घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १४७
अर्थ-तुलसी साहब ने तकी को दुखी देखकर उस निर्गुण ब्रह्म का मार्ग दिखा दिया। वे सुरति से
जुड़कर पर्वत शिखर पर जाकर शून्य पर दौड़कर चढ़ गये॥
॥ चौपाई ॥
तकी दीन गति गाइ सुनाई। दीन्हा सूरति पंथ लखाई॥
अर्थ-दीन सेख तकी के मार्ग को गाकर सुनाया और उसे सुरति का मार्ग दिखला दिया।
॥ सरन में आना तकी मियाँ का ॥
॥ दोहा ॥
तकी दस्त दोउ जोड़ि कै, करि सलाम सिर टेक।
नेक नजर अपनी करौ, बन्दा तकी निहाल॥
अर्थ-तकी मियाँ दोनों हाथों को जोड़कर तथा नमस्कार करते हुए शिर टेक कर बोले कि यह
बन्दा तकी निहाल हो चुका है, अब आप मेरे ऊपर कृपा करें॥
॥ चौपाई ॥
नेक निहाला नजर निहारौ। तुलसी बंदा तकी सम्हारौ॥
हमरा गुनह माफ सब कीजै। फजल करौ फिर अज्ञा दीजै॥
चले तकी मारग को जाई। कासी नगरी पहुंचे आई॥
अर्थ-थोड़ी देर के लिए तकी को निहाल करते हुए तुलसी साहब ने शेख तकी को सम्हाला। तकी
कहने लगे हे स्वामी जी! हमारी गलतियों को आप क्षमा करें-अब मुझे आज्ञा देकर मुझ पर फजल
(कृपा) करे। शेख तकी अपने मार्ग की ओर चल पड़े और धीरे-धीरे काशी नगरी में पहुँच गए॥
॥ दोहा ॥
चले तकी मारग गये, बीच बजार मँझार।
कर्मा पल्लीवाल की, गये दुकान के पास॥
अर्थ-शेख तकी उस मार्ग से चलते हुए काशी के बीच बाजार में पहुँचे और कर्मा पालीवाल की
दुकान पर गए॥
सम्बाद जैनियों के साथ
॥ चौपाई ॥
कर्मचंद इक पल्लीवाला। स्रावग जैन धर्म मत पाला॥
सो करै बनिज बजाजी कौरा। ताहि दुकान बाग तैहि मोरा॥
कर्मचंद ने कीन्ह सलामा। आदर बहुत कीन्ह सनमाना॥
सेख तकी कहै सुन रे भाई। कहौं फकीर अक खुदा गुसाईं॥
ता को सब बरतंत सुनावा। कर्मकंद तुलसी ढिंग आवा॥
कर्मचंद और धर्मा जैनी। सब पूछी पुनि हमरी कहेनी॥
कौन धर्म यह साध कहावा। जैन को धर्म मर्म जिन पावा॥
धर्मचंद और कर्मा जैनी। थापी उन निज अपनी कहेनी॥