घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 150 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
पिंड माँहि ब्रह्मांड, ताहि पार पद तेहि लखा।
तुलसी तेहि की लार, खोलि तीनि पट भिनि भई॥ १॥
तुलसी संत अनुकूल, कँवल फूल ता में धसी।
लसी जाइ सत मूल, फँसी पाइ सतगुरु सरन॥ २॥
खुलि गये अगम किवार, लील सिखर के पार होइ।
गिरा गगन के पार, पाइ सैल अस बिधि कही॥ ३॥
अंडा फूट अकास, होइ निरास सूरति चली।
अगम गली निज पाइ, तहँ आसन तुलसी कियौ॥ ४॥
हिरदे हरष समाइ, पाइ ताहि गति कस कही।
कोइ कोइ संत समाय, ताही तें गति तस भई॥ ५॥
अर्थ-पिंड (घट) के भीतर ही ब्रह्मांड है और उसके पार जाकर ब्रह्म का निवास देखा। तुलसी
साहब कहते हैं कि उसकी संसक्ति में तीनों पटों को खोलकर मैं भिन्न स्वरूप का साधु हो गया॥ १॥
सन्तों की अनुकूलता तथा सद्गुरु की शरण पाकर मैं सहस्त्रार कमल के मध्य जाकर विलीन हो
गया और उस 'सत्य' तत्त्व के मूल में जाकर संसक्त होकर फँस गया॥ २॥
फिर इसके बाद तो उस अगम के कपाट खुल गए और तब लीला शिखर के पार होकर पृथ्वी
तथा आकाश के उस पार शून्य शिखर को प्राप्त करके इस प्रकार कह रहा हूँ।
तुलसी साहब कहते हैं कि ब्रह्मांड (अंडा) आकाश में फूट गया और इसे देखकर सुरति निराश
होकर चल पड़ी और आगे एक अगम्य गली पाकर उसने वहाँ आसन जमा लिया॥ ४॥
उसे पाकर, उसकी गति का वर्णन कैसे किया जा सकता है, हृदय में हर्ष समाया हुआ है। कोई-
कोई सन्त उस अगम गली में प्रवेश करता है उसमें प्रवेश करते ही उसकी दशा तन्मयी (ब्रह्ममयी) हो
उठती है॥ ५॥
॥ छन्द॥
तीनों पट बाहिर कहूँ नहिं जाहिर। अगम अगत की राह लई॥
खोला वह द्वारा अगम पसारा। सतगुरु पुर के पार गई॥ १॥
सतलोक दुहेला कीन्ही सैला। अगम अकेला लार भई॥
ता से पद न्यारा निरखि निहारा। तासु अनामी नाम नहीं॥ २॥
फूला निज कँवला सूरति सम्हला। नील सिखर तन तार लई॥
अंडा निज फूटा दस दिस टूटा। छूटि सुरति असमान गई॥ ३॥
तुलसी तन सैला घट बिच खेला। संतकृपा से राह लई॥
ब्रह्मांड न पिंडा नहिं नौ खंडा। रबि चंदा तहँ तार नहीं॥ ४॥
पानी नहिं पवना अगिन न भवना। गगन गिरा के पार भई॥
देखा सत्त सैला अगम अकेला। सूरति केला सब्द मई॥ ५॥
तुलसी मत पाई संत लखाई। पास समाई गाइ कही॥ ६॥