घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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अर्थ-सुरति रूपी दूरबीन की सहायता से शून्य शिखर पर चढ़कर मैंने उस आदि रूप अनादि तत्त्व
को हृदय रूपी नेत्रों से समाधि के क्षणों में साध कर देखा।
॥ चौपाई ॥
तुलसी निरखि देखि निज नैना। कोइ कोइ संत परखिहै बैना॥
जो कोइ संत अगम गति गाई। चरन टेकि पुनि महूँ सुनाई॥
अब जीवन का कहौं निबेरा। जा से मिटै भरम बस बेरा॥
जब या मुक्ति जीव की होई। मुक्ति जानि सतगुरु पद सेई॥
सतगुरु संत कंज में बासा। सुरति लाइ जो चढ़ै अकासा॥
स्याम कंज लीला गिरि सोई। तिल परिमान जानि जन कोई॥
छिन छिन मन को तहाँ लगावै। एक पलक छूटन नहिं पावै॥
स्रुति ठहरानी रहै अकासा। तिल खिरकी में निस दिन वासा॥
गगन द्वार दीसै इक तारा। अनहद नाद सुनै झनकारा॥
अनहद सुनै गुनै नहिं भाई। सूरति ठीक ठहर जब जाई॥
चूवै अमृत पिवै अघाई। पीवत पीवत मन छकि जाई॥
सूरति साथ संघ ठहराई। तब मन थिरता सूरति पाई॥
सूरति ठहरि द्वार जिन पकरा। मन अपंग होइ मानौ जकरा॥
चमकै बीज गगन के माईं। जबकि उजास पास रहै छाई॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने भली भांति निरखकर उस तत्त्व को अपनी हृदय-रूपी आँखों
से देखा है-कोई-कोई ही सन्त मेरी इस वाणी को समझेगा॥ जो कोई सन्त की गति का गान करता है,
उसी के स्वर में स्वर मिलाकर मैंने भी चरण टेक कर (उस ब्रह्म के प्रति) मैंने (महूँ) भी उस सत्त्व
को सुनाया है॥
अब मैं जीवन के वर्णन का निपटारा करता हूँ-जिससे कि भ्रमवश स्थित चित्त का बन्धन (घेरा)
समाप्त हो उठे। जब इस जीव की मुक्ति होगी-मुक्ति को समझकर साधक गुरुचरणों की सेवा
करेगा। सतगुरु (ब्रह्म) का निवास सहस्रार कमल में है, और जो साधक सुरति साधना द्वारा उस
शून्याकाश तक पहुँचता है वहीं उसे श्याम कमल लीला शिखर दिखाई पड़ता है-कोई-कोई ही सन्त जन
उसके तिल जैसे होने की प्रमाण गति को पहचानता है। वह साधक उस तिल जैसे तत्त्व पर क्षण-क्षण
मन को लगाए रहता है और एक पल के लिए वह ध्यान छूटने नहीं पाता॥
समस्त श्रुतियाँ उस आकाश में ठहरी रहती हैं और तिल की खिड़की में उनका निरन्तर निवास बना
रहता है। शून्याकाश के द्वार पर एक तारा दिखाई पड़ता है-और निरन्तर (अनाहत नाद की झंकार सुनाई
पड़ती है। हे भाई! अनाहत सुनाई पड़ती है किन्तु समझ में नहीं आती और जब भलीभाँति सुरति समाधि
ठहर जाती है, तब 'अमृत का निरन्तर स्राव होने लगता है और साधक तृप्त होकर उसका पान करता है
और उसका पान करते-करते मन सर्वथा परितृप्त हो उठता है॥
वह साधक सुरति के साथ आनन्द सिंधु में ठहर जाता है और तब साधक का स्थिर सुरति प्राप्त
करता है।
सुरति में स्थिर होकर जिन्होंने उस अगम्य के द्वार को पकड़ रखा है-उसका मन उसी में विलुप्त हो
उठता है, अपंग (जड़) की भाँति जकड़ उठता है। उस आकाश में हे सखी! विद्युत चमकती रहती है
और पास में उजाला छाया रहता है।