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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 111

११८ / घट रामायण
फल है। सुरति ध्यान को सँवार कर उसने आँखें बन्द कर ली और उस अनन्य ब्रह्म (अपारी पुरुष) का
स्थान पहचान लिया ॥ १ ॥
उस शून्याकाश की न्यारी गुफा में वह चल पड़ी जहाँ न चन्द्रमा है, न सूर्य है-न कोई अन्य
(सिहारी) है। तुलसी साहब कहते हैं कि वहाँ प्रिय (ब्रह्म) की सेज सजी हुई बिछी है-और वह आत्मा
पलँग पर अत्यन्त आनन्द के साथ लेट गई (पौढ़ी) ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ३ ॥
सलिता जिमि सिंध सिधारी। सूरति रत सब्द बिचारी॥
जहँ सुन्न न सुन्नी न्यारी। मत मीन महासुन पारी॥ १ ॥
नहिं गुन निर्गुन मत झारी। निज नाम निअच्छर भारी॥
जहँ पिंड ब्रह्मांड न तारी। तुलसी जहँ सुरति हमारी॥ २ ॥
अर्थ-जैसे सरिताएँ सिन्धु के लिए प्रस्थान करती हैं-उसी प्रकार सुरति रत साधक अनादि शब्द की
ओर चलता है। जहाँ न शून्याकाश है और न शून्यसाधक चित्त, यह मन रूपी मछली उस महाशून्य रूपी
सरोवर में जा पड़ी (पारी) ॥ १ ॥
जहाँ न गुण है, न निर्गुण है और सारे मतवाद भी वहाँ नहीं हैं-और वहाँ उसका (ब्रह्म का) अपना
नाम बिना अक्षर का है। जहाँ न पिंड है, न ब्रह्मांड हैं न ज्ञान की किवाड़ों को बंद किये हुए ताली हैं-
तुलसी साहब कहते हैं कि वहाँ हमारी सुरति निवास करती है ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ४ ॥
ए अली आदि अंत अधिकारी। पिय प्यारी प्रीति दुलारी॥
हम कीन्हा खेल पसारी। सब रचना रीति हमारी॥ १ ॥
करता नहिं काल पसारी। हम अगम पुरुष की नारी॥
ठुमरी सोइ संत बिचारी। तुलसी नित नीच निहारी॥ २ ॥
अर्थ-हे सखी ! यह नायिका (पत्नी), आत्मा प्रिय (ब्रह्म) को अति प्रिय हैं, उसके आदि अन्त की
स्वामिनी है और अत्यन्त प्रेम के कारण उसके लिए दुलारी बनी हुई है। हमारे सारा खेल खुला फैला है
और खेल की रचना और दूसरे की नहीं, मेरी ही है ॥ १ ॥
इस खेल का कर्त्ता चारों ओर फैला हुआ काल नहीं है मैं तो उस अगम पुरुष (ब्रह्म) की पत्नी हूँ।
(जिस पर किसी अन्य का प्रभाव नहीं है)। संतों की इस आनन्दमंगलमयी ठुमरी को सुनकर तुलसी
साहब सदैव अपने को छोटा (तुच्छ, नीच) समझते रहते हैं ॥ २ ॥
॥ ठुमरी ५ ॥
ए गुइयाँ पिय हम हम पिय एकी। कोइ फरक न जानौ नेकी॥
कोइ बूझै संत बिबेकी। जोड़ अगम निगम नहिं लेखी॥ १ ॥
जिन अटल अटारी पेखी। पिय रूप न रेख अदेखी॥
कोइ कंथ न पंथ न भेषी। तुलसी सब मारग छेकी॥ २ ॥
अर्थ-हे साथिन (गुइयाँ)! प्रिय में मयी और मैं प्रियमयी बनकर एक हो उठी हूँ और हममें तथा
उनमें (आत्मा तथा ब्रह्म में) कोई जरा भी (नेकी) अन्तर न समझो। इस वास्तविकता को कोई
बिबेकवान् सन्त ही समझ सकता है-जिसने अगम एवं निगम में निरूपति ब्रह्म को न समझकर
आत्मब्रह्म को समझा हो ॥ १ ॥