घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)
Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras
सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघट रामायण / १११
वह साधक सुरति ज्ञान से सर्वथा अपरिचित ( अचीन्हा ) रहता है इसलिए वह उसी योग के ही
अधीन बना रहता है। (इसने सतसंग नहीं किया हैं) इसलिए सत्संग के बिना ज्ञान (भेद) नहीं समझ में
आता-इसीलिए वह पुर्नजन्म लेकर सांसारिक कर्म भोगों में आता है।
॥ सोरठा ॥
जोग जुगुति गति गाइ, नहिं अकाय गति पायऊ।
बिन सतसंग नसाइ, सुरति सब्द चीन्हें बिना॥
ज्ञान गती कथि गाइ, जो अघाइ आगे कही।
ताहिं पाइ मति माइ, सो तुलसी सब बिधि कही॥
अर्थ-योग युक्ति (तरीकों) की गति गाकर निष्काम गति नहीं प्राप्त की जा सकती। सुरति शब्द
की पहचान किए बिना तथा सत्संगति से रहित सारा जीवन नष्ट हो जाता हैं।
मैंने ज्ञान की गति का वर्णन किया है-जो साधुजनों की तृप्ति का कारण होता है उसे मैं आगे
कहूँगा-हे सन्तों, उसे ज्ञान के अन्तर्गत प्राप्त करो-इसका वर्णन मैं (तुलसीदास) आगे करूँगा॥
॥ बरनन ज्ञान ॥
॥ प्रथम ज्ञान ॥
॥ चौपाई ॥
अब सुनु ज्ञान ठान गति गाऊँ। ता का भेद भाव बतलाऊँ ॥
रेचक पूरक कुम्भक कहिये। ता का भेद सबै सुनि लैये ॥
चारि अवस्था तन में भाखी। तुरिया तत्त चारि अभिलाखी ॥
परमहंस ता की मति जाना। मन करता को ब्रह्म बखाना ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति कहाई। तुरिया चौथी भेद न पाई ॥
तुरियातीत बसै वोहि पारा। सुनि पुनि है मन का ब्यौहारा ॥
मनमत चलै मान मद माई। मन करता को ब्रह्म बताई ॥
ता ते भौ गति मति नहिं पावै। बार-बार भौ माहिं समावै ॥
सतगुरु सब्द भेद नहिं जानै। आपी आप ब्रह्म मन मानै ॥
सास्तर सिंध सार बतलावै। ता ते भौजल पार न पावै ॥
चीन्हैं संत सुरति गति न्यारी। तौ पुनि उतरै भौजल पारी ॥
आपा आप पाप गति खोवै। तब सतसंग संत गति जोवै ॥
अर्थ-अब ज्ञान की स्थिति (ठाम) सुनों, मैं उसकी गति का गान कर रहा हूँ और मैं उसके भेद
तथा भाव की गति बतला रहा हूँ। रेचक, पूरक, कुम्भक इसे कहा जाता हैं और सभी भेदों को सुन लें॥
शरीर की चार अवस्थाएँ कही गई हैं-(जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति) के साथ तुरीया गति की
अभिलाषा की जाती हैं। इसकी गति परमहंस ही जानते हैं तथा इस कर्त्ता मन को ही ब्रह्म कहा जाता है॥
मन की अवस्थाएँ जागृति, स्वप्न एवं सुषुप्ति कही जाती हैं-इसके चौथे भेद तुरीया को सामान्य
जन नहीं प्राप्त करते। मन की अन्तिम व्यवहार दशा यह है कि वह तुरीयातीत होकर उसके उस पर
निवास करता रहे ॥