सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 150 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

घट रामायण / १५३
॥ शब्द ॥
अद्भुत आज अलेखा री, सखि सइयाँ कौ भेषा॥ टेक॥
उदित मुदित दोइ सहर सुहावन, स्याम सेत नित देखा।
अजर खेत्र नभ फटिक, सिला पर, पद निरबान बिसेखा॥ १॥
सिलि पिलि बिजै खेत्र बिंदाचल, लील सिखर पर ठेका।
समुँदर सात पार जल खण्डा, अंडा अब ले पेखा॥ २॥
निरखत चारि खानि गति चारी, बिधि बिधि जीव बिसेखा।
केवलि ज्ञान होत गुंकारा, देखे केवली अनेका॥ ३॥
ये निरबान भूमि मत मारग, आगे जान न लेखा।
स्रावग जैन धर्म मत माहीं, इनके वोही टेका॥ ४॥
आतम ज्ञान ध्यान बतलावैं, आगे भेद न पावैं।
सास्तर साखि भाखि बिधि देखें, खोजत मुए अनेका॥ ५॥
या के परे भिन्न गति न्यारी, सूनि बाइस बिधि देखा।
ता के परे पार सत साहिब, सो पद संतन लेखा॥ ६॥
सुन्न सुन्न प्रति प्रति पद माहीं, जहाँ निरबान न पेखा।
केवलि ज्ञान आतमा नाहीं, धरम करम नहिं एका॥ ७॥
सूर चंद नहिं धरनि अकासा, तेज पवन जल छेका॥
ता के परे पार निर्ख न्यारा, तुलसी हिये दृग देखा॥ ८॥
अर्थ-हे सखी! आज स्वामी (ब्रह्म) की वेषरचना अद्भुत एवं अलेख्य है। उदित तथा मुदित नाम
के दो सुहावने नगर हैं और वहीं मैंने उनको, श्याम तथा श्वेत इन दो रूपों में देखा है। वह क्षेत्र अजर है,
शून्याकाश में एक स्फटिक शिला है-उनका विशेष निर्वाण पद वही है॥ १॥
वह जल खंड सात समुद्रों के उस पार है और वहीं ब्रह्मांड रूप इस विश्व को देखा है॥ २१॥
यहाँ चारों प्रकार के ज्ञान विभव के स्रोत तथा चारों प्रकार की मुक्ति की गतियाँ और नाना प्रकार
के जीव हैं। यहाँ केवल गुंकार (ध्वनि रूप) ज्ञान सुनाई पड़ता है- इसे केवल वे ही देखते हैं जो
'केवल ज्ञानी हैं॥ ३॥
यही निर्वाणभूमि ही धर्म का मार्ग है, आगे कोई न ज्ञान है और न उसे लेखा-जोखा (विवरण) है।
श्रावग, जैनधर्म मत के अन्तर्गत इनकी यही अन्तिम मान्यता है॥ ४॥
ध्यान ही आत्म ज्ञान बतलाता है, उसके आगे क्या है, वे उसका भेदभाव नहीं प्राप्त कर पाते। शास्त्र
की साक्षी अनेक प्रकार से कह देते हैं किन्तु इसी को खोजते-खोजते वे मर जाते हैं॥ ५॥
इस शास्त्र से परे एक विलक्षण ज्ञान की भिन्न गति है, सुनो! उसे बाईस प्रकार से मैंने देखा है
(देखा जाता है)। उसके उस पार सत्य ब्रह्म जैसा स्वामी है-उस स्थान को केवल संतों ने देखा है॥ ६॥
प्रति पद-पद में शून्य-ही शून्य है-वहाँ निर्वाण नहीं दिखता-वहाँ न ज्ञान है, न आत्मा है, न धर्म है, न
कर्म है-अर्थात् एक भी नहीं है॥ ७॥
वहाँ न सूर्य हैं, न चन्द्रमा हैं, न पृथ्वी है, न आकाश है-और सभी कुछ तीक्ष्ण वायु एवं जल से
घिरा हुआ है। उसके पार उस प्रिय विलक्षण ब्रह्म को देखो, और तुलसीदास ने भी हृदय की आँखों से
उसे देखा है॥ ८॥