घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ / घट रामायण
अर्थ-अब मैं वैराग्य तथा योग के ज्ञान का वर्णन करता हूँ। उसी के साथ ज्ञान तथा भक्ति को भी
भिन्न-भिन्न रूपों में बतलाऊँगा। वैराग्य की चार अवस्थाओं का वर्णन करूँगा और योगियों की चार
गतियों का भी गान करूँगा ॥
ज्ञान की तीन गतियों का भेद बतलाकर और चौथे ज्ञान को जो जगत में स्थित है-उसका वर्णन
करूँगा। भक्ति के तेरह भेदों का वर्णन करूँगा और भिन्न-भिन्न करके उनके विविध रूपों का वर्णन
करूँगा ॥
सभी भक्ति के भेद भाव न्यारे हैं-जिनसे उनके स्वरूप का स्पष्टीकरण (निबेरा) हो सके, उसका
वर्णन करूँगा। जिनका जैसा स्वरूप है और जैसा भेद है-उन सबको सन्तों ने विश्वास भाव (सनाथी)
से कहा है।
मैं उन सन्तों के चरणों की पवित्र धूलि का दास हूँ, और उन्हीं का मत समझकर मैं उनका वर्णन
करूँगा ॥
॥ सोरठा ॥
भक्ति ग्यान और जोग, भोग भाव सब विधि कहीं।
जो जेहिं गति जस भोग, सो तस करौं विचारि कै ॥
अर्थ-भक्ति ज्ञान तथा योग, भोग एवं अन्य भावों का हर प्रकार से वर्णन करूँगा। जो जिस गति
एवं जिस भोग में जीवन जी रहा है, उन सबका मैं विचारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ॥
॥ प्रथम बैराग ॥
॥ चौपाई ॥
अब बैराग तीनि गति गाऊँ। भाखों भेद भिन्न दरसाऊँ ॥
बेरक्ती बैराग सुनाऊँ। ता कर चिन्ह भिन्न बतलाऊँ ॥
माया मोह जगत नहिं भावै। काम रु क्रोध लोभ नहिं लावै ॥
और जगत सँग रहै उदासी। जग संसार करत सब हाँसी ॥
त्यागी अति संतोष समावा। भूख प्यास निद्रा न सतावा ॥
और अनेक भाँति रस त्यागी। बन बसि रहै नाम अनुरागी ॥
बिन सतगुरू धूरि सब जाना। संत सुरति बिन भरमै खाना ॥
जो कोइ त्याग लाग मन कीन्हा। संगल दीप भोग तेहि दीन्हा ॥
जो जेहि त्याग भाग जस पावा। सुरति सब्द बिन भौं में आवा ॥
अर्थ-अब वैराग्य की तीन गतियों का वर्णन कर रहा हूँ और उनके भिन्न-भिन्न भेदों को दिखला
रहा हूँ। 'विरक्ति' वैराग्य का वर्णन कर रहा हूँ तथा उसके भिन्न-भिन्न लक्षणों को बतला रहा हूँ॥
विरक्त सांयासी को इस संसार के माया-मोह भाते नहीं और कभी काम, क्रोध एवं लोभ के
वशीभूत नहीं होता। वह संसार की संसक्ति से उदासीन रहता है और सारा संसार उसकी हँसी करता
रहता है।
वह त्यागी है तथा उसमें सन्तोष भाव समाया हुआ है। उसे भूख प्यास एवं निद्रा पीड़ित नहीं करते।
उसने अनेक रूपों की संसक्तियों रस-वासनाओं का त्याग कर रखा है। वन में निवास करता हुआ
केवल परमात्मा के नाम में अनुरक्त रहता है॥
बिना सतगुरु (परमात्मा) के वह सम्पूर्ण जगत को धूलि की भाँति समझता है-सन्तों की सुरति योग
के बिना दर दर (खाना) भटकता रहता है।