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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

घट रामायण / १२५
अर्थ-तीनों पटों के बाहर कुछ भी जाहिर (स्पष्ट) नहीं होता-साधक केवल अगम्य एवं अज्ञेय की
राह पकड़ लेता है। जैसे ही, साधक ने वह द्वार (चौथा द्वार) खोला-चारों ओर अगम्य ही प्रसरित
पसरा फैला हुए दिखाई पड़ता है-सतगुरु पुर के पार आत्मा चली गई ॥ १ ॥
दुर्लभ सत्यलोक में एक पर्वत शिखर है। वह अगम्य अकेला वहीं आत्मभूत तन्मय है-इसलिए
उसका स्थान विलक्षण है, अच्छी तरह से मूक साधक को देखा-वह अनाम है, कोई उसका नाम नहीं
है॥ २ ॥
अगने ही कमल दल वह तन्मय होकर आनन्दित है, सुरति ज्ञान से सम्बला हुआ है और अपने चित्त
का तारतम्य (एकतानता) नील शून्य शिखर से जोड़े हुए है। उसका ब्रह्मांड फूट पड़ा, समस्त दसों
दिशाएँ टूट चलीं और सुरति बन्धन से छूटकर शून्याकाश में विलीन हो गई ॥ ३ ॥
उस ब्रह्म का शून्य शिखर इस शरीर पिंड के बीच क्रीड़ा करता दिखा और संतों की कृपा से मैंने
सन्मार्ग पकड़ा। फिर वहाँ न ब्रह्मांड है, न पिंड है, न नौ खण्ड (लोक) हैं। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा एवं तारे
भी नहीं हैं। ४ ॥
न वहाँ जल है, वायु है, न अग्नि है, न पृथ्वी (भवन) है, न आकाश है। और आकाश शब्द के
पार जाकर स्थित हो उठा। तुलसी साहब कहते हैं कि इस प्रकार की अनुभूति पाकर मैंने सन्तों को
दिखाया-वह मेरे पास आकर समानिष्ट हो उठी और मैंने उसे इस प्रकार से गाकर सुनाया ॥ ५ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी निरखि निहारि, नैन पार निज देखि कै।
यह अदेख की बात, जिन अदृष्टि हिरदे लखा॥ १ ॥
तुलसी तुच्छ अबूझ, जबै सूझ सूरति लखी।
अलख खलक के पार, निः अच्छर वो है सही ॥ २ ॥
संत चरन पद धूर, तुलसी कूर कारज कियौ।
लिया अगम पद मूर, सूर सन्त अपना कियौ॥ ३ ॥
मैं उनकी बलिहार, लार लागि पारै कियौ।
चौथा पद निज सार, सो लखाइ संतन दियौ ॥ ४ ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने उसे भलीभाँति समझकर निहारकर और अपने नेत्रों के उस
पार देखकर उस अदृश्य मूल तत्त्व की चर्चा की है। उस अदृश्य को मैंने हृदय में देखा था ॥ १ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि उस अत्यन्त सूक्ष्म एवं अज्ञेय को जब सुरति ध्यान साधा, तब सूझ पड़ा।
इस संसार के उस पार, अलक्ष्य रूप वह निश्चय रूप से अक्षर शून्य हैं अर्थात् उसे अक्षरों में नहीं बाँधा
जा सकता ॥ २ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैं तो सन्त चरणों के पग की धूलि हूँ-मैंने उस अगम पद के मूल तत्त्व
को अपना लिया और दिव्य दृष्टि वाले साधक सिद्धों (सूर सन्त) को अपना बना लिया ॥ ३ ॥
मैं उनकी बलिहारी जाता हूँ-जिन्होंने उस ब्रह्म की संसक्ति से सम्बद्ध होकर संसार सागर को पार
कर लिया है। मेरी संत साधना का सार तत्त्व यह चतुर्थ पद है-जिसको मैंने सन्तों को दिखा दिया ॥ ४ ॥
भेद पिंड और ब्रह्मांड का
॥ चौपाई ॥
तुलसी मैं अति नीच निकामा। मैं अनाथ गति बूझि न जाना॥
मैं अति कुटिल कूर कुबिचारी। सत सत संत सरनि निरबारी॥