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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

घट रामायण / १०९
जिस किसी ने भी त्यागपूर्वक उस परमात्मा में मन लगा दिया वह सिंघल द्वीप (सिद्ध भूमि) में
निरन्तर आनन्द करता रहेगा ॥
॥ द्वितीय वैराग ॥
॥ चौपाई ॥
परम जोग बैराग बताऊँ। रहनी चाल ताहि दरसाऊँ॥
अष्ट कँवल उलटै हिये माई। उलटै कँवल तत्त मन लाई॥
निस दिन तत्त मती गति राखै। पाँचो तत्त गती सोइ भाखै॥
तब तन छूटे तत्त समाई। चारि तत्त जिव उपजै जाई॥
फिर तन छूटै खानि समाना। सो पुनि करै जो लेइ निदाना॥
अर्थ-परम जोग वैराग्य के विषय में बता रहा हूँ-उसकी दिनचर्या एवं आचरण (रहनी) का वर्णन
करता हूँ। उसने चित्त में स्थित अष्ट कमलदल को उल्टा कर दिया है और उस उल्टे कमल से जुड़े
तत्त्व में चित्त लगाए रहता है॥
रात-दिन वह मूल तत्त्व (ब्रह्म) की गति का वर्णन करता रहता है और पाँचों तत्त्वों की गति का
वह वर्णन करता रहता है॥
उसके बाद जब उसका शरीर विनष्ट होता है तो वह परमतत्त्व में विलीन हो जाता है और वह चार
तत्त्वों एवं जीव के साथ पुनः उत्पन्न होता है। इसके पश्चात् उसका चित्त भण्डार की तरह भर जाता है-
इसको वही कर सकता है-जो इसके फलों को धारण करने की आकांक्षा करता हो॥
॥ तृतीय बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
त्याग बैराग कौ बरनि सुनाई। छूटै देह खानि गति पाई॥
जो जस त्याग भोग तन तैसा। खान पान तन पावै जैसा॥
अर्थ-त्याग वैराग्य का मैं वर्णन करके सुनाता हूँ-उसकी देह छूटने पर इसे सम्पन्नता की गति प्राप्त
होती है। उसका जैसा त्याग होगा, या जैसा भोग होगा-उसी प्रकार उसका शरीर होगा, वह अपने कर्म
के अनुसार ही खान-पान तथा शरीर प्राप्त करेगा॥
॥ चतुर्थ बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
तन त्यागी बैरागी भाई। जो जेहि लिया देन सोइ जाई॥
बार बार छूटै तन जाइ। छूटै तन तहँ गर्भ समाई॥
वहि वहि देह खाइ पुनि जाई। ऐसे भर्म खानि भरमाई॥
बिना सुरति नहिं पावै पारा। भरमै भोग परै भौ धारा॥
अर्थ-त्वह बार-बार शरीर छोड़कर माता के गर्भ में जाता है-उसे देकर वह पुनः खाता हुआ अपना
जीवन व्यतीत करता है, ऐसे भ्रम की खानि में वह भटकता रहता है। बिना सुरति ज्ञान के वह भवसागर
से पार नहीं हो पाता-क्योंकि वह संसार सागर की योग धारा में बहता हुआ निगरन्तर भरमता रहता है॥