गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
जरना का अंग ६७
जरना साहब संत है जरना सतगुरु साँच ।
जरना पाँचो तत्त है ऐसी जरना काँछ ॥४६॥
जरै सो अबिचल रहेगा जरै सो परलय नाहिं ।
जरना जोगी ना मरै आवागमन ना जाहि ॥४७॥
जरै सो निरगुन नूर है जरै सो निरगुन तंत ।
जरै सो साहब आप है जरै सो सत भगवंत ॥४८॥
ज्ञान जोग कूँ सब जरै जरै नाम निरधार ।
आठ सिद्ध नौ निद्ध कूँ जरना अधम उधार ॥४६॥
भक्ति मुक्ति कूँ सब जरै जरै जोग बैराग ।
आपा ठहरावै नहीं यह मत पूरन भाग ॥५०॥
दया धर्म को सब जरै जरै सील सन्तोष ।
मनी कुफर ब्यापै नहीं मिल पद रहै अजोख ॥५१॥
मुख से कहै सो सब जरै सरवन सुनै समोय ।
मन की धारन सब जरै सो जन निःचल होय ॥५२॥
चार मुक्ति जरना जरै बिहिस्त बैकुंठ बिलास ।
काया माया सब जरै सो साधू निज दास ॥५३॥
पुर पट्टन नगरी बसै भेद न काहू देत ।
कीड़ी कुंजर१ पोषता अपना नाम न लेत ॥५४॥
पुर पट्टन नगरी बसै निरधारं आधार ।
लख चौरासी पोषता ऐसी जरना सार ॥५५॥
चौरासी भाँड़े गढ़ै खेलै खेल अनंत ।
जाकी जरना देख कर जे कोइ साधै संत ॥५६॥
चौरासी भाँड़े गढ़ै खेलै खेल अपार ।
खान पान सब देत है ऐसा समरथ सार ॥५७॥
(१) चींटी से हाथी तक ।
६८ गरीबदास जी की बानी
कहि न सुनावै और कूँ जो कुछ करै सो लीन१।
जाकी जरना देख कर संत भये बेदीन ॥५८॥
परचे कोट अनंत हैं अजमत२ कोट अनंत ।
कीमत कोट अनंत है जरना जोगोकंत ॥५६॥
कच्छ मच्छ बारह३ कुरम४ सेस धौल५ फन धार ।
ब्रह्मंड कोट अनंत है रोम रोम की लार ॥६०॥
एती लख जरना जरै कारन कवन अलेख ।
संत सूर जरना जरै कोइ हमरी जरना देख ॥६१॥
धौल गगन गिरनार६ है बसुधा७ ब्रह्म विलास ।
हमरी जरना देख कर बिस्नु लहै कोइ दास ॥६२॥
निरगुन सरगुन सब कला बहुरंगी बरियाम८ ।
पिंड ब्रह्मांड पूरन पुरुष अवगत रमता राम ॥६३॥
अनँत कला कलधूत९ हैं अनँत कला परवान ।
ऐसी जरना तू जरै धन कादिर१० कुरवान ॥६४॥
सब जानत है जगत गुरु कहि न सुनावै कोय ।
ऐसी जरना तू जरै नहीं किसी से होय ॥६५॥
जुगन जुगन के पाप सब जुगन जुगन के मैल ।
जानत है जगदीस तू जोर किये बद-फेल ॥६६॥
करमों कारन देख कर मौन रहे मुसताक ।
तेरी जरना देख कर संतों हासिल हाथ ॥६७॥
जरना बड़ जाजुल्ल११ है जरना नाद समोय ।
ऐसी जरना सो जरै जा तन सीस न होय ॥६८॥
(१) गुप्त । (२) करामात । (३) बाराह । (४) कुरम और कच्छ दोनों एक ही हैं
ज्यादा "दिग्गज" का शब्द लगता है क्योंकि आठों दिशा के गज और शेष नाग पृथ्वी
को सम्हाले हुए हैं। (५) सफेद । (६) नाम पहाड़ का जिस पर बहुत से सिद्ध रहते हैं ।
(७) पृथ्वी । (८) वरीयान = सब से श्रेष्ठ । (६) निर्दोष । (१०) शक्तिमान । (११) खूब
जलता हुआ।
जरना का अंग ६६
जरना जरै सो जालिम जोगी जरना जालिम जिंद।
जरना जरै सो आपै आपं काल करम नहि फंद ॥६६॥
परदा कभी न पाड़िये१ जे सिर जलै अँगौठ।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार की पीठ ॥७०॥
परदा कभी न पाड़िये जे सिर बलै अँगार।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार सिर भार ॥७१॥
परदा कभी न पाड़िये अपने ही सिर लेह।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार मुख खेह ॥७२॥
परदा कभी न पाड़िये जे सिर आई होय।
चाबुक तोड़ौ चौपटे सार झरंता लोह ॥७३॥
परदा कभी न पाड़िये जे जाता है सीस।
चाबुक तोड़ौ चौपटे हुकम सरे जगदीस ॥७४॥
परदा कभी न पाड़िये जो जाती है जान।
चाबुक तोड़ौ चौपटे नीर छीर कूँ छान ॥७५॥
एती जरना जब जरै सतगुरु से है भेंट