घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ / घट रामायण
तुलसी साहब कहते हैं कि काल ने फंदा बनाकर चारों ओर फैला रखा है और इन धर्मों के टेक
के अन्तर्गत बँधे हुए तुम सारे के सारे लोग डूब जावोगे ॥ ७॥
॥ गजल २॥
ढूँढ़त गिरिनार सिखर आबू जाते।
सतगुरु बिन मेहर नहीं काबू पाते॥ १॥
बूझैं सतसंग संग संतन माई।
अंदर पट खोल बोल देत दिखाई॥ २॥
जिनके बड़े भाग सोई निरखि निहारा।
रहते जग बीच बीच जग से न्यारा॥ ३॥
उनकी वोहि चाल हाल घट में देखें।
पूछै कोइ चीन्हें नहिं बात बिसेखै ॥ ४॥
खोजत पहाड़ सिखर मूरति माई।
तुलसी नौकार जपैं सूझै नाई॥ ५॥
अर्थ-आबू पर्वत या गिरनार के शिखर पर जिसे खोजने जाते हो, किन्तु सतगुरु की कृपा बिना पूजा
करने वाले अपने पर नियंत्रण नहीं कर पाते ॥ १॥
हे भाई! संतों के साथ होने वाले सत्संग को समझो जो अन्तरात्मा के पर्दे को खोल कर उस
परमात्मा को दिखा देते हैं॥ २॥
वे लोग, जिनके बड़े भाग्य हैं, वही उसे निरखते और निहारते हैं और संसार में रहते हुए भी संसार
से असंसक्त हैं॥ ३॥
उनकी उस चाल तथा हाल कि वे घट के भीतर ही तत्त्व का दर्शन कर लेते हैं, वे पूछने पर भी
किसी को पहचानते नहीं, यह विशेष बात हैं अर्थात् निरन्तर आत्मरत रहते हैं॥
हे धर्मा! पर्वत शिखरों पर उनकी मूर्ति को खोजते हुए नौकार जाप करते हैं किन्तु यह सूझ नहीं
पड़ता-यह कौन-सी साधना है॥ ५॥
॥ चौपाई ॥
पद निरबान भूमि बतलाई। केवलि ज्ञान तिर्थंकर गाई॥
तप संजम पूजा बिधि बानी। ये गति चारि माहिं भौ खानी॥
अर्थ-मैंने निर्वाण पद की मूलभूमि का वर्णन किया है और केवल तीर्थंकरों के विषय में बताया है।
तप, संयम, पूजाविधि, और कीर्तन ये चारों गतियाँ इस सांसारिक बन्धन की खानि हैं॥
॥ दोहा ॥
जब नौकार निकाम सब, आदि सार नहिं जान।
पद निरबान के पार की, तुलसी करत बखान॥
अर्थ-जब नौ प्रकार की सभी पूजाएँ व्यर्थ हैं-और कोई मूल स्तर सार तत्त्व नही समझता, (तो
निर्वाण पद को क्या समझेंगे) तुलसीदास जी कहते हैं कि इसलिए मैं निर्वाण पद के उस पार की
स्थिति का वर्णन करता हूँ॥