घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ / घट रामायण
अब मैं अपना औगुन भाखी। निरनय जी की कोइ नहिं राखी॥
अपनी चाल गती गुन गाऊँ। मोहिं सों अधम और नहिं नाऊँ॥
संत दयाल दीन-हितकारी। मोरे औगुन नाहिं बिचारी॥
संत सरल चित सब सुखकारी। मो को पकरि हाथ निरबारी॥
कहँ लगि उनके गुन गति गाऊँ। मोर अचेत लखी नहिं काहू॥
मोरी तपन ताप निज हेरा। तुलसी नीच का कीन्ह निबेरा॥
कोटिन जिभ्या जो मुख होई। तौ मैं बरनि सकौं नहिं सोई॥
कोटिन कल्प-बृच्छ जो होई। तौ सरवर पावै नहिं कोई॥
तिनकी तीनि लोक रज पावन। कस बरनौँ मोरे मन भावन॥
तिन कौ भेद बेद नहिं पावै। वोहू नेति नेति गोहरावै॥
दस औतार और तिरदेवा। वोहु न उनको पावै भेवा॥
कहँ लग कहौं संत गति न्यारी। मोरी मति गति नाहिं बिचारी॥
तीनि लोक का पटतर लाऊँ। उन सम तुलसी कहा दिखाऊँ॥
मैं मत त्राहि त्राहि करि भाखी। ऐसी कौन बताऊँ साखी॥
संतन की गति कस कस गाऊँ। अस कोइ देखि परै नहिं ठाऊँ॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि मैं अत्यन्त तुच्छ तथा निकम्मा हूँ। सदा मैं अनाथ रहा हूँ और इस
संसार की गति की मुझसे समझ नहीं है। मैं अत्यन्त कुटिल, क्रूर और ना समझ हूँ किन्तु मुझे
अनेकानेक संतों की शरण ने विवेक दिया (निखारी) है॥
मैं अपने अवगुणों का वर्णन कर दिया है और हृदय (जी) के किसी निर्णय (निरनय) को
(छिपाकर) नहीं रखा है। मैं अपने व्यवहार एवं समझ का वर्णन कर रहा हूँ-(इस संसार में) मुझसे
अधम और कोई नहीं है॥
सन्तजन तो अत्यन्त दयालु एवं दीनों के हितैषी होते हैं-वे मेरे अवगुणों पर विचार नहीं करेंगे। संत
जन अत्यन्त सरस चित्त के तथा सभी के लिए सुखदायी होते हैं-उन्होंने मेरा हाथ थाम कर मुझे विवेक
दिया है॥
कहाँ तक मैं उनके गुणों और विवेक का वर्णन करूँ। किसी ने भी मेरी अज्ञनता (उनके
अतिरिक्त) नहीं देखी। उन्होंने मेरी पीड़ा और मेरे कष्टों को समझा-बूझा और तुलसी साहब कहते हैं कि
उन्होंने इस तुच्छ दास को संकट मुक्त किया॥
यदि मेरे मुख में कोटि-कोटि जीभें होतीं तो भी उनके उपकार का मैं वर्णन नहीं कर सकता। यदि
कोटि-कोटि कल्पवृक्ष भी हो तो भी वे उस (ज्ञान) सरोवर को नहीं प्राप्त कर सकते॥
तीनों लोकों में इन संतों की चरण रज पवित्र है-उनका वर्णन मैं कैसे कर सकता हूँ क्योंकि मेरा
मन तो संसक्तियों से भरा (भावन) है। उनकी समझ वेद आदि भी नहीं पा सकते और वे भी नेति नेति
कहकर पुकारते रहते हैं॥
ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों (त्रिदेवा) तथा विष्णु के दशावतार वे भी उनका भेद नहीं पा सकते हैं।
मैं कहाँ तक संतों की विलक्षण गति का वर्णन करूँ-मेरी बुद्धि उसकी गति का विचार नहीं कर
सकती॥
तुलसी साहब कहते हैं कि मैं तीनों लोकों के सादृश्यों को इकट्ठा भी कर दूँ तो सन्तों के सदृश कैसे
दिखाऊँगा। मैं और मेरी बुद्धि त्राहि-त्राहि करके कह रही है कि उनकी साक्षी (प्रमाण-समता) के लिए