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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

११४ / घट रामायण
एकादस मुक्ति मँझार, द्वादस गति मति मुक्ति मय ॥ २ ॥
अब अभेद गति गाइ, तेरह येहि बिधि यों कही।
ये साधन के माहिँ, सुरति सब्द जा ने लखी ॥ ३ ॥
अर्थ-सन्त तुलसी साहब कहते हैं कि उनकी भक्ति के वर्णन का प्रमाण वही है, जो संतों द्वारा
किया गया है। जरा विचार करके देखो, सुरतिभेद (रूपी भक्ति) कोई समझता नहीं है॥ १॥
नवधा भक्ति का संसार में प्रचलन है, दसवीं भक्ति कुछ-कुछ भिन्न है, एकादश भक्ति के लिए
वही आधार है और बारहवीं भक्ति ज्ञानमय, विवेकमयी एवं मुक्तिमयी है॥ २॥
इस अभेद भक्ति का वर्णन करके मैंने इस प्रकार तेरह भक्ति रूपों का वर्णन किया है-जिसने
सुरति 'शब्द' देख लिया है, उनके लिए ये सब साधन हैं या मार्ग हैं॥ ३॥
॥ छन्द ॥
चारों बैरागा जोग समाधा। तीनि ज्ञान गति गाड़ दई।
नौ चारों भक्ती जो निज उक्ती। भाषि भेद सब गाइ कही॥
जो जिन जानी संत बखानी। चरन चेत चित लाइ लई ॥ १ ॥
सूरति सर चेती छाँड़ि अचेती। सुरति सैल नभ माहिं लई।
फोड़ा असमाना निरखि ठिकाना। पच्छिम किवारी द्वार गई॥ २ ॥
परमातम पाया जीव छुड़ाया। पारब्रह्म पद कँवल मई।
कँवला निज फूला मिटि गया सूला। जीव गती तजि ब्रह्म भई ॥ ३ ॥
आगे इक द्वारा अगम पसारा। सत्तलोक वोहि नाम कही।
वहँ है सतनामा ब्रह्म न जाना। वे सत साहिब अगम सही ॥ ४ ॥
तीनों से न्यारा लोक पसारा। चौथे पद के पार वही।
जहँ है निःनामी कोउ न जानी। तीनों पट के पार रही ॥ ५॥
कहौं अगम अनामी ठीक न ठामी। संतन जानी सार सही।
अंबर असमाना मही न भाना। चाँद सुरज तत तारे नहीं ॥ ६ ॥
पानी नहिं पवना अगिनि न भवना। वेद भेद गति नाहिं लई।
ब्रह्मा नहिं बिस्ना राम न किस्ना। सिव सिद्धी नहिं पार लई ॥ ७ ॥
निर्गुन नहिं सर्गुन नहिं अपबर्गुन। पिंड ब्रह्मांड दोउ नाहिं कही।
जोती नहिं सोती अगम न होती। पारब्रह्म की आदि नहीं ॥ ८ ॥
नहिं कार अकारा नहिं निरकारा। सत्त नाम सत सत्त रही।
नहिं नाम अनामी तुलसी जानी। जाइ समानी सार मई ॥ ९॥
अर्थ-चारों प्रकार के वैराग्य, योग, समाधि तथा तीन ज्ञानों की गतियों का वर्णन करके बतला
चुका हूँ। तेरह (नौ + चार) प्रकार की भक्ति के सम्बन्ध में अपने मत आदि का वर्णन करके उनके
भेदों का निरूपण किया ॥
इनमें से जो इसको जान ले रहा सन्त कहा जाएगा और मैंने उसके निर्मल चरणों में चित्त को लगा
लिया है॥ १॥