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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

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घट रामायण / १२३
सेत बरन वह सेतइ साँईं। वहँ संतन ने सुरति समाई॥
सत्तहि लोक अलोक सुहेला। जहँवाँ सुरति करै निज केला॥
सूरति संत करै कोइ सैला। चौथा पद सत नाम दुहेला॥
परदा तीसर फोड़ि समानी। पिंड ब्रह्मांड नहीं अस्थानी॥
जहँवाँ अगम अगाधि अघाई। जहँ की सत गति संतन पाई॥
महुँ उन तार लार लरकाई। उन सँग टहल करत नित जाई॥
महुँ पुनि चीन्ह लीन्ह वह धामा। बरनि न जाइ अगमपुर ठामा॥
निःनामी वह स्वामी अनामी। तुलसी सुरति सैल तहँ थामी॥
जो कोइ पूछै तेहि कर लेखा। कस कस भाखों रूप न रेखा॥
तुलसी नैन सैन हिये हेरा। संत बिना नहिं होइ निबेरा॥
निज नैना देखा हिये आँखी। जस जस तुलसी कहि कहि भाखी॥
अर्थ-भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवन रूपों का विस्तार अर्थात् चार लाख चौरासी हजार प्रकार के
जीवों साथ में, अनेक पहाड़ और अनेकों नालें (नार) आदि जिसमें ब्रह्मांड के जीवों का निवास है
(मैंने देखा)।
अनेक दिनों तक पर्वत शिखर पर इस प्रकार रहकर अपने पिंड के भीतर स्थित तीनों लोकों को
पहचाना जो संसार घट-घट के भीतर समाया हुआ है, वही घट-घट का स्थित जीव सृष्टि (जहान) में
भी है।
इस प्रकार कुछ दिन यहाँ व्यतीत हुए फिर एक दिन मैं अन्तर-तल (अधर) के स्थान पर पहुँचा।
द्वार पर स्थित दूसरा पर्दा फट कर उड़ गया और तब सौभाग्यवती सुरति का आगमन हुआ। (सब्द)
समुद्र में जाकर खो गया फिर अगम द्वार की खिड़की समीप आई। सुरति समाधि अपने निवास स्थली
पर चढ़ गई और हृदय के नेत्रों से अपने उस पूर्व साथी पुरुष (ब्रह्म) को देखा। वहाँ बैठकर उसने
अन्तस्तल में रोम-रोम में ब्रह्मांड देखा।
अनेक लोक (पिंड) दिखाई पड़े-जिनके अन्त नहीं हैं और अपने हृदय में अनेकों पिंड एवं ब्रह्मांड
देखे-वहाँ पूर्ण पद निवासी सतगुरु (ब्रह्म) और उसके सहस्रार कमल में 'सत्य लोक' निवास करता
दिखाई पड़ा।
स्वामी ब्रह्म भी श्वेत वर्ण के हैं और वह सत्य लोक भी श्वेत वर्ण का है और वहीं संत गण सुरति
ध्यान में डूबे हुए दिखाई पड़े। इस सत्यलोक का आलोक बड़ा ही सुहावना (सुहेला) था जहाँ सुरति
स्वयं क्रीड़ा में लीन थी। कोई विरला साधु ही सुरति में क्रीड़ा (केलि-क्रीड़ा-केला) करता है। उसके
पश्चात् चौथे लोक का नाम 'सत लोक' है-जो नितान्त दुर्लभ है।
इसके पश्चात् तीसरे पर्दे को फाड़कर उसके आगे घुसी (समानी)। वहाँ न पिंड था, न ब्रह्मांड था,
न कोई स्थान विशेष ही)। यहाँ अगम्य अगाध, पूर्ण परितृप्त है-जिसकी थाह केवल संतों ने प्राप्त की
है) मैंने भी, उनकी संसक्ति में अपनी संसक्ति लगा दी (तरकाई) और नित्य प्रति उनके साथ जाकर
सेवा टहल करने लगा। मैंने उन्हीं के साथ उस धाम (लोक) की पहचान कर ली। उस अगम नगरी के
स्थानों का वर्णन नहीं किया जा सकता।
वहाँ स्थित स्वामी निःनामी तथा अनामी है-तुलसी साहब कहते हैं कि यह सुरति ध्यान का पर्वत
शिखर वहीं ठहरा है। उसके विषय में जो जैसा पूछता है-वही उसका सार्थक संदर्भ है-मैं किस-किस
रूप में उसके रूप तथा लक्षणों का वर्णन करूँ। तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने हृदय की आँखों से
जिस प्रकार का उसे देखा है, उसी-उसी प्रकार कह कर वर्णन करता हूँ॥