घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
घट रामायण / १११
जिन सन्तों ने इस शून्याकाश की अटल अट्टालिकाओं को देख लिया है और रूप तथा लक्षणों
(रेख) से हीन ब्रह्म को हृदय में अपने को तन्मय कर दिया है, वह न कोई कंथ (कथा-शास्त्र) कहता
है और न किसी पंथ (ज्ञानमार्ग) को जानता है और न वह वेषभूषा (सन्तों जैसी) धारण करता है, वही
उस ब्रह्म के समस्त मार्गों में आत्म चित्त को साक्षात्कृत करके बैठा है॥२॥
॥ सोरठा ॥
ठुमरी ठौर ठिकान, अगम भान स्रुति पद लखा।
चखा अमर रस ज्ञान, पार पुरुष पद में मिली॥१॥
पिया भवन के माईँ, जाइ जोइ जस जस कही।
रही पुरुष पद छाइ, लई आदि अपने गई॥२॥
अर्थ-उसका ठौर ठिकाना ठुमरी ही है और उसी भाव में श्रुतियों ने निर्दिष्ट अगम्य सूर्य का स्थान
देखा है। इसी के माध्यम से उन्होंने उस ब्रह्म के अगम ज्ञान रस का स्वाद चखा है और मैं (आत्मा) उस
लोक (पार) में जाकर पुरुष (ब्रह्म) से मिल गई॥१॥
मैंने जो-
१२० / घट रामायण
अर्थ-सुरति रूपी दूरबीन की सहायता से शून्य शिखर पर चढ़कर मैंने उस आदि रूप अनादि तत्त्व
को हृदय रूपी नेत्रों से समाधि के क्षणों में साध कर देखा।
॥ चौपाई ॥
तुलसी निरखि देखि निज नैना। कोइ कोइ संत परखिहै बैना॥
जो कोइ संत अगम गति गाई। चरन टेकि पुनि महूँ सुनाई॥
अब जीवन का कहौं निबेरा। जा से मिटै भरम बस बेरा॥
जब या मुक्ति जीव की होई। मुक्ति जानि सतगुरु पद सेई॥
सतगुरु संत कंज में बासा। सुरति लाइ जो चढ़ै अकासा॥
स्याम कंज लीला गिरि सोई। तिल परिमान जानि जन कोई॥
छिन छिन मन को तहाँ लगावै। एक पलक छूटन नहिं पावै॥
स्रुति ठहरानी रहै अकासा। तिल खिरकी में निस दिन वासा॥
गगन द्वार दीसै इक तारा। अनहद नाद सुनै झनकारा॥
अनहद सुनै गुनै नहिं भाई। सूरति ठीक ठहर जब जाई॥
चूवै अमृत पिवै अघाई। पीवत पीवत मन छकि जाई॥
सूरति साथ संघ ठहराई। तब मन थिरता सूरति पाई॥
सूरति ठहरि द्वार जिन पकरा। मन अपंग होइ मानौ जकरा॥
चमकै बीज गगन के माईं। जबकि उजास पास रहै छाई॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने भली भांति निरखकर उस तत्त्व को अपनी हृदय-रूपी आँखों
से देखा है-कोई-कोई ही सन्त मेरी इस वाणी को समझेगा॥ जो कोई सन्त की गति का गान करता है,
उसी के स्वर में स्वर मिलाकर मैंने भी चरण टेक कर (उस ब्रह्म के प्रति) मैंने (महूँ) भी उस सत्त्व
को सुनाया है॥
अब मैं जीवन के वर्णन का निपटारा करता हूँ-जिससे कि भ्रमवश स्थित चित्त का बन्धन (घेरा)
समाप्त हो उठे। जब इस जीव की मुक्ति होगी-मुक्ति को समझकर साधक गुरुचरणों की सेवा
करेगा। सतगुरु (ब्रह्म) का निवास सहस्रार कमल में है, और जो साधक सुरति साधना द्वारा उस
शून्याकाश तक पहुँचता है वहीं उसे श्याम कमल लीला शिखर दिखाई पड़ता है-कोई-कोई ही सन्त जन
उसके तिल जैसे होने की प्रमाण गति को पहचानता है। वह साधक उस तिल जैसे तत्त्व पर क्षण-क्षण
मन को लगाए रहता है और एक पल के लिए वह ध्यान छूटने नहीं पाता॥
समस्त श्रुतियाँ उस आकाश में ठहरी रहती हैं और तिल की खिड़की में उनका निरन्तर निवास बना
रहता है। शून्याकाश के द्वार पर एक तारा दिखाई पड़ता है-और निरन्तर (अनाहत नाद की झंकार सुनाई
पड़ती है। हे भाई! अनाहत सुनाई पड़ती है किन्तु समझ में नहीं आती और जब भलीभाँति सुरति समाधि
ठहर जाती है, तब 'अमृत का निरन्तर स्राव होने लगता है और साधक तृप्त होकर उसका पान करता है
और उसका पान करते-करते मन सर्वथा परितृप्त हो उठता है॥
वह साधक सुरति के साथ आनन्द सिंधु में ठहर जाता है और तब साधक का स्थिर सुरति प्राप्त
करता है।
सुरति में स्थिर होकर जिन्होंने उस अगम्य के द्वार को पकड़ रखा है-उसका मन उसी में विलुप्त हो
उठता है, अपंग (जड़) की भाँति जकड़ उठता है। उस आकाश में हे सखी! विद्युत चमकती रहती है
और पास में उजाला छाया रहता है।
घट रामायण / १२१
॥ चौपाई ॥
जस जस सुरति सरकि सत द्वारा। तस तस बढ़त जात उँजियारा॥
सेत स्याम स्रुति सैल समानी। झरि झरि चुवै कूप से पानी॥
मन इस्थिर अस अमी अघाना। तत्त पाँच रँग बिधी बखाना॥
स्याही सुरख सपेदी होई। जरद जाति जंगाली सोई॥
तिल्ली ताल तरंग बखानी। मोहन मुरली बजै सुहानी॥
मुरली नाद साध मन सोवा। विष रस बादि बिधी सब खोवा॥
खिरकी तिल भरि सुरति समाई। मन तत देखि रहै टक लाई॥१
जब उजास घट भीतर आवा। तत्त तेज और जोति दिखावा॥
जैसे मंदिर दीप किवारा। ऐसे जोति होत उँजियारा॥
जोति उजास फाटि पुनि गयऊ। अंदर चंद तेज अस भयऊ॥
देखै तत सोइ मनहि रहाई। पुनि चंदा देखै घट माई॥
चंद्र उजास तेज भया भाई। फूला चंद चाँदनी छाई॥
सूरति देखि रहै ठहराई। ज्यों उजियास बढ़त जिमि जाई॥
ज्यों ज्यों सुरति चढ़ि चलि गयऊ। सेता ठौर ठाम लखि लयऊ॥
देख सैल ब्रहाण्ड समाई। तारा अनेक अकास दिखाई॥
महि अरु गगन देखि उर माई। और अनेकन बात दिखाई॥
कछु कछु दिवस सैल अस कीन्हा। ऊगा भान तेज को चीन्हा॥
तारा चंद्र तेज मिटि गयऊ। जिमि मध्यान भान घट भयऊ॥
ज्यों दोपहर गगन रबि छाई। तैसे उजास भया घट माई॥
ता के मधि में निरखि निहारा। घट में देखा अगम पसारा॥
सात दीप पिरथी नौ खण्डा। गगन अकास सकल ब्रह्मंडा॥
समुँदर सात प्राग पद बेनी। गंगा जमुना सरसुतौ बहिनी॥
औरै नदी अठारा गंडा। ये सब निरखि परा ब्रह्मंडा॥
चारौ खानि जीव निज होई। अंडज पिंडज उषमज सोई॥
अस्थावर चर अचर दिखाई। यह सब देखा घट के माई॥
अर्थ—जैसे-जैसे सुरति समाधि सुरति द्वार की ओर से सरक 'सत्य' द्वार की ओर आती है, वैसे-वैसे
उजाला बढ़ता जाता है। श्वेत और श्याम रूप में स्थित सुरति शून्य शिखर में समा उठती है, तब ऐसा
अनुभव होता है कि झर-झर झरता हुआ औंधे कुएँ का जल बरस रहा है।
इस अमृत से तृप्त होकर मन स्थिर है। संसार का पाँच तत्त्वों में रंग जाना विधि का विधान है—ये
स्याह रंग, लाल श्वेत पीला तथा हरा हैं। तिल जैसे ब्रह्मद्वार पर स्थित सरोवर की लहरों का वर्णन कर
१. मुं० दे० प्र० के पाठ में "टक लाई" की जगह "टकराई" है।
१२२ / घट रामायण
रहा हूँ, जहाँ मोहन श्रीकृष्ण की आनन्ददायिनी मुरली बजती रहती है। मुरली की ध्वनि साधु जनों के
मन का विश्राम करने लगती है और वासना के विषय रसों के विपरीत सभी विधाता के रंग में खो जाते
