घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १११
जिन सन्तों ने इस शून्याकाश की अटल अट्टालिकाओं को देख लिया है और रूप तथा लक्षणों
(रेख) से हीन ब्रह्म को हृदय में अपने को तन्मय कर दिया है, वह न कोई कंथ (कथा-शास्त्र) कहता
है और न किसी पंथ (ज्ञानमार्ग) को जानता है और न वह वेषभूषा (सन्तों जैसी) धारण करता है, वही
उस ब्रह्म के समस्त मार्गों में आत्म चित्त को साक्षात्कृत करके बैठा है॥२॥
॥ सोरठा ॥
ठुमरी ठौर ठिकान, अगम भान स्रुति पद लखा।
चखा अमर रस ज्ञान, पार पुरुष पद में मिली॥१॥
पिया भवन के माईँ, जाइ जोइ जस जस कही।
रही पुरुष पद छाइ, लई आदि अपने गई॥२॥
अर्थ-उसका ठौर ठिकाना ठुमरी ही है और उसी भाव में श्रुतियों ने निर्दिष्ट अगम्य सूर्य का स्थान
देखा है। इसी के माध्यम से उन्होंने उस ब्रह्म के अगम ज्ञान रस का स्वाद चखा है और मैं (आत्मा) उस
लोक (पार) में जाकर पुरुष (ब्रह्म) से मिल गई॥१॥
मैंने जो-