अनुभव को मुझे क्यों समझा
रहे हो।
जो सही ढंग से ईश्वर के अनुभव के नशे में डूब जाता है, वही तुलसी की जिज्ञासा भरी प्यास बुझा
सकता है। तुम तो अनेक युगों के पूर्व के ज्ञान की वाणी कहते हो-जो अभी अभी आँख से देखते हो
और कान से सुनते हो, उस ज्ञान के विषय में क्यों नहीं बताते।
जिसे अभी देख लोगे, उस पर मन विश्वास करने लगेगा और तत्त्व की ऐसी ही बातें मन को
अच्छी लगती हैं॥
जो तुमने सारी बातें कही है, उसे हमने भी सुन रखी है-तुम मुझसे उस मुक्ति की बात करते हो जो
मर चुकी है॥ हे भाई! मरने के बाद कोई आता नहीं और जीवन में जीवित रहते कोई मृत्यु तक नहीं
पहुँच सकता॥
उस पूर्वमृत की खबर तुम्हारे पास कैसे आ गई, हे धर्मा! इसे सच-सच सुनाकर बताओ॥ यह
तुम्हारा प्रश्न अंधे के द्वारा अंध को ले जाने जैसा है, मन तो उस पर विश्वास करता है, जिसे उसने अपने
नेत्रों से देखा है।
॥ सोरठा ॥
तुलसी तुरत बताइ जो निज नैननि लखि परै।
सरै जीव को काज परै पार गति देखिये॥