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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

घट रामायण / १२१
॥ चौपाई ॥
जस जस सुरति सरकि सत द्वारा। तस तस बढ़त जात उँजियारा॥
सेत स्याम स्रुति सैल समानी। झरि झरि चुवै कूप से पानी॥
मन इस्थिर अस अमी अघाना। तत्त पाँच रँग बिधी बखाना॥
स्याही सुरख सपेदी होई। जरद जाति जंगाली सोई॥
तिल्ली ताल तरंग बखानी। मोहन मुरली बजै सुहानी॥
मुरली नाद साध मन सोवा। विष रस बादि बिधी सब खोवा॥
खिरकी तिल भरि सुरति समाई। मन तत देखि रहै टक लाई॥१
जब उजास घट भीतर आवा। तत्त तेज और जोति दिखावा॥
जैसे मंदिर दीप किवारा। ऐसे जोति होत उँजियारा॥
जोति उजास फाटि पुनि गयऊ। अंदर चंद तेज अस भयऊ॥
देखै तत सोइ मनहि रहाई। पुनि चंदा देखै घट माई॥
चंद्र उजास तेज भया भाई। फूला चंद चाँदनी छाई॥
सूरति देखि रहै ठहराई। ज्यों उजियास बढ़त जिमि जाई॥
ज्यों ज्यों सुरति चढ़ि चलि गयऊ। सेता ठौर ठाम लखि लयऊ॥
देख सैल ब्रहाण्ड समाई। तारा अनेक अकास दिखाई॥
महि अरु गगन देखि उर माई। और अनेकन बात दिखाई॥
कछु कछु दिवस सैल अस कीन्हा। ऊगा भान तेज को चीन्हा॥
तारा चंद्र तेज मिटि गयऊ। जिमि मध्यान भान घट भयऊ॥
ज्यों दोपहर गगन रबि छाई। तैसे उजास भया घट माई॥
ता के मधि में निरखि निहारा। घट में देखा अगम पसारा॥
सात दीप पिरथी नौ खण्डा। गगन अकास सकल ब्रह्मंडा॥
समुँदर सात प्राग पद बेनी। गंगा जमुना सरसुतौ बहिनी॥
औरै नदी अठारा गंडा। ये सब निरखि परा ब्रह्मंडा॥
चारौ खानि जीव निज होई। अंडज पिंडज उषमज सोई॥
अस्थावर चर अचर दिखाई। यह सब देखा घट के माई॥
अर्थ—जैसे-जैसे सुरति समाधि सुरति द्वार की ओर से सरक 'सत्य' द्वार की ओर आती है, वैसे-वैसे
उजाला बढ़ता जाता है। श्वेत और श्याम रूप में स्थित सुरति शून्य शिखर में समा उठती है, तब ऐसा
अनुभव होता है कि झर-झर झरता हुआ औंधे कुएँ का जल बरस रहा है।
इस अमृत से तृप्त होकर मन स्थिर है। संसार का पाँच तत्त्वों में रंग जाना विधि का विधान है—ये
स्याह रंग, लाल श्वेत पीला तथा हरा हैं। तिल जैसे ब्रह्मद्वार पर स्थित सरोवर की लहरों का वर्णन कर
१. मुं० दे० प्र० के पाठ में "टक लाई" की जगह "टकराई" है।