घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १५१
अर्थ—अपने ही निकट निर्वाण की गरिमा को देखो—स्फटिक की शिला (चित्त शिला पर) वह
श्याममयी है—उसे काल के क्षण-क्षण का समाचार कहा जाता है, चौबीसरूपों (चौबीस तीर्थंकरों) के
रूप में इन्होंने मुक्ति प्राप्त की है॥ १-२॥
गुणों से मिलकर चौदह अनुष्ठान हैं—जहाँ चौदह यमराज निवास करते हैं॥ ३॥
अन्तरात्मा में अट्ठाईस दिखाई पड़ने वाले लोक हैं—काल-निर्वाण द्वारा इन्हें सभी गृहीत रहते हैं॥ ४॥
देव, मुनि, दैत्य, गंधर्व एवं मानव के बीच क्या ज्ञानी (कवली) मुक्ति का अधिकारी हो गया
है॥५॥
तुलसीदास कहते हैं कि निर्वाण के पद को देखकर, इस मार्ग को छोड़ दो—और अपनी अन्तरात्मा
के घर में निवास करो॥ ६॥
॥ गजल १॥
जैनी जो जैन नैन सूझै नाईं।
आतम को छाँड़ि पूजें पाहन जाई॥ १॥
कर कर पूजा बिधान अष्टक गावैं।
भादों बिधि मंदिर सब स्रावग आवैं॥ २॥
चावल रँग माँड मँडे मनसैं आप का।
नंदेसुर पूजि दीप करें बाप का॥ ३॥
और अढ़ाई दीप माँड़ि करते पूजा।
अंदर आतम्म ब्रह्म नाहीं सूझा॥ ४॥
करते कल्यान पाँच कामधेनु की।
पूजें बेहोस फूटि हिये नैन की॥ ५॥
जिन ने तन साज किया जानौ भाई।
वा की विधि भूलि भाव पाहन लाई॥ ६॥
तुलसी ये फंद कीन्ह काल पसारा।
धरमन की टेक बाँधि बूड़े सारा॥ ७॥
अर्थ—जैनी को ज्ञान के नेत्रों से कुछ भी नहीं सूझता और वे आत्मा को छोड़कर पत्थर की पूजा
करने जाते हैं॥ १॥
पूजाविधान कर करके अष्टक गाते हैं और भादों के महीने में सभी मन्दिर में (पूजा) के निमित्त
आते हैं॥ २॥
चावल को रंगकर माँड़ को रजाकर स्वयं अपनी स्वेच्छा से नंदेसुर की पूजा करके अपने मृत पिता
के लिए दीपदान करते हैं॥ ३॥
उन्हें अपनी अन्तरात्मा में स्थित ब्रह्म नहीं सूझता और उधर ढाई दीपक सजा कर पूजन करते
हैं॥४॥
वे पांच कामधेनु जैसी गायों को खिलाते-पिलाते हैं तथा हृदय के नेत्रों से वंचित (फूटि) अज्ञानी
जैसे पूजा करते हैं॥ ५॥
हे भाई! समझो, जिसने तुम्हारे इस शरीर की रचना जैसी साज सज्जा की है, उसको भूल करके
अपने भावचित्त में पत्थर ला रहे हो॥ ६॥