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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

१९२ / घट रामायण
म् आदि को मन में विलीन करके मन के अनुसार आचरण करे तथा कर्त्ता मन को ब्रह्म समझे।
इससे व्यक्ति भवसागर को भोगने की स्थिति नहीं प्राप्त करेगा किन्तु इसके विपरीत बार-बार भवसागर
में भोग की गति प्राप्त करता है। जो 'सतगुरु' शब्द का अर्थ नहीं समझता, और स्वयं अपने-आप को
ही ब्रह्म मानता है, शास्त्रों को ज्ञानसिन्धु का सार तत्त्व समझता है, वह इस मायाजाल (भौजल) से
मुक्ति नहीं पाता॥
जो सन्तों को पहचानता है, उनकी विलक्षण सुरति गति (ज्ञान) को जानता है, वही इस सांसारिक
प्रपंचों से मुक्त होता है। आत्म ज्ञान से स्वयं जो पापमयी वृत्ति को नष्ट कर देता है, वही सत्संगति द्वारा
संत गति को प्राप्त करता है॥
॥ द्वितीय ज्ञान॥
॥ चौपाई॥
औरहि ज्ञान सुनौ जग केरी। बेद पुरान जाल भौ बेरी॥
पंडित पढ़ पढ़ ज्ञान सुनावै। आदि गती गम भेद न पावै॥
झूठी आस बास सब केरी। फिरि फिरि स्वाँस आस भौ बेरी॥
जो जो कर्म करै सोइ पावै। बार बार भौ भटका खावै॥
मन में मान मोट कर जानै। ता ते परै नरक की खानै॥
भक्ती भाव भेद नहिं पावै। ऊँची जाति मान मन लावै॥
साधु संत मन में नहिं आवै। ऊँचा ज्ञान आप ठहरावै॥
नीचा होइ संत को जानै। संत कृपा कछु जानै आनै॥
संतन भेद बेद से न्यारा। नीच होइ पुनि पावै सारा॥
ऊँचा मान सदा मन राखै। सोइ सब जगत जीव कह भाखै॥
पूजन अपनी चाल बतावै। ऐसे सकल जीव भरमावै॥
अर्थ—संसार के अन्य ज्ञान के विषय में सुनें। वेद पुराणादि तो भवसागर के लिए बेड़ी बन्धन
(बेरी) जैसे हैं। पंडित इन्हें पढ़-पढ़कर ज्ञान कहता है, और वह आदि ज्ञान की समझ और उसके भेदों
को नहीं समझता॥
आशा, वासनाएँ (बास) सब कुछ झूठे हैं-पुनः पुनः श्वास की आशा (जीवन) भवसागर के लिए
बेड़ी बन्धन (बेरी) बन जाता है। जो जो कार्य करता है, उसी का फल उसे मिलता है—और वह वासना
के संसार में भटकता रहता है॥
मन की आकांक्षाओं का वह लक्षण (मोह) मान बैठता है, इसीलिए वह नरक की खान में पड़ता
है। वह भक्तिभाव का रहस्य नहीं समझ पाता और जातियों को श्रेष्ठ मानकर उनमें मन लगाता है॥
साधु संगति का भाव उसके मन में नहीं उत्पन्न होता और अपने ज्ञान को ही सर्वोच्च ठहराता है। वह
जब लघुता के भाव से सम्पन्न होगा तो संतों को समझेगा, फिर सन्तों की कृपा से थोड़ा बहुत ज्ञान
उत्पन्न होगा। संतों के भेद वेद ज्ञान से भी विलक्षण हैं और सब कुछ लघुता से ही व्यक्ति प्राप्त कर
सकता है।
उच्च मानदण्ड सदैव ही रक्षा करते हैं और वही सम्पूर्ण संसार एवं जीवों के रूपों का निरूपण
करता है। इससे भिन्न केवल अपने अनुसार अन्य पूजा आदि की विधियाँ बताते हैं, ऐसे व्यक्ति सभी
के लिए भ्रम उत्पन्न करते हैं॥