हैं। तिल की खिड़की सुरति में विलीन हो उठती है और मैं उस रूप को देखकर एकटक टकटकी
लगाए रखता है।
वह उजाला जब पिंड के भीतर आता है, वह तत्त्व को तेज और परम ज्योति दिखलाने लगता है।
जैसे मंदिर का दीपक, ठीक उसी प्रकार इस ज्योति से सर्वत्र उजाला हो उठता है॥ एक क्षण के लिए
इस ज्योति का प्रकाश फूट पड़ता है, फिर शरीर के अन्तःकरण में चन्द्रमा जैसी ज्योति निखर आती है।
फिर साधक, मन में स्थित उस तत्त्व को देखता रहता है, और उसके बाद घट के भीतर वह चन्द्रमा
देखता रहता है॥
चन्द्रमा का उजाला तेजमय प्रकाश में बदल जाता है-और चारों तरफ चन्द्रमा खिल उठता है और
उसकी चाँदनी छा उठती है। उस उजाले को देखती हुई सुरति भी एक क्षण के लिए ठहर जाती है और
तब ऐसा लगता है मानो उजाला बढ़ता जा रहा हो॥ ज्यों-ज्यों सुरति आगे चढ़कर चलती जाती है वह
चाँदनी की उज्ज्वलता का सार ठौर-ठामों (स्थानों) पर देख लेती है॥
वह उज्ज्वल पर्वत शिखर देखकर ब्रह्मांड में समा जाती है-जहाँ आकाश में अनेक तारागण दिखाई
पड़ते हैं। हृदय में ही पृथ्वी तथा आकाश को देखो तथा अन्य अनेक बातें भी यहाँ दिखाई पड़ती हैं॥
कुछ दिनों तक वह पर्वत शिखर इसी प्रकार रहता है और तब सूर्य का उदय होता है किन्तु उस सूर्य के
प्रकाश को कौन पहचानता है। सूर्य का तेज व्याप्त होने पर तारा समूह तथा चन्द्रमा का प्रकाश का समय
मिट जाता है, ठीक उसी तरह घट के भीतर सूर्य का प्रकाश है।
जैसे दोपहर में सूर्य आकाश में व्याप्त हो उठता है वैसा ही, प्रकाश घट के भीतर हो उठता है-उस
मध्य में अच्छी तरह निरख और निहार कर मैंने इस पिंड में अगम्य ईश्वर का प्रसार देखा है।
सात द्वीप एवं नौ खंडों वाली पृथ्वी-आकाश, अन्तरिक्ष तथा समस्त ब्रह्मांड में यह व्याप्त है। सात
समुद्र यहाँ हैं, प्रयाग (प्राग) और त्रिवेणी (ब्रेनी) है, साथ में, गंगा, यमुना तथा प्रवाहित सरस्वती भी
तथा नब्बे (अठारह गंडा) नदियाँ, ये सभी पिंड में (ब्रह्मांड के परे) दिखाई पड़ी।
चारों प्रकार के जीव समूह-अंडज, पिंडज, उष्मजआदि तथा 'स्थावर, चर, अचर आदि सभी घट
के भीतर ही दिखाई पड़े।
॥ चौपाई ॥
भिनि भिनि जीवन कर बिस्तारा। चारि लाख चौरासी धारा॥
और पहार नार बहुतेरा। जो ब्रह्मांड में जीव बसेरा॥
कछु कछु दिवस सैल अस कीन्हा। तीनि लोक भीतर में चीन्हा॥
जो जग घट घट माहिं समाना। घट घट जग जिव माहिं जहाना॥
ऐसे कड़ दिन बीति सिराने। एक दिवस गये अधर ठिकाने॥
परदा दूसर फोड़ि उड़ानी। सुरति सुहागिनि भइ अगमानी॥
सबद सिंध में जाइ सिरानी। अगम द्वार खिरकी नियरानी॥
चढ़ि गइ सूरति अगम ठिकाना। हिये लखि नैना पुरुष पुराना॥
ता में पैठि अधर में देखा। रोम रोम ब्रह्मांड का लेखा॥
अंड अनेक अंत कछु नाहीं। पिंड ब्रह्मांड देखि हिये माहीं॥
जहँ सतगुरु पूरन पद बासी। पदम माहिं सतलोक निवासी॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (ट्रांसक्रिप्शन) दिया जा रहा है:
घट रामायण / १२३
सेत बरन वह सेतइ साँईं। वहँ संतन ने सुरति समाई॥
सत्तहि लोक अलोक सुहेला। जहँवाँ सुरति करै निज केला॥
सूरति संत करै कोइ सैला। चौथा पद सत नाम दुहेला॥
परदा तीसर फोड़ि समानी। पिंड ब्रह्मांड नहीं अस्थानी॥
जहँवाँ अगम अगाधि अघाई। जहँ की सत गति संतन पाई॥
महुँ उन तार लार लरकाई। उन सँग टहल करत नित जाई॥
महुँ पुनि चीन्ह लीन्ह वह धामा। बरनि न जाइ अगमपुर ठामा॥
निःनामी वह स्वामी अनामी। तुलसी सुरति सैल तहँ थामी॥
जो कोइ पूछै तेहि कर लेखा। कस कस भाखों रूप न रेखा॥
तुलसी नैन सैन हिये हेरा। संत बिना नहिं होइ निबेरा॥
निज नैना देखा हिये आँखी। जस जस तुलसी कहि कहि भाखी॥
अर्थ-भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवन रूपों का विस्तार अर्थात् चार लाख चौरासी हजार प्रकार के
जीवों साथ में, अनेक पहाड़ और अनेकों नालें (नार) आदि जिसमें ब्रह्मांड के जीवों का निवास है
(मैंने देखा)।
अनेक दिनों तक पर्वत शिखर पर इस प्रकार रहकर अपने पिंड के भीतर स्थित तीनों लोकों को
पहचाना जो संसार घट-घट के भीतर समाया हुआ है, वही घट-घट का स्थित जीव सृष्टि (जहान) में
भी है।
इस प्रकार कुछ दिन यहाँ व्यतीत हुए फिर एक दिन मैं अन्तर-तल (अधर) के स्थान पर पहुँचा।
द्वार पर स्थित दूसरा पर्दा फट कर उड़ गया और तब सौभाग्यवती सुरति का आगमन हुआ। (सब्द)
समुद्र में जाकर खो गया फिर अगम द्वार की खिड़की समीप आई। सुरति समाधि अपने निवास स्थली
पर चढ़ गई और हृदय के नेत्रों से अपने उस पूर्व साथी पुरुष (ब्रह्म) को देखा। वहाँ बैठकर उसने
अन्तस्तल में रोम-रोम में ब्रह्मांड देखा।
अनेक लोक (पिंड) दिखाई पड़े-जिनके अन्त नहीं हैं और अपने हृदय में अनेकों पिंड एवं ब्रह्मांड
देखे-वहाँ पूर्ण पद निवासी सतगुरु (ब्रह्म) और उसके सहस्रार कमल में 'सत्य लोक' निवास करता
दिखाई पड़ा।
स्वामी ब्रह्म भी श्वेत वर्ण के हैं और वह सत्य लोक भी श्वेत वर्ण का है और वहीं संत गण सुरति
ध्यान में डूबे हुए दिखाई पड़े। इस सत्यलोक का आलोक बड़ा ही सुहावना (सुहेला) था जहाँ सुरति
स्वयं क्रीड़ा में लीन थी। कोई विरला साधु ही सुरति में क्रीड़ा (केलि-क्रीड़ा-केला) करता है। उसके
पश्चात् चौथे लोक का नाम 'सत लोक' है-जो नितान्त दुर्लभ है।
इसके पश्चात् तीसरे पर्दे को फाड़कर उसके आगे घुसी (समानी)। वहाँ न पिंड था, न ब्रह्मांड था,
न कोई स्थान विशेष ही)। यहाँ अगम्य अगाध, पूर्ण परितृप्त है-जिसकी थाह केवल संतों ने प्राप्त की
है) मैंने भी, उनकी संसक्ति में अपनी संसक्ति लगा दी (तरकाई) और नित्य प्रति उनके साथ जाकर
सेवा टहल करने लगा। मैंने उन्हीं के साथ उस धाम (लोक) की पहचान कर ली। उस अगम नगरी के
स्थानों का वर्णन नहीं किया जा सकता।
वहाँ स्थित स्वामी निःनामी तथा अनामी है-तुलसी साहब कहते हैं कि यह सुरति ध्यान का पर्वत
शिखर वहीं ठहरा है। उसके विषय में जो जैसा पूछता है-वही उसका सार्थक संदर्भ है-मैं किस-किस
रूप में उसके रूप तथा लक्षणों का वर्णन करूँ। तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने हृदय की आँखों से
जिस प्रकार का उसे देखा है, उसी-उसी प्रकार कह कर वर्णन करता हूँ॥
