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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

घट रामायण / १९७
॥ सोरठा ॥
ठीका ठुमरी माँहि आठ अटारी अधर की।
सूरति पदम विलास विधि बयालीस पद मिली॥
अर्थ-इस ठीका ठुमरी राग द्वारा अन्तर्रात्मा (अधर) की आठ अटारियों का वर्णन कर रहा हूँ।
सूरति द्वारा प्रिय के चरणों में विलास करती हुई मैं विधिवत् बयालीस तत्त्वों से मैं मिली॥
॥ ठुमरी १॥
अली अटकी सुरति अटारी। मन हटकर हारा री॥ टेक ॥
यह अँग संग भंग ले लटकी। सूली स्वर्ग नर्क भौ भटकी।
दीन्ही सतगुरु घट की तारी। चटकी मति फटक फटा री॥ १॥
ये ले लार पार स्रुति सटकी। निरखि अलख आदि घटघट की।
हकलख लागी बिरह करारी। हिये खटकी कसक कटारी॥ २॥
नौलख खेल कला ज्यों नट की। सूरति सहस कँवल झर भटकी॥
लीला सिखर निकर नित न्यारी। दधि मटुकी घिरत मठारी॥ ३॥
तुलसी तोल कही तिल तट की। भड़ धुनि रंकार रस रट की॥
ये दस रस बस सुरति सँवारी। पिउ पट की खोलि किवारी॥ ४॥
अर्थ-हमारी सखी अभी सुरति की अटारी में ही फँसी हुई है, वहाँ से हटकर मन हार बैठा है, सुरति
लोक में अन्य तत्त्वों को साथ-साथ लेकर मैं लटकी रही-स्वर्ग, नरक, भवसागर की पीड़ा (सूली)
में भटकती रही। सतगुरु ने इस पिंड के दरवाजे पर ताली लगा दी और उस दरवाजे की आवाज सुनते
है-हमारी चेतना जाग्रत (फटक) हो उठी॥ १॥
अलक्ष्य ब्रह्म जो मूलरूप में आदि से ही घट-घट में स्थित है, उसे देखकर यह मेरी ज्ञान चेतना
आनन्दपूर्वक मुझे लेकर उसके पास पहुँच गई-एकाएक (हकलक) मुझे उसे पाने के लिए तीक्ष्ण
वियोग जागृत हो उठा और हृदय में जैसे कसक भरी कटारी खटक (घुस गई या लग गई-या हिल
गई) गई हो॥ २॥
मैं सुरति ज्ञान के स्त्रहस्त्रार कमल दल में एकाएक ऐसी भटक गई मानो नट कला के नौलख
खेलों में भटक गया हो। शून्य शिखर की लीला नित्य विलक्षण है-जैसे दही से भरी हुई मटकी में ऊपर
छाँछ क्षण-क्षण अपने आप उतर आता हो॥ ३॥
एक तिल जैसे स्थान वाले तट की कोई तुलना (तोल) नहीं है और उसमें अनाहत नाद के 'रंकार'
ध्वनि की रसमयी रटन शुरू हो उठी। फिर पति (ब्रह्म) के कक्ष की किवाड़े खोलकर मैंने दस रसों के
वश में होकर सुरति ध्यान (आलिंगनादि का आनन्द) सँवार लिया॥ ४॥
॥ ठुमरी २॥
मँझरी पिय झाँकि निहारी। सखि सतगुरु की बलिहारी॥
दीन्हे दृग सुरति सँवारी। चीन्हा पद पुरुष अपारी॥ १॥
चली गगन गुफा नभ न्यारी। जहँ चंद न सूर सिहारी॥
तुलसी पिय सेज सँवारी। पौढ़ी पलँगा सुख भारी॥ २॥
अर्थ-हे सखि! मझली नायिका ने पति (ब्रह्म) को झाँक कर देख लिया, यह गुरु की ही कृपा का