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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

घट रामायण / ११३
॥ सोरठा ॥
यहिं बिधि जग मत ज्ञान पंडित भूले भरम में।
वाक ज्ञान परमान संत भेद चीन्हें नहीं॥
अर्थ-इस प्रकार से सांसारिक ज्ञान है, शास्त्रकार पंडित भ्रम में भूले हुए हैं-जहाँ तक सन्तों का
प्रश्न है, वे किसी तरह के भेद भाव को नहीं पहचानते। उनके लिए केवल वाक् ज्ञान (सही-सही रूपो
में शब्दों का गया) ही प्रमाण है॥
॥ चौपाई ॥
अब सुनु भक्ति भाव कर लेखा। रामायन में कीन्ह बिबेका॥
भक्ति भाव नौ बरनि सुनाई। ता से भिन्न चारि पुनि भाई॥
नौ फल भाव बेद बतलावै। जो जस करै भोग तस पावै॥
नौ की राह मुक्ति नहिं पावै। दसवीं अविरल भक्ति लखावै॥
एकादस अनुपावन लेई। बार बार मुक्ती बर देई॥
भेद भक्ति कर भाखौं लेखा। इष्ट भाव मन बसै बिबेका॥
अब अभेद का भेद अभेदा। ता को परम न पावै बेदा॥
कोइ कोइ साध संत गति पाई। जिन की सूरति सब्द समाई॥
सूरति सैल करै असमाना। जोगी पंडित परम न जाना॥
परमहंस सन्यासी भाई। उन का मरम नहीं उन पाई॥
जगत जाल संसार बिचारा। उनकी गति कोइ पावै न पारा॥
अर्थ-अब भावभक्ति का वर्णन सुनें। मैंने रामायण में उसका विवेक (स्पष्ट निरूपण) किया है।
मैंने नौ प्रकार के भक्तिरूपों का वर्णन करके बताया है-उनसे भिन्न चार प्रकार के और भी भक्ति भेद
हैं।
वेद या शास्त्र परम्परा नवधा भक्ति के फलों के स्वरूप का वर्णन करते हैं-जो जिस प्रकार की
भक्ति करता है-वह उसी प्रकार का फलभोग प्राप्त करता है। नवधा भक्ति के मार्ग पर चलने से मुक्ति
नहीं मिलती। दसवीं अविरल भक्ति का मार्ग दिखाती है। एकादश भक्ति अनुपावन (आत्म शुद्धि) होती
है और यह भक्ति बार-बार श्रेष्ठ मुक्ति देती है।
अब भेद भक्ति का वर्णन करता हूँ इससे इष्ट भाव के प्रति मन में विवेक उत्पन्न होता है। अब
अभेद रूप अभेद भक्ति का भेद बताता हूँ उसका रहस्य वेद को भी नहीं ज्ञात है। इसका ज्ञान किसी-
किसी साधु सन्त को प्राप्त होता है-इसका ज्ञान सुरति समाधि में समाविष्ट है॥
सुरति समाधि द्वारा जो शून्य (आकाश) में स्थित शिखर पर है, योगी तथा पंडितजन भी उसके मर्म
को नहीं जानते। परमहंस एवं सन्यासी भी उसका रहस्य नहीं जान पाए हैं। यह बेचारा मनुष्य संसार
जगत जाल में फँसा पड़ा है-उनकी गति का कोई पार नहीं पा सकता॥
॥ सोरठा ॥
तेरा भक्ति बयान, सो प्रमान संतन कही।
तुलसी तनहिं बिचारि, सुरति भेद समझै कोई॥१॥
नौ जग माहिं पसार, दसवीं कछु कछु भिन्न है।