१२४ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
पिंड माँहि ब्रह्मांड, ताहि पार पद तेहि लखा।
तुलसी तेहि की लार, खोलि तीनि पट भिनि भई॥ १॥
तुलसी संत अनुकूल, कँवल फूल ता में धसी।
लसी जाइ सत मूल, फँसी पाइ सतगुरु सरन॥ २॥
खुलि गये अगम किवार, लील सिखर के पार होइ।
गिरा गगन के पार, पाइ सैल अस बिधि कही॥ ३॥
अंडा फूट अकास, होइ निरास सूरति चली।
अगम गली निज पाइ, तहँ आसन तुलसी कियौ॥ ४॥
हिरदे हरष समाइ, पाइ ताहि गति कस कही।
कोइ कोइ संत समाय, ताही तें गति तस भई॥ ५॥
अर्थ-पिंड (घट) के भीतर ही ब्रह्मांड है और उसके पार जाकर ब्रह्म का निवास देखा। तुलसी
साहब कहते हैं कि उसकी संसक्ति में तीनों पटों को खोलकर मैं भिन्न स्वरूप का साधु हो गया॥ १॥
सन्तों की अनुकूलता तथा सद्गुरु की शरण पाकर मैं सहस्त्रार कमल के मध्य जाकर विलीन हो
गया और उस 'सत्य' तत्त्व के मूल में जाकर संसक्त होकर फँस गया॥ २॥
फिर इसके बाद तो उस अगम के कपाट खुल गए और तब लीला शिखर के पार होकर पृथ्वी
तथा आकाश के उस पार शून्य शिखर को प्राप्त करके इस प्रकार कह रहा हूँ।
तुलसी साहब कहते हैं कि ब्रह्मांड (अंडा) आकाश में फूट गया और इसे देखकर सुरति निराश
होकर चल पड़ी और आगे एक अगम्य गली पाकर उसने वहाँ आसन जमा लिया॥ ४॥
उसे पाकर, उसकी गति का वर्णन कैसे किया जा सकता है, हृदय में हर्ष समाया हुआ है। कोई-
कोई सन्त उस अगम गली में प्रवेश करता है उसमें प्रवेश करते ही उसकी दशा तन्मयी (ब्रह्ममयी) हो
उठती है॥ ५॥
॥ छन्द॥
तीनों पट बाहिर कहूँ नहिं जाहिर। अगम अगत की राह लई॥
खोला वह द्वारा अगम पसारा। सतगुरु पुर के पार गई॥ १॥
सतलोक दुहेला कीन्ही सैला। अगम अकेला लार भई॥
ता से पद न्यारा निरखि निहारा। तासु अनामी नाम नहीं॥ २॥
फूला निज कँवला सूरति सम्हला। नील सिखर तन तार लई॥
अंडा निज फूटा दस दिस टूटा। छूटि सुरति असमान गई॥ ३॥
तुलसी तन सैला घट बिच खेला। संतकृपा से राह लई॥
ब्रह्मांड न पिंडा नहिं नौ खंडा। रबि चंदा तहँ तार नहीं॥ ४॥
पानी नहिं पवना अगिन न भवना। गगन गिरा के पार भई॥
देखा सत्त सैला अगम अकेला। सूरति केला सब्द मई॥ ५॥
तुलसी मत पाई संत लखाई। पास समाई गाइ कही॥ ६॥
घट रामायण / १२५
अर्थ-तीनों पटों के बाहर कुछ भी जाहिर (स्पष्ट) नहीं होता-साधक केवल अगम्य एवं अज्ञेय की
राह पकड़ लेता है। जैसे ही, साधक ने वह द्वार (चौथा द्वार) खोला-चारों ओर अगम्य ही प्रसरित
पसरा फैला हुए दिखाई पड़ता है-सतगुरु पुर के पार आत्मा चली गई ॥ १ ॥
दुर्लभ सत्यलोक में एक पर्वत शिखर है। वह अगम्य अकेला वहीं आत्मभूत तन्मय है-इसलिए
उसका स्थान विलक्षण है, अच्छी तरह से मूक साधक को देखा-वह अनाम है, कोई उसका नाम नहीं
है॥ २ ॥
अगने ही कमल दल वह तन्मय होकर आनन्दित है, सुरति ज्ञान से सम्बला हुआ है और अपने चित्त
का तारतम्य (एकतानता) नील शून्य शिखर से जोड़े हुए है। उसका ब्रह्मांड फूट पड़ा, समस्त दसों
दिशाएँ टूट चलीं और सुरति बन्धन से छूटकर शून्याकाश में विलीन हो गई ॥ ३ ॥
उस ब्रह्म का शून्य शिखर इस शरीर पिंड के बीच क्रीड़ा करता दिखा और संतों की कृपा से मैंने
सन्मार्ग पकड़ा। फिर वहाँ न ब्रह्मांड है, न पिंड है, न नौ खण्ड (लोक) हैं। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा एवं तारे
भी नहीं हैं। ४ ॥
न वहाँ जल है, वायु है, न अग्नि है, न पृथ्वी (भवन) है, न आकाश है। और आकाश शब्द के
पार जाकर स्थित हो उठा। तुलसी साहब कहते हैं कि इस प्रकार की अनुभूति पाकर मैंने सन्तों को
दिखाया-वह मेरे पास आकर समानिष्ट हो उठी और मैंने उसे इस प्रकार से गाकर सुनाया ॥ ५ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी निरखि निहारि, नैन पार निज देखि कै।
यह अदेख की बात, जिन अदृष्टि हिरदे लखा॥ १ ॥
तुलसी तुच्छ अबूझ, जबै सूझ सूरति लखी।
अलख खलक के पार, निः अच्छर वो है सही ॥ २ ॥
संत चरन पद धूर, तुलसी कूर कारज कियौ।
लिया अगम पद मूर, सूर सन्त अपना कियौ॥ ३ ॥
मैं उनकी बलिहार, लार लागि पारै कियौ।
चौथा पद निज सार, सो लखाइ संतन दियौ ॥ ४ ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने उसे भलीभाँति समझकर निहारकर और अपने नेत्रों के उस
पार देखकर उस अदृश्य मूल तत्त्व की चर्चा की है। उस अदृश्य को मैंने हृदय में देखा था ॥ १ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि उस अत्यन्त सूक्ष्म एवं अज्ञेय को जब सुरति ध्यान साधा, तब सूझ पड़ा।
इस संसार के उस पार, अलक्ष्य रूप वह निश्चय रूप से अक्षर शून्य हैं अर्थात् उसे अक्षरों में नहीं बाँधा
जा सकता ॥ २ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैं तो सन्त चरणों के पग की धूलि हूँ-मैंने उस अगम पद के मूल तत्त्व
को अपना लिया और दिव्य दृष्टि वाले साधक सिद्धों (सूर सन्त) को अपना बना लिया ॥ ३ ॥
मैं उनकी बलिहारी जाता हूँ-जिन्होंने उस ब्रह्म की संसक्ति से सम्बद्ध होकर संसार सागर को पार
कर लिया है। मेरी संत साधना का सार तत्त्व यह चतुर्थ पद है-जिसको मैंने सन्तों को दिखा दिया ॥ ४ ॥
भेद पिंड और ब्रह्मांड का
॥ चौपाई ॥
तुलसी मैं अति नीच निकामा। मैं अनाथ गति बूझि न जाना॥
मैं अति कुटिल कूर कुबिचारी। सत सत संत सरनि निरबारी॥
१२६ / घट रामायण
अब मैं अपना औगुन भाखी। निरनय जी की कोइ नहिं राखी॥
अपनी चाल गती गुन गाऊँ। मोहिं सों अधम और नहिं नाऊँ॥
संत दयाल दीन-हितकारी। मोरे औगुन नाहिं बिचारी॥
संत सरल चित सब सुखकारी। मो को पकरि हाथ निरबारी॥
कहँ लगि उनके गुन गति गाऊँ। मोर अचेत लखी नहिं काहू॥
मोरी तपन ताप निज हेरा। तुलसी नीच का कीन्ह निबेरा॥
कोटिन जिभ्या जो मुख होई। तौ मैं बरनि सकौं नहिं सोई॥
कोटिन कल्प-बृच्छ जो होई। तौ सरवर पावै नहिं कोई॥
तिनकी तीनि लोक रज पावन। कस बरनौँ मोरे मन भावन॥
तिन कौ भेद बेद नहिं पावै। वोहू नेति नेति गोहरावै॥
दस औतार और तिरदेवा। वोहु न उनको पावै भेवा॥
कहँ लग कहौं संत गति न्यारी। मोरी मति गति नाहिं बिचारी॥
तीनि लोक का पटतर लाऊँ। उन सम तुलसी कहा दिखाऊँ॥
मैं मत त्राहि त्राहि करि भाखी। ऐसी कौन बताऊँ साखी॥
