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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

११० / घट रामायण
॥ सोरठा ॥
चारौ गति वैराग सुरति लाग न्यारी रही।
सत मत गति कोइ जाग संत सरनि उबरा सोइ॥
अर्थ-त्ये चारों गति वैराग्य की हैं-इसमें सुरति में लगी हुई चित्तगति विलक्षण है-कोई ही सन्तमति
का व्यक्ति संसार में जगता है-और सन्तों की शरण में जाकर मुक्ति प्राप्त कर लेता है॥
॥ वरनन जोग ॥
॥ प्रथम जोग ॥
॥ चौपाई ॥
चारों गति बैराग बखाना। आगे कहौं जोग साधांना॥
पिरथम परम जोग गति गाऊँ। भिन्न भिन्न तेहि को दरसाऊँ॥
मुद्रा पाँच अवस्था चारी। तीनि ज्ञान पुनि बानी चारी॥
सहस कँवलदल सुरति लगावै। आतम तत्त अकास समावै॥
पुनि तन छूटि पावै नर दही। भोग भुगति पुनि भव रस लेही॥
पावै मुक्ति बास कर चीन्हा। मुक्ति भोग पुनि होइ अधीना॥
अर्थ-वैराग्य की चारों गतियों का वर्णन कर रहा हूँ। आगे योग के लक्ष्य (संधान) का वर्णन
करूँगा। प्रथम परम योग की गति का गान करता हूँ। उसके भिन्न-भिन्न स्वरूपों को भी स्पष्ट करूँगा।
पाँच मुद्राएँ हैं, चार अवस्थाएँ, तीन ज्ञान हैं, तथा चार वाणियाँ हैं। सहस्त्र कमल दल पर जो सुरति
ध्यान लगाता है, और आत्म तत्त्व के साथ जो शून्य में समा जाता (विलीन हो जाता) है। पुनः शरीर
छूटने पर वह मनुष्य की देह प्राप्त करता है फिर अनेक प्रकार के भोगों एवं संसार की आनन्दमयी
वासनाओं का भोग करता है। अन्त में, वह मुक्ति का निवास प्राप्त करता है, फिर मुक्ति और भोग दोनों
उसके अधीन हो उठते हैं॥
द्वितीय जोग
॥ चौपाई ॥
दूजा जोग कहौं समझाई। इड़ा पिंगला सुषमनि माई॥
बंक नाल पट मारग जाई। मन भया भिन्न सुन्न के माई॥
देखै जोति निरखि निज नैना। तन छूटै सुपने की सैना॥
जो कछु कर्म भाव जग कीन्हा। छूटै देह भोग फल लीन्हा॥
सुरति सब्द बिन भये अचीन्हा। ता सों हो गये जोग अधीना॥
बिन सतसंग भेद नहिं पावै। ता ते कर्म भोग भव आवै॥
अर्थ-अब मैं दूसरे योग का समझाकर वर्णन कर रहा हूँ। इसका सम्बन्ध इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से
है। बंक नाल के छः सन्धियों के मार्ग से जाता हुआ इस साधक का मन शून्य में पहुँच जाने के कारण
लोकजन से भिन्न हो उठता है।
वह अपने नेत्रों से उस परम ज्योति को देखता है और उसकी मृत्यु भी स्वप्न की ही भाँति होती है।
उसने संसार में जो भी कर्म तथा भावनाएँ की हैं-देह छूटने पर उसके अनुसार फल भोग प्राप्त होता है।