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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

१९६ / घट रामायण
सुरति ध्यानी मे न ही उस धाम तक पहुँचते हैं, वह अनाम गति है-उसके विषय में ऐसा कहा गया
है॥ ३ ॥
तुलसी साहब कहते हैं कि यह मेरा अपना अगम चिन्तन है और मैंने इसे उस परम तत्त्व के पार
(शून्य पर्वत शिखर के पार ) जाकर मैंने देखा है-वह अलेख्य की स्थली है-तुलसी ने उसे अपने
अनुभव से विचारा ( समझा) है॥ ४॥
सुरति ध्यान रूपी अटारी ( अट्टालिका ) के उस पार उस शून्य (अघट ) में आठ अटारियाँ
( अट्टालिकाएँ) हैं। तुलसी साहब कहते हैं कि मैंने उनका सारतत्त्व समझा है और उसको समझने के
बाद उनमें तन्मयता (भिनि गई) प्राप्त कर ली॥ ५ ॥
॥ चौपाई ॥
आठ अटारी सुरति समानी। मंगल ठुमरी करी बखानी॥
जस जस सूरति चढ़ी अटारी। तस तस बिधि मैं भाखी सारी ॥
अर्थ-सुरति आठ अटारियों (अट्टालिकाओं) में जाकर समा गई और मैं उसका वर्णन मंगल ठुमरी
राग में कर रहा हूँ। जैसे-जैसे एक-एक (अटारी) अट्टालिका पर सुरति चढ़ रही है, उस-उस प्रकार से
उसके मंगल का गान मैं कर रहा हूँ।
॥ मंगल ॥
आठ अटारी महल, सुरति चढ़ि चाखिया।
ठुमरी माहीं भेद, भाव सब भाखिया ॥ १ ॥
संत पंथ का अंत, साध कोइ बूझिहै।
प्यारी पुरुष मिलाप, साफ स्रुति सूझिहै॥ २ ॥
जस जस मारग रीति, राह समझाइया।
प्यारी अटारी माहि, जाइ सोइ गाइया ॥ ३ ॥
मन मथ कीन्हा चूर, सूर स्रुति ले चढ़ी।
गुरु पद पदम मँझार, पुरुष पै जा खड़ी ॥ ४॥
बिधि बिधि ठुमरी माहिं, गाइ तुलसी कही।
जो कोइ चीन्हे भेद, संत सोई सही ॥ ५ ॥
अर्थ-आठ अटारियों (अट्टालिकाओं) के ऊपर चढ़कर सुरति अपने प्रिय का आनन्द चख रही है।
इस मंगल ठुमरी के माध्यम से उसके स्वरूप तथा दशाओं का मैं वर्णन करता हूँ॥ १ ॥
संत मार्ग की समाप्ति का मर्म कोई ही संत बूझेगा। प्रिय आत्मा एवं पुरुष ब्रह्म का मिलन वेदों में
साफ-साफ दिखाई पड़ता है॥ २ ॥
जैसा-जैसा वहाँ तक पहुँचने का मार्ग है और उनके परस्पर मिलने की रीति है, मैं उसे समझा रहा
हूँ। प्रिया (आत्मा) प्रिय (ब्रह्म) की अटारी में है वहीं जाकर मैं गान करता हूँ॥
कामदेव को पूरी तरह नष्ट करके चूर्णकर दिया और श्रुति के सूर (आत्म तत्त्व) को लेकर मैं
अट्टालिका के ऊपर चढ़ चली। गुरु के चरण कमल के मध्य होकर मैं अपने प्रिय पुरुष (आराध्य
परमात्मा) के चरणों में जाकर खड़ी हो गई ॥ ५ ॥
तुलसी साहब कहते है अनेक प्रकार की ठुमरियों में इसे गाकर बताया है-जो इन भिन्न-भिन्न
ठुमरियों के भेद पहचान ले वही संत है ॥ ५ ॥