घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ / घट रामायण
रहा हूँ, जहाँ मोहन श्रीकृष्ण की आनन्ददायिनी मुरली बजती रहती है। मुरली की ध्वनि साधु जनों के
मन का विश्राम करने लगती है और वासना के विषय रसों के विपरीत सभी विधाता के रंग में खो जाते
हैं। तिल की खिड़की सुरति में विलीन हो उठती है और मैं उस रूप को देखकर एकटक टकटकी
लगाए रखता है।
वह उजाला जब पिंड के भीतर आता है, वह तत्त्व को तेज और परम ज्योति दिखलाने लगता है।
जैसे मंदिर का दीपक, ठीक उसी प्रकार इस ज्योति से सर्वत्र उजाला हो उठता है॥ एक क्षण के लिए
इस ज्योति का प्रकाश फूट पड़ता है, फिर शरीर के अन्तःकरण में चन्द्रमा जैसी ज्योति निखर आती है।
फिर साधक, मन में स्थित उस तत्त्व को देखता रहता है, और उसके बाद घट के भीतर वह चन्द्रमा
देखता रहता है॥
चन्द्रमा का उजाला तेजमय प्रकाश में बदल जाता है-और चारों तरफ चन्द्रमा खिल उठता है और
उसकी चाँदनी छा उठती है। उस उजाले को देखती हुई सुरति भी एक क्षण के लिए ठहर जाती है और
तब ऐसा लगता है मानो उजाला बढ़ता जा रहा हो॥ ज्यों-ज्यों सुरति आगे चढ़कर चलती जाती है वह
चाँदनी की उज्ज्वलता का सार ठौर-ठामों (स्थानों) पर देख लेती है॥
वह उज्ज्वल पर्वत शिखर देखकर ब्रह्मांड में समा जाती है-जहाँ आकाश में अनेक तारागण दिखाई
पड़ते हैं। हृदय में ही पृथ्वी तथा आकाश को देखो तथा अन्य अनेक बातें भी यहाँ दिखाई पड़ती हैं॥
कुछ दिनों तक वह पर्वत शिखर इसी प्रकार रहता है और तब सूर्य का उदय होता है किन्तु उस सूर्य के
प्रकाश को कौन पहचानता है। सूर्य का तेज व्याप्त होने पर तारा समूह तथा चन्द्रमा का प्रकाश का समय
मिट जाता है, ठीक उसी तरह घट के भीतर सूर्य का प्रकाश है।
जैसे दोपहर में सूर्य आकाश में व्याप्त हो उठता है वैसा ही, प्रकाश घट के भीतर हो उठता है-उस
मध्य में अच्छी तरह निरख और निहार कर मैंने इस पिंड में अगम्य ईश्वर का प्रसार देखा है।
सात द्वीप एवं नौ खंडों वाली पृथ्वी-आकाश, अन्तरिक्ष तथा समस्त ब्रह्मांड में यह व्याप्त है। सात
समुद्र यहाँ हैं, प्रयाग (प्राग) और त्रिवेणी (ब्रेनी) है, साथ में, गंगा, यमुना तथा प्रवाहित सरस्वती भी
तथा नब्बे (अठारह गंडा) नदियाँ, ये सभी पिंड में (ब्रह्मांड के परे) दिखाई पड़ी।
चारों प्रकार के जीव समूह-अंडज, पिंडज, उष्मजआदि तथा 'स्थावर, चर, अचर आदि सभी घट
के भीतर ही दिखाई पड़े।
॥ चौपाई ॥
भिनि भिनि जीवन कर बिस्तारा। चारि लाख चौरासी धारा॥
और पहार नार बहुतेरा। जो ब्रह्मांड में जीव बसेरा॥
कछु कछु दिवस सैल अस कीन्हा। तीनि लोक भीतर में चीन्हा॥
जो जग घट घट माहिं समाना। घट घट जग जिव माहिं जहाना॥
ऐसे कड़ दिन बीति सिराने। एक दिवस गये अधर ठिकाने॥
परदा दूसर फोड़ि उड़ानी। सुरति सुहागिनि भइ अगमानी॥
सबद सिंध में जाइ सिरानी। अगम द्वार खिरकी नियरानी॥
चढ़ि गइ सूरति अगम ठिकाना। हिये लखि नैना पुरुष पुराना॥
ता में पैठि अधर में देखा। रोम रोम ब्रह्मांड का लेखा॥
अंड अनेक अंत कछु नाहीं। पिंड ब्रह्मांड देखि हिये माहीं॥
जहँ सतगुरु पूरन पद बासी। पदम माहिं सतलोक निवासी॥