घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १९५
अज्ञानता (अचेती) का त्याग करके सूरति रूपी सरोवर का स्मरण करो (ध्यान करो) और सूरति
के पार स्थित ध्यान के पर्वत शिखर के आकाश पर ध्यान लगाओ। उस आसमान को तोड़कर अपने
ठिकाने को देखो और मैं पश्चिमी किवाड़े के द्वार पर पहुँची ॥ २ ॥
वहाँ परमात्मा मिला और इस जीवत्व के बन्धन से मुक्ति मिली और पारब्रह्म के चरण कमलमय
हो उठे॥ स्व कमल पुष्पित हुआ-जन्म जन्मान्तर की पीड़ा समाप्त हो उठी और जीव के इस स्वरूप का
परित्याग करके मैं ब्रह्ममय हो उठा॥ ३ ॥
उसके आगे अगम्य तक फैला एक द्वार मिला-उसका नाम सत्य लोक कहा गया है। वहाँ एक
सत्यनाम है-जिसे ब्रह्म भी नहीं जानता-वही अगम्य 'सत साहब' हैं॥ ४ ॥
यह लोक तीनों लोकों से विलक्षण तथा व्याप्य लोक है, और वही चतुर्थ पद (मोक्ष) के उस पार
है, जहाँ पर अनाम (निःनामी) निवास करते हैं और जिनके विषय में कोई नहीं जानता। वे तीनों पटों
(लोकों की सीमा) के पार रहते हैं॥ ५ ॥
न वहाँ जल है, न वायु है, न अग्नि है, न निवास गृह है और ज्ञान की गतियों का कोई स्वरूप भी
नहीं है। जहाँ न ब्रह्मा हैं, न विष्णु हैं, न राम हैं, न कृष्ण हैं और शिव तथा सिद्ध भी जिसका रहस्य नहीं
प्राप्त कर पाते ॥ ७ ॥
वहाँ न निर्गुण है, न सगुण है और न वहाँ स्वर्ग का नामोनिशान है और न कहीं वहाँ पिंड या ब्रह्मांड
है॥ परमात्मा की ज्योति का न वहाँ कोई स्रोत (सोती) है, वहाँ अगम या अज्ञेय भी नहीं है और पार
ब्रह्म परमात्मा का आदि स्वरूप लक्षण भी नहीं है॥ ८ ॥
वहाँ न कोई अनाकृति है, न कोई आकृति है, न कोई निरंकार है-वहाँ केवल 'सत्य नाम-ही सही-
सही स्थिति में है। तुलसी साहब जानते हैं कि वहाँ न कोई नाम है, न अनामी है वरन् वहाँ समस्त तत्त्व
या महातत्त्व उस परम सारगय 'सत्य तत्त्व' में जाकर समाविष्ट हैं ॥ ९ ॥
॥ सोरठा ॥
तुलसी अगम अनाम, अगत भेद का से कहौं।
कोड न मानै बात, संत अंत कोड ना लखै ॥ १ ॥
निगम न पावै बेद, नेति नेति गोहरावही।
ब्रह्म न जानै भेद सत्त, नाम निज भिन्न है॥२॥
एक अनीह अनाम, सत सुरति जानै यही।
वे पहुँचे वोहि धाम, सो अनाम गति जिन कही॥ ३॥
तुलसी अगम बिचार, सार पार गति पद लखा।
वह अलेख का ठाम, तुलसी तरक विचारिया ॥ ४ ॥
सुरति अटा के पार, आठ अटारी अधर में।
तुलसिदास लियौ सार, सुरति सिंध से भिनि भई॥ ५॥
अर्थ-तुलसी साहब कहते हैं कि वह परम तत्त्व अगम्य है, अनाम है-फिर उसे ज्ञान के भेद का
वर्णन मैं कैसे करूँ सम्भव है, मेरी बातें कोई न स्वीकार करे-क्योंकि सन्तों की अन्तिम ज्ञान दशा
किसी की समझ में नहीं आती ॥ १ ॥
शास्त्रादि जिसके ज्ञान को नहीं प्राप्त कर सकते और जिसे 'नेति नेति' कहकर पुकारते हैं-जिसके,
स्वरूप भेद को ब्रह्म भी नहीं जानता, यह 'सत्य' नाम स्वयं में सबसे अलग है॥ २॥
वह केवल एक है, आकांक्षा शून्य, अनाम है और जिसे सुरति के द्वारा ही जाना जाता है-वही