संतन की गति कस कस गाऊँ। अस कोइ देखि परै नहिं ठाऊँ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं अत्यन्त तुच्छ तथा निकम्मा हूँ। सदा मैं अनाथ रहा हूँ और इस
संसार की गति की मुझसे समझ नहीं है। मैं अत्यन्त कुटिल, क्रूर और ना समझ हूँ किन्तु मुझे
अनेकानेक संतों की शरण ने विवेक दिया (निखारी) है॥
मैं अपने अवगुणों का वर्णन कर दिया है और हृदय (जी) के किसी निर्णय (निरनय) को
(छिपाकर) नहीं रखा है। मैं अपने व्यवहार एवं समझ का वर्णन कर रहा हूँ-(इस संसार में) मुझसे
अधम और कोई नहीं है॥
सन्तजन तो अत्यन्त दयालु एवं दीनों के हितैषी होते हैं-वे मेरे अवगुणों पर विचार नहीं करेंगे। संत
जन अत्यन्त सरस चित्त के तथा सभी के लिए सुखदायी होते हैं-उन्होंने मेरा हाथ थाम कर मुझे विवेक
दिया है॥
कहाँ तक मैं उनके गुणों और विवेक का वर्णन करूँ। किसी ने भी मेरी अज्ञनता (उनके
अतिरिक्त) नहीं देखी। उन्होंने मेरी पीड़ा और मेरे कष्टों को समझा-बूझा और तुलसी साहब कहते हैं कि
उन्होंने इस तुच्छ दास को संकट मुक्त किया॥
यदि मेरे मुख में कोटि-कोटि जीभें होतीं तो भी उनके उपकार का मैं वर्णन नहीं कर सकता। यदि
कोटि-कोटि कल्पवृक्ष भी हो तो भी वे उस (ज्ञान) सरोवर को नहीं प्राप्त कर सकते॥
तीनों लोकों में इन संतों की चरण रज पवित्र है-उनका वर्णन मैं कैसे कर सकता हूँ क्योंकि मेरा
मन तो संसक्तियों से भरा (भावन) है। उनकी समझ वेद आदि भी नहीं पा सकते और वे भी नेति नेति
कहकर पुकारते रहते हैं॥
ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों (त्रिदेवा) तथा विष्णु के दशावतार वे भी उनका भेद नहीं पा सकते हैं।
मैं कहाँ तक संतों की विलक्षण गति का वर्णन करूँ-मेरी बुद्धि उसकी गति का विचार नहीं कर
सकती॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैं तीनों लोकों के सादृश्यों को इकट्ठा भी कर दूँ तो सन्तों के सदृश कैसे
दिखाऊँगा। मैं और मेरी बुद्धि त्राहि-त्राहि करके कह रही है कि उनकी साक्षी (प्रमाण-समता) के लिए
घट रामायण / १२७
ऐसी किस वस्तु को बताऊँ (समझ में नहीं आती)। सन्तों के व्यवहार का मैं कैसे-कैसे वर्णन करूँ
ऐसी वस्तु किसी स्थान पर कहीं भी नहीं दिखाई पड़ती॥
॥ छन्द ॥
मोरी मति नीची माहुर सींची। संत चरन के लार भई॥
करमन कर मैली बिष रस पेली। संत चरन चित जाइ बसी॥ १॥
मति महा अति रंका मन निः संका। बिष रस कस की धार मई॥
कहँ लग गोहराऊँ अंत न पाऊँ। संत चरन की लार लसी॥ २॥
दरसन पाये करम नसाये। पाप पुन्य सब छार भई॥
मोहिं निरमल कीन्हा दयानिधि चीन्हा। ऐसे सिंध दरियाव मई॥ ३॥
तिनकी रज पावन तुलसी अपावन। मो से अधम को धाम दई॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मेरी बुद्धि निकृष्ट है और वह विष से सींची हुई है और वह सन्तों
के चरणों में संसक्त (लार) हो उठी है। कर्मवासनाओं से मैली तथा विषय वासनाओं से रौंदी हुई संतों
के चरणों में अत्यन्त प्रेमपूर्वक जाकर बसगई है॥ १॥
मेरा यह निःशंकित मन अत्यन्त रंक है और विषय वासनाओं के रस में फँसी हुई धारामयी है। कहाँ
तक उसको बुलाऊँ (बुलाकर सुधारूँ) इसका अन्त नहीं मिलता-मेरी संसक्ति तो संतचरणों में लग
चुकी है॥ २॥
संतों का मुझे दर्शन मिला, कर्म जाल नष्ट हो चला और पाप-पुण्य सब जलकर राखमय हो उठे॥
दयानिधि सन्त ने मुझे पहचाना और मुझे निर्मल बना दिया जैसे कोई समुद्र (संत) स्वयं नदीमय (मै
साधक) हो उठे, मेरी स्थिति जैसी हो रही॥ ३॥
तुलसी साहब कहते हैं कि सन्तों की पावन चरणरज ने मुझ जैसे अपवित्र को मुक्तिलोक प्रदान
किया॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी नीच निहार, संत सरन न्यारा किया।
महुँ पुनि उतरौं पार, संत चरन रज धूरि धर॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि इस पापी को देखकर संतों की शरणागति ने इसे विलक्षण बना
दिया। (उनकी कृपा से) मैं पुनः उनकी चरण रज को सिर पर रखकर मैं इस भवसागर के उस पार
उतरा॥
॥ दोहा॥
तुलसी मन निरमल भयौ, सूरति सार सुधार॥
संत चरन किरपा भई, उतरौ भौजल पार॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि सुरति तत्त्व को सुधार कर मेरा मन निर्मल हो उठा है। सन्त के
चरणों की यह कृपा है मैं अब भवसागर से पार उतर गया हूँ॥
॥ सोरठा॥
घट रामायन सार, ये अगार गति यों कही।
बूझै बूझनहार, बिन सतगुरु पावै नहीं॥
१२८ / घट रामायण
अर्थ-घट रामायण के सार तत्त्व के रूप में उस अगली गति का वर्णन इस प्रकार किया है। कोई
बूझने वाला ही इसे बूझ सकता है, किन्तु वह भी बिना सतगुरु के नहीं समझ सकता॥
॥ दोहा ॥
सतगुरु चरन निवास, निस दिन सूरति बसि रही।
संत चरन अभिलाष, पल छिन छिन छूटै नहीं॥ १॥
घट रामायन माहिं, अर्थ भेद अंदर सही।
रावन लंका राम, यह अकाम गति ना कही॥ २॥
अर्थ-सतगुरु के चरणों में निवास करते हुए प्रतिदिन सुरति ध्यान में चित्त बस रहा है और इस
प्रकार, सन्तों के चरणों की अभिलाषा एक दल और एक क्षण के लिए भी नहीं छूट पाती ॥ १ ॥
घट रामायण के अन्तर्गत सम्पूर्ण अर्थ तथा उसका रहस्य घट के अन्तर्गत हैं और वही ठीक भी है।
रावण, लंका एवं राम सभी उसके अन्दर ही हैं-यह समझ कामना रहित है और उसकी गति का वर्णन
नहीं किया जा सकता ॥ २ ॥
॥ सोरठा।
दसरथ सीता नाहिं, भरत सत्रगुन ना कह्यौ।
ये निरखौ घट माहिं, बाहिर गति मति भरम है॥ १॥
घट रामायन माहिं, घट बिधि गति मति सब कही।
परखै परम निवास, यह अकास अंदर मई॥ २॥
अर्थ-सीता तथा दशरथ बाहर नहीं है, भरत शत्रुघ्न भी बाहर नहीं कहे गए हैं। इन सबको घट में ही
देखो, इनके पिंड के बाहर होने की गति बुद्धि का भ्रम है॥ १॥
घट रामायण के अन्तर्गत मैंने पिंड (घट) की विधि, ज्ञान तथा समझ सबके विषय में बताया है
ताकि साधक इस घटाकाश में स्थित उनके रमणीक निवास को समझ सके ॥ २ ॥
॥ चौपाई ॥
रावन राम भेद समझाई। रामायन सब घट बिधि गाई॥
संत की गति अगति अगोई। अगम निगम घर सुरति समोई॥
संत गती गति बेद न जाना। सिम्रित सास्तर और पुराना॥
पंडित भेष भक्त और ज्ञानी। जोगी परमहंस नहिं जानी॥
स्रावग तुरक तोल नहिं पाया। भरमे सबहि काल गोहराया॥
अर्थ-रामायण में घट विधि के रूप में गाकर मैंने रावण तथा राम का भेद समझाया है। संतों की
गति अगम एवं स्पष्ट (अगोई) हैं। उनका अगम-निगममय घर सुरति ज्ञान में ही समाया हुआ है॥
सिद्ध (गती) सन्त का भेद वेद नहीं जानता-स्मृति (सम्रित) शास्त्र और पुराण भी नहीं समझते,
नाना प्रकार के वेष धारण करने वाले पंडित, भक्त और ज्ञानी योगी, परमहंस भी नहीं जानते-जैन
श्रावक, तुर्क भी उसे तौल नहीं पाते (मूल्यांकन नहीं कर पाते) वे सभी भ्रम में भ्रमण करते रहते हैं
और अन्त में काल (मृत्यु) उन्हें बुला लेती है।
घट रामायण / १२९
॥ दोहा ॥
पंडित ज्ञानी भेष, यह अदेश गति ना लखी।
स्रावग तूरक न देख, सत सार अंदर चखी ॥
अर्थ-पंडित, ज्ञानी, आडम्बर वेषधारी आदि इस अदेख (घट रामायण) की गति के अर्थ को नहीं
जानते। इस घट के भीतर चलने वाली प्रक्रिया और मूलतत्त्व को स्रावक (जैन) एवं तुर्क भी नहीं देख
पाते॥
॥ चौपाई ॥
ये सब भूल भाव गति गाई। तन भीतर काहू नहिं पाई ॥
ये तन भीतर संतन देखा। यह अदेख गति कहौं अलेखा ॥
गंगा जमुना और त्रिबेनी। तन भीतर ब्रह्माण्ड की सैनी॥
पृथ्बी पवन गगन अकासा। यह सब देखे घटहि निवासा॥
पाँच तत्त जल अगिनि समाना। पिंड माहिं ब्रह्मांड बखाना॥
रबि चंदा तारागन होई। और अनेक बिधान समोई॥
बाहिर भर्म भेद गति गावैं। पाहन पानी से लौ लावैं॥
तीरथ बरत जो चारौ धामा। यह सब पाप पुन्य निज कामा॥
पूरब पच्छिम फिर फिरि धावैं। सत्त पुरुष की राह न पावैं ॥
सत्त पुरुष सत नाम कहाई। वह अनाम गति संतन पाई॥
सत्त नाम से निर्गुन आया। यह सब भेद संत बतलाया॥
पाँच नाम निरगुन के जाना। निरगुन निराकार निरबाना॥
और निरंजन है धर्मराई। ऐसे पाँच नाम गति गाई॥
सोई ब्रह्म परचंड कहाई। ता को जपै जगत मन लाई॥
दस औतार ब्रह्म कर होई। ता को कहिये निरगुन सोई॥
तिन पुनि रचा पिंड ब्रह्मांडा। सात दीप पृथ्बी नौ खंडा॥
सब जग ब्रह्म ब्रह्म करि गाई। आदि अन्त की राह न पाई॥
यह गति मति बिधि मैं पुनि भाखा। कोई जगत न सूझी आँखा ॥
यह विधि सत मति भेद बताई। काहू के परतीत न आई॥
कासी पंडित और अचारी। जोगी परमहंस ब्रह्मचारी॥
कहै तुलसी कोइ भेद न पाया। यह सब भाव भेद भरमाया॥
अर्थ-मैंने इन सब मूल भावों की गति का गान किया-जिसे मन के भीतर (इन) किसी ने भी नहीं
प्राप्त किया है। इस शरीर के भीतर इसे सन्तों ने देखा है। इस अदेख की अलक्ष्य गति का मैं वर्णन
करता हूँ॥
गंगा, यमुना और त्रिवेणी-इस शरीर के भीतर (इड़ा, पिंगला, सुषम्ना के रूप में) इस शरीर के
भीतर ब्रह्मांड की सरणि में हैं। पृथ्वी, पवन, गगन और आकाश इनका निवास मैंने घट के अन्दर ही
देखा है॥
१३० / घट रामायण
पाँचों तत्त्व जल और अग्नि की ही भाँति पिंड के ही भीतर वैसे ही हैं, जैसे ब्रह्मांड में। यहीं सृष्टि
की ही भाँति सूर्य, चन्द्रमा एवं तारागण हैं-तथा अन्य सृष्टि विधान भी यहाँ समाए हुए हैं॥
बाह्य संसार के भ्रम तथा भेद की गति सभी गाते हैं और वहाँ साधुजन पत्थर (मूर्तिपूजा) एवं जल
(स्नान, तर्पणादि) में अपनी धार्मिक निष्ठा लगाते हैं॥ तीर्थ, व्रत और चारों धाम में सब पाप-पुण्य की
अपनी कल्पना है॥
पूरब, पश्चिम में परिक्रमाएँ करके पुनः पुनः जाते हैं-किन्तु ये सब सत्य पुरुष का मार्ग नहीं पाते हैं।
सत्य पुरुष-सत्य नाम से जाना जाता है (कहा जाता है) और उसका कोई नाम नहीं होता (अनाम)
ऐसी अवस्था इन सन्तों ने प्राप्त कर ली है॥
इन सारे भेदों को सन्तों ने बताया है-सत्य नाम से ही निर्गुण का प्राकट्य होता है। इस निर्गुण के
पाँच नाम हैं-निर्गुण, निराकार, निर्वाण, निरंजन और धर्मराज-इस प्रकार से उसके पाँच नाम हैं॥
वही व्यापक (प्रचंड) ब्रह्म है, जिसमें संसार अपना मन लगाकर गान करता है। इस ब्रह्म के दस
अवतार होते हैं-उसी को निर्गुण ब्रह्म कहा जाता है॥
उसी ने इस पिंड और ब्रह्मांड तथा सात द्वीप, पृथ्वी एवं नौ खण्डों की रचना की है। उसी को सारा
संसार ब्रह्म है, ब्रह्म है कहकर गान करता है, किन्तु उसके आदि अन्त का मार्ग कोई नहीं जानता॥
अपने ज्ञान और अपनी बुद्धि तथा विधि द्वारा मैंने उसका वर्णन किया है-सम्भव है, यह किसी के
विश्वास का विषय न बने। काशी के विद्वान् पंडित और धर्माचरण से सम्बद्ध विद्वान योगी, परमहंस
तथा ब्रह्मचारी आदि ने उसका रहस्य नहीं प्राप्त किया है। तुलसी साहब कहते हैं कि इन सबने तो उस
ब्रह्म के स्वरूप तथा भेद के विषय में निरन्तर लोगों को भरमाया है॥
हाल काशी का
॥दोहा॥
तुलसी ग्रन्थ पसार, कासी नगर सगरे भई।
पंडित ज्ञानी भेष, जैन तुरक सब मिलि कही॥१॥
तुलसी बाम्हन साध, गंगाजी पार रहतु है।
निंदत सिम्रित बेद, यह अभेद गति कहतु है॥२॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि हमारे ग्रन्थ का प्रचार (प्रसार) काशी नगरी में चारों तरफ हुआ
और पंडित, ज्ञानी, भेष, जैन, तुर्क इन सभी ने मिलकर कहा॥१॥
एक तुलसी नाम का साधु ब्राह्मण है, गंगा नदी के उस पार रहता है-वेद स्मृतियों की निन्दा करता
रहता है और (ब्रह्म की) रहस्यमयी गति का वर्णन करता है॥२॥
॥चौपाई॥
सब पंडित मिलि मता उठाई। या को करिये कौन उपाई॥
नैनू नाम इक पंडित भारी। तेहि पंडित मिलि सोच बिचारी॥
तुलसी नाम इक साध कहाये। जिन सब नेम अचार उठाये॥
ग्रंथ बनाइ कीन्ह एक भाषा। तीरथ बरत एक नहिं राखा॥
वा कौ भेद भाव सब लीजै। केहि बिधि ज्ञान समझ तेहि कीजै॥
स्यामा समझ एक बतलाई। रहन पास कोइ ताहि बुलाई॥
पंडित एक कही समझाई। रहन अहीर सोइ भाखि सुनाई॥
घट रामायण / १३१
नाम जानि इक ह्रिदे अहीरा। निसि दिन आबै हमरे तीरा॥
सुनै कथा पुनि सेवा कटई। गत दिवस बस पासै परई॥
नैनू मिलि सब बाम्हन भाई। तिनि पुनि ह्रिदे अहीर बुलाई॥
सब पंडित अस पूछन लाई। कौन ज्ञान यह कहत गुसाँई॥
वेद भेद मरजाद उठावै। सिम्रित सास्तर ना ठहरावै॥
गंगा जमुना अन्तर मानै। है परतच्छ ताहि नहिं जानै॥
पूजा पत्री और अचारा। तीरथ बरत कहै झूठ पसारा॥
राम रहीम एक नहिं, मानै। यह कछु ठौर और कछु ठानै॥
अर्थ-सभी पंडितों ने मिल कर यह तय किया कि इसके लिए क्या उपाय किया जाए। नैनू नाम के एक बड़े पंडित थे-उन्होंने उन पंडितों के साथ मिलकर सोच विचार किया॥
तुलसी नाम के एक साधु कहे जाते हैं जिन्होंने सारे नियमों तथा आचरणों को समाप्त सा कर दिया है (उठाये)। यह सब एक ग्रन्थ बनाकर किया है और उन्होंने तीर्थों एवं व्रतादि एक भी तत्त्व की रक्षा नहीं की है॥
उनके इस प्रकरण में सारे रहस्य (भेदभाव) लें और उनका ज्ञान किस प्रकार का है, उसे समझकर उसके लिए निर्णय लीजिए॥ हे श्यामा! मैं एक समझदारी की बात कहता हूँ-उसे समझो, उनके पास जो कोई रहता हो, उसे बुलवा लीजिए॥
एक पंडित ने समझाकर कहा कि-एक अहीर उनके पास रहता है, उसी को आने के लिए कहकर बुलाओ। हृदय अहीर का नाम जानकर-जो रात-दिन पास आता था। वह मुझसे कथाएँ सुनता था और फिर वह सेवा में तत्पर रहता था और रातदिन हमारे पास ही पड़ा रहता था।
नैनू और समस्त ब्राह्मण बन्धु मिलकर उन्होंने फिर उस हृदय अहीर को बुलवाया। समस्त पंडित इस प्रकार पूछने लगे कि यह (तुलसीदास गोस्वामी) किस ज्ञान की बात करता है।
उनकी बातें सुनकर हृदय ने उत्तर दिया यह गोस्वामी वेदों के भेद की मर्यादा को समाप्त करके (उठावें) स्मृति एवं शास्त्र ज्ञान को नकारते हैं। वे गंगा और यमुना के अन्तर को मानते हैं और जो लोकधर्म प्रत्यक्षतः दिखाई पड़ता है (मूर्तिपूजा, तर्पण आदि) उनको महत्त्व नहीं देते॥
पूजा-पत्री तथा अन्य आचरण एवं तीर्थ-व्रतादि को मिथ्या प्रसार कहते हैं। राम तथा रहीम दोनों में से किसी को भी नहीं मानते हैं और वे कुछ देर तक परम्परा से हटकर कुछ अन्य बातें कहते हैं।
॥ दोहा ॥
दीन्हा ह्रिदे जवाब, साफ बात बिधि यों कही।
गति सत संत अपार, पंडित बिधि जानै नहीं॥
अर्थ-हृदय ने इस प्रकार का उत्तर दिया और सारी बातें साफ-साफ इस प्रकार कह दी। उन संत का ज्ञान अनन्त है, पंडित जन तो किसी विधि से उसे नहीं जान सकते॥
॥ चौपाई ॥
ह्रिदे अहीर ज्वाब अस दीन्हा। संत गती कोइ बिरले चीन्हा॥
मैं तौ अपढ़ जाति अज्ञाना। तुम पंडित पढ़े बेद पुराना॥
संतन की गति कहौं बुझाई। तुमहुँ ने बेद भेद नहिं पाई॥
पढ़ि पढ़ि पंडित पचि पचि हारी। बेद न भेद संत गति न्यारी॥
१३२ / घट रामायण
अर्थ-हृदय अहीर ने उत्तर दिया कि सन्तों की गति कोई विरला ही पहचानता है-मैं तो अपढ़ एवं
अज्ञानी जाति का हूँ और आप लोग पंडित (ज्ञानी) हैं और वेद-पुराण पढ़ते रहते हैं॥
यदि आप लोग कहें तो मैं सन्तों की दशा का वर्णन करूँ, आप लोग उनकी गति की जानकारी
वेदों द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते। पंडित जन पढ़-पढ़कर और कर्म-कर करके हार गए किन्तु सन्तों की
न्यारी गति का भेद वेदों ने नहीं दिया॥
॥ सोरठा ॥
नैनू कहै बिचार, यह निकाम कस भाखेऊ।
यह जड़ जाति गँवार, बेदन सों न्यारी कहै॥
अर्थ-नैनू पण्डित उस पर विचार करते हुए कहते हैं कि यह जड़ जाति का गँवार निष्काम तत्त्व को
कैसे बता सकेगा, (यह तो इसकी मूर्खता है कि) कि इसे वह वेदों से विलक्षण कह रहा है॥
॥ चौपाई ॥
नैनू सुनि पुनि मारनि धाये। पंडित और अनेक बुलाये॥
सब से कहै सुनौ तुम ज्ञाना। यह अहीर कस करत बखाना॥
सब पंडित मिलि यह बिधि ठानी। या की करौ प्रान की हानी॥
यह सब मिलि कर मता उठाई। हिरदे ऊपर लात चलाई॥
अर्थ-नैनू पण्डित यह सुनकर उसे मारने दौड़े और अनेक पंडितों को बुला लिया। उन्होंने सभी से
कहा कि तुम इसके ज्ञान को सुनो-यह अहीर उसका कैसे वर्णन कर रहा है। सब पंडितों ने इसे
सुनकर, ऐसा निश्चय किया कि इसके प्राण की हानि करो (मार डालो)। यह सुनकर ऐसा करने का
सभी ने निश्चय किया और हृदय अहीर के ऊपर लात चला दिए॥
॥ सोरठा ॥
तुरक तकी इक स्वार, जात हते दरबार को।
घोड़ा फेरि निहार, यह बिबाद कैसे भई॥
अर्थ-एक तुर्क मीर तकी नामक घुड़सवार (स्वार) दरबार के लिए जा रहे थे। उन्होंने घोड़े को
फेरकर देखा कि यह विवाद क्यों घटित हुआ॥
॥ चौपाई ॥
सेख तकी इक तुरुक सवारा। ते पुनि जात हते दरबारा॥
सुन करि बात बाग उन मोड़ा। फेरि लगाम कीन्ह उन घोड़ा॥
सेख तकी पूछी पुनि बाता। तैं कहु कौन कौन सी जाता॥
केहि कारन यह झगरा होई। सो सब भेद कहौ बिधि सोई॥
अर्थ-शेख तकी नामक एक सवार तुर्क जो वे उस समय राज दरबार में जा रहे थे, उन्होंने यह बात
सुनकर घोड़े की लगाम रोकी और लगाम को फिराकर घोड़ा उनकी ओर मोड़ दिया॥
तब शेख तकी ने उनसे यह बात पूछी-तुम बताओ, किस-किस जाति के हो। किस कारणवश यह
झगड़ा हो रहा है-यह सारा रहस्य मुझे बताओ॥
घट रामायण / १३३
॥ सोरठा ॥
नैनू निरखि पुकार, सेख तकी को देखि कर।
ये का कहत गँवार, बिधि कुरान मानै नहीं॥
अर्थ-शेख तकी को देखकर नैनू ने पुकार कर कहा, यह गँवार क्या कह रहा है, यह कुरान शरीफ़
की व्यवस्था नहीं स्वीकार करता॥
॥ चौपाई ॥
नैनू कहै सुनौ मेहरबाना। बेद कितेब न मानै पुराना॥
राम रहीम एक नहिं मानै। पंडित काजी झूठ बखानै॥
अर्थ-नैनू पंडित ने कहा, हे मेहरबान? सुनें, यह वेद, शास्त्र एवं पुराणों को नहीं मानता। यह राम
तथा रहीम दोनों में से एक को भी नहीं मानता तथा पंडित एवं काजी दोनों को झूठ कहता है॥
॥ सोरठा ॥
हिरदे कही बिचारि, सेख तकी जो तुरक से।
तुम बूझौ दिल माहिं, खुदा एक सब में कहौ॥
अर्थ-हृदय अहीर ने अत्यन्त विचारपूर्वक उन शेख तकी तुर्क से कहा कि आप दिल से समझकर
बताइए-सभी ने खुदा को एक ही कहा है॥
॥ चौपाई ॥
हिरदै कहै तकी सुनु सेखा। सब में कहौ खुदा है एका॥
गाय मार बकरी तुम खइया। येहि किताब में कह्या गुसँइयाँ॥
सब में नूर मुहम्मद केरा। काटि गला पुनि पैहौ बैरा॥
येही कितेब कुरान बखाना। जिन्दा को मुरदा करि जाना॥
सोई मुसलमान है भाई। नवी नाम हर दम लौ लाई॥
रोजा कर कर खून बिचारा। ये गुनाह नहिं बक्सनहारा॥
झूठा रोजा झूठ निवाजा। झूठा अल्ला करै अवाजा॥
वा साहिब की राह न पाई। सब जहान में रहा समाई॥
अर्थ-हृदय अहीर ने कहा कि हे शेख तकी सुनें, कहते हैं, सभी में खुदा एक हैं। तुम गाय और
बकरी मारकर खाते हो, किस पुस्तक में ईश्वर द्वारा यह कहा गया है। सभी जीवों में मुहम्मद साहब
पैगम्बर का नूर (प्रकाश) है-उनका गला काटकर, उनका क्रोध ही प्राप्त करोगे।
क्या यही शास्त्र और कुरान में कहा गया है कि जीवित को मुर्दा मानकर समझो। मुसलमान वही
है-जो निरन्तर नबी के नाम की लौ लगाए रहता है। रोजा रख रखकर रक्तपात पर कभी विचार लिया
है, इस गुनाह (अपराध) को कोई क्षमा करने वाला नहीं है॥ रोजा भी झूठा है- नमाज भी झूठा है और
'अल्ला हो-अल्ला हो' की लगाई वाली आवाज भी झूठी है। उस साहब (स्वामी - ईश्वर) की कोई
राह नहीं पाया है-वह सारे संसार में समाया हुआ है॥
१३४ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
सेख तकी सुन बात, ज्वाब सवाल बोले नहीं।
धर्मा जैनी जाति, संग बात कीन्ही सही॥
अर्थ-शेख तकी उस बात को सुनकर उसके जबाब एवं सवाल (उत्तर तथा प्रश्न) के संदर्भ में
कुछ नहीं बोले—साथ में धर्मा नाम के जैनी पंडित थे, उन्होंने बातें कहीं॥
॥ चौपाई ॥
धर्मा नाम जाति इक जैनी। उन सब सुनी हमारी कहनी॥
धर्मा स्रावग कहै बिचारी। जैन मता है सब से भारी॥
ये मति आदि साध नहिं जानै। तैं मत झूठा बाद बखानै॥
चौबीसों तीर्थंकर जानी। आदि नाथ हैं हमरे स्वामी॥
तिनकी आदि कहा तुम जानौ। नाहक बेगुन बादि बखानौ॥
अर्थ-धर्मा नाम का एक जैन धर्ममतावलम्बी थे। उसने हमारी बातचीत सुनी। श्रावक धर्मी
विचारपूर्वक बोले, कि जैन मत सर्वश्रेष्ठ है। जो धार्मिक मत साधुओं का आदि रूप नहीं जानता, वह
मत झूठे सिद्धान्तों का वर्णन करता है। चौबीसों तीर्थंकरों को समझो और हमारे स्वामी तो आदि नाथ हैं।
उनके आदि उपदेश (कहा) तुम समझो निरर्थक बिना तत्त्व के सिद्धान्तों को बता रहे हो॥
॥ सोरठा ॥
हृिदै कहै सुनु बात, जैन मता पुनि सब कहौं।
सुनौ भेद बिख्यात, आदि अंत सब समझि कै॥
अर्थ-हृदय अहीरने कहा मेरी बातें सुनो, जैन धर्म के विषय में मैं पुनः सच कहता हूँ, इसके विज्ञान
भेद को, इसके आदि अन्त को समझकर सुनो॥
॥ चौपाई ॥
हिरदै कहै सुनौ हो भाई। आदि नाथ की आदि सुनाई॥
जो तुम सुनौ कहौं बिधि नाना। हम सब कहैं सुनौ दै काना॥
प्रथम जुगल्या धर्म बिचारी। आई छींक भये सुत नारी॥
होते छींक प्रान तेहि जाई। कन्या पुत्र भये तेहि ठाईं॥
ता पीछे कुलंकर की बाता। चित दे सुनौ कहौं बिख्याता॥
चौथा कुलंकर भेद बखाना। ता में नभ राजा इक जाना॥
मुरा देबि देहिं भाखौं भेवा। जाकर ऋषभराय भये देवा॥
भागवत कहै ताहि अवतारा। तिन का सुनौ आदि निरबारा॥
ता ने तप कीन्हौ निरबाना। मुक्ति पाइ पुनि काल समाना॥
ऐसे भये और चौबीसा। पुनि पुनि आये मुक्ति पद ईसा॥
ता में प्रथम ऋषभदेव होई। भाखा तिन जग थापा सोई॥
आगे भेद न उनहूँ जाना। यह सुन सार भेद निरबाना॥
घट रामायण / १३५
जग थापा पुनि धर्म चलाई। आदि पुरान में देखौ भाई॥
कह नौकार जाए बतलाई। जाकी विधी कहाँ समझाई॥
जाप भेद मैं कहौं पुकारी। दिल अपने में लेउ बिचारी॥
अरिहँत सिद्ध भाखि बिधि नामा। अरियानं उज्झान जाना॥
लोये सर्व साध को कीन्हा। ये नौकार मन्त्र उन लीन्हा॥
सुनि धर्मा तब चकृत भयऊ। सब बरतंत जैन कौ कहेऊ॥
अर्थ-हृदय ने कहा, हे भाई? सुनो, आदि नाथ की आदिकथा मैं सुनाता हूँ। यदि तुम उसे सुनना
चाहते हो तो मैं उसे नाना विधियों से कहता हूँ। (इस कथा को) हम सब कहते हैं, हृदय से ध्यान
लगाकर सुनो ॥
प्रथम 'जुगल्या' धर्म पर विचार करता हूँ। छींक आई और उससे चार बच्चे पैदा हुए। छींक आते ही
उसके प्राण विनष्ट हो उठे और उस स्थल पर कन्या तथा पुत्र हुए। उसके पीछे कुलंकर की बातें कहता
हूँ। लोक में प्रसिद्ध कथा को चित्त लगाकर सुनो।।
मैं चौथे कुलंकर की बात कहता हूँ-उसमें नभ नामक एक राजा था। उसको मुरा देवी ने सारा ज्ञान
रहस्य बताया-जिसके ऋषभ राय हुए। भागवत में ऋषभराय अवतार बताए गए हैं-उनके विषय में मूल
निराकरण सुनें। उन्होंने तपस्या करके निर्वाण प्राप्त किया और मुक्ति पाकर वह काल में समाहित हो
उठे। इसी प्रकार अन्य चौबीस तीर्थंकर हुए और वे मुक्त होकर बार-बार ईश्वर में विलीन हुए ॥
इन समस्त तीर्थंकरों में सर्वप्रथम ऋषभदेव हुए-उन्होंने जिस मत का उपदेश दिया, वही संसार में
स्थापित हुआ। उसके आगे उन्होंने भी भेद नहीं समझा-तुम उस निर्वाण भेद के सार तत्त्वों को सुनो।
उन्होंने जैन धर्म चलाकर संसार में उसकी स्थापना की। हे भाई! इसे जाकर आदि पुराण में पढ़ो।
उन्होंने नौ प्रकार के जापों की चर्चा की है-उनकी विधियाँ मैं समझाकर कहता हूँ। मैं जापभेदों के
विषय में पुकार कर कहता हूँ, आप इसे अपने दिल में विचार लें।
अरिहंत, सिद्ध तथा विधिपूर्वक नामों का कथन करके अरियान, उज्झान लुप्त (लोए) एवं सर्व
साध-आदि नौकार मंत्र उन्होंने बतलाया था?
इसे सुनकर धर्मा जैनी चकित हो उठा कि इसने तो जैन मत का सारा वृत्तान्त बता दिया।
॥ दोहा ॥
सुनिधर्मा यह भेद ये अभेद कछु दीन कहैं।
जैन मत समझाइ ये अकाय कछु अगम हैं॥
अर्थ-धर्मा ने इस भेदों को सुनकर कहा ये भेद अभेद्य हैं-जैनमत के अन्तर्गत ये वैचारिक
(अकाय) तथा अगम्य मत हैं (इस हृदय अहीर को कैसे ज्ञात हुआ)।
॥ चौपाई ॥
सेख तकी पंडित भये एका। धर्मा धर्म कि बाँधी टेका॥
ये तीनों तुलसी पै आये। हिरदे ऊपर बाँह चढ़ाये॥
और अनेक मूरख बहुतेरे। कोइ सूधे कोइ चलैं अनेरे॥
हिरदे अहीर चले सब झारी। जहाँ तुलसी ने कुटी सँवारी॥
हिरदे अहीर साथ झख भारी। तब तुलसी ने मता बिचारी॥
१३६ / घट रामायण
सब चलि आये कुटी के पासा। जब तुलसी मन कियौ हुलासा ॥
उठि के चरन गहे सब केरे। कीन्ही दया दीन तन हेरे ॥
बाम्हन पंडित धर्मा जैनी। सेख तकी से कीन्ही सैनी ॥
नैनू पंडित सैन सँवारा। धर्मा हिये उठै जस झारा ॥
यह दोनों मिलि मता बिचारी। सेख तकी को आगे डारी ॥
नैनू नोक टोक इक झारा। यह इनके हैं गुरू बिचारा ॥
पूछे भेद कहैं निरवारा। इन कस भाखा झूठ पसारा ॥
अर्थ-शेख तकी और पंडित एक हो गए और धर्मा ने धर्म की टेक बाँध ली। ये तीनों तुलसी
साहब के पास गए इनके हृदय उद्विग्न थे और बाहें चढ़ी हुई थीं।। उनके साथ और अनेक मूर्ख जन थे-
कोई सीधे चलता था को कोई टेढ़े चलता था। हृदय अहीर के साथ सब एक हो चले और वहाँ आए,
जहाँ तुलसी ने अपनी कुटी सँवार रखी थी॥
हृदय अहीर के साथ बड़ी भीड़ थी, तब तुलसी साहब ने मन-ही-मन विचार किया। सब उनकी
कुटी के पास चलकर आए तब तुलसी ने मन में आनन्द प्रगट किया।। उन्होंने उठकर सबके चरणों में
प्रणाम किया (स्पर्श किया) और कहा कि आप सब इस दीन की ओर देखकर दया करें॥
ब्राह्मण, पंडित, जैनी धर्मा और शेख तकी की ओर देखा। नैनू पंडित ने नेत्रों से इशारा किया और
धर्मा जैनी के हृदय में आग की लपट जैसी उठ पड़ीं॥ उन दोनों ने मन में विचार करके शेख तकी को
आगे कर दिया।
नैनू पंडित ने पहले नोक झोंक शुरू कर दी-ये बेचार के इनके (हृदय अहीर के) गुरु हैं। इनसे
ज्ञान के भेदों की बात आप पूछिये ये इसका निराकरण करेंगे और आप इनसे पूछे कि इन्होंने इस प्रकार
असत्य का प्रसार क्यों किया है।
॥ सोरठा ॥
हिरदै कहै निहोर, स्वामी तुलसी विधि सुनौ।
मैं कछु कही न और, ये अबूझ बूझी नहीं ॥
अर्थ-हृदय अहीर ने सम्बोधित करके कहा कि हे स्वामी तुलसी साहब? इसे विधिपूर्वक सुनें-मैंने
अपनी तरफ से कोई नई बात नहीं कही (आपकी ही बातें बताई) किन्तु उस अबूझ वाणी को ये सब
समझ नहीं पाए॥
॥ चौपाई ॥
हिरदे कहै सुनौ हो स्वामी। मैं कछु कही रीति गति ज्ञानी ॥
नैनू पंडित कहै बिचारी। इन सब ज्ञान कही गति न्यारी ॥
इन सब धर्म कर्म जग पेला। अस कस ज्ञान कहै यह चेला ॥
इन सब बेद कितेब उठावा। जौगी जैन नहीं ठहरावा ॥
और अनेक बात नहिं मानै। अस कह मन्त्र सुनायौ कानै ॥
तब तुलसी सुनि आदर कीन्हा। प्रीति भाव उठि आसन दीन्हा ॥
दीन बिधी सब अपनी गाई। चरन परसि कै सीस चढ़ाई ॥
मैं अनाथ हौँ तुम्हरौ बारा। छिमा करौ मैं दास तुम्हारा ॥
घट रामायण / १३७
मैं औगुन की खानि अपारा। तुम गुन सीतल अपरम्पारा॥
तुम पंडित मैं अपढ़ अयाना। करौ दया तुम कृपानिधाना॥
ये हिरदे कछु ज्ञान न पावा। औगुन ज्ञान जो तुम्हें सुनावा॥
सीतल भये धीर तब आई। सुनि अस बचन बैठि भुँइ माई॥
अर्थ-हृदय अहीर ने कहा, हे स्वामी सुनें, मैंने ज्ञानियों की रीति के अनुसार ही कुछ बातें कही हैं।
नैनू पंडित ने विचार कर कहा कि इन सबने ज्ञान की विलक्षण गति कही है। इस व्यक्ति ने तो धर्म, कर्म
को संसार से नष्ट कर दिया- यह कैसा ज्ञान है, जिसे आपका यह शिष्य (हृदय अहीर) कहता है। इसने
सम्पूर्ण वेदों, पुराणों आदि को निरर्थक बताया है तथा योगी एवं जैनियों का अस्तित्व ही नकार दिया
है॥ यह धर्म की अनेक बातों को नहीं मानता ऐसा कहकर उन्हें (हृदय अहीर का) ज्ञानमंत्र सुनाया॥
यह सुनकर, तुलसी साहब ने नैनू पंडित का अत्यन्त आदर किया और प्रीतिभाव से उठकर उन्हें
बैठने के लिए आसन दिया। उन्होंने नैनू पंडित से अपनी दीनता का वर्णन किया और उनके चरणों का
स्पर्श करके उसे अपने सिर पर रख लिया।
मैं तो अनाथ हूँ-मुझे आपका ही आधार है-आप क्षमा करें मैं तो आपका दास हूँ॥ मैं अपार
अवगुणों का भंडार हूँ और अपरम्पार शीतल गुणों के (भंडार) हो। आप पंडित ज्ञानी हैं और मैं अपढ़
और अज्ञानी हूँ-आप कृपा निधान हैं तुम मुझपर दया करों। इस हृदय ने किसी भी प्रकार के ज्ञान को
नही प्राप्त किया है जो इसने आपको सुनाया है वह पूर्णतः दोष भरा (अवगुण) ज्ञान है॥
इसे सुनकर वे लोग शीतल (शान्त) हुए और उनमें धैर्य (सहजता) आया और इन बातों को
सुनकर वे सभी भूमि पर बैठ गए॥
॥ सोरठा ॥
तकी तुरक कह बात तुलसी सुनियो भेद अब।
सब हृदय विख्यात जो गुनाह इनने कियो॥
अर्थ-तुर्क तकी ने यह बात कही कि हे तुलसी साहब! सारा रहस्य अब सुनो, जो पाप इस हृदय
अहीर ने किया है, वह सबको ज्ञात है।
॥ चौपाई ॥
सेख तकी जब बचन सुनाई। तुलसी सुनियौ चित्त लगाई॥
हिरदे कुफर बात सब कीन्हा। रोजा निमाज मेटि सब दीन्हा॥
और कितेब कुरान उठाये। खुदा नबी कर खोज मिटाये॥
अर्थ-शेख तकी ने जब यह बात सुनाई तो तुलसी ने ध्यान देकर बात सुनी। हृदय अहीर ने कुफ्र की
बातें की तथा रोजा तथा नमाज़ आदि सबको झूठा कह दिया। उन्होंने धार्मिक पुस्तकों और कुरान को
उठा (समाप्त घोषित कर) दिया और खुदा एवं नबी (ईश्वर के दूत) का अस्तित्व मिटा डाला॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तकी विचार, सब सँवारि विधि मैं कहौं।
कहुँ कुरान निरधार, जो किताब भाखी सबै॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने सब को सँवार कर विधिपूर्वक बातें कही हैं। कहीं कुरान
निराधार थोड़े है-उसका किताब में वर्णन तो सभी ने किया है॥
१३८ / घट रामायण
॥ सम्बाद साथ तकी मियाँ के ॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी कहै तकी सों बाता। या का तकी सुनौ बिख्याता ॥
चौधा तबक कुरान बताया। और चौबीस पीर पुनि गावाँ ॥
फजल मुहम्मद कीन्ह जहाना। आब तब पट अबर निदाना ॥
सुनौ तकी कहुँ खोज न पावै। कहा किताब ज्वाब नहिं आवै ॥
काजी मुल्ला पढ़े कुराना। खुदा खुदा कहे खोज न जाना ॥
कोलि कितेब देखिये भाई। खुदा आदि कहौ कहँ से आई ॥
खुद खुदाइ कर कहै कुराना। खुद खुदाई का मरम न जाना ॥
ये खुदाइ ना कहिये भाई। ये तौ खुद खुदाइ की छाँहीं ॥
जहँ खुदाइ रहता है साँईं। उस खुदाइ का अंत न पाई ॥
तकी खुदा तुम एक बतावो। खुद खुदाइ का खोज लगावो ॥
अर्थ—तुलसीदास शेख तकी से अपनी बात कहते हैं, हे शेख तकी! इस विख्यात तथ्य को आप सुनें।
कुरान ने चौदह तबक (आधार स्थल) बताया है और फिर चौबीस पीरों के विषय में गाया है।
मुहम्मद साहब की कृपा ने यह सृष्टि बनाई, सूर्य तथा आकाश उन्हीं के बनाए हैं। भिन्न-भिन्न
चौदह तबक (आधार स्थल) बतलाए गए हैं और उनके अलग-अलग पीर भी दिखाए गए हैं॥
किस तबक में किस नबी (ईश्वर के दूत) का निवास है। हे शेख तकी उस ईमान हक्क के विषय
में कहिये ॥
जहाँ वह स्वामी खुदा रहता है, उस खुदा का कोई अन्त नहीं पाता। हे तकी! तुम खुदा को एक बता
रहे हों और स्वयं उस खुदा की खोज लगाओ।
अल्लाह ने अपने मुख एवं जुबान से जो कुछ कहा उससे किताब कुरान (धर्मग्रन्थ) बना। भाई
पैगम्बर ने यह स्पष्ट किया कि सारा संसार उसकी खिलकत (सृष्टि) है। ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी तकी तलास, खुदा बास कहु कहँ हता।
नहिं जब जिमीं अकास, कोड़ किताब स्वाँसा नहीं ॥
अर्थ—तुलसी साहब कहते हैं कि हे तकी खोजो, कि खुदा की निवास स्थली कहाँ हैं। इस समय
वह कहाँ था, जब कोई धर्म ग्रन्थ नहीं था, न पृथ्वी थी न आकाश था और न वायु थी।
॥ दोहा ॥
मंसूरमियाँ पश्तो कहै तकी बूझ दिल माहँ।
खुद खुदाइ की राह का खुदा खोज नहिं पाइ ॥
अर्थ—मंसूर मियाँ पश्तों में यह बात समझाते हैं तू इसे दिल से समझो। स्वयं खुदा भी खुदा की तरह
की खोज नहीं कर पाता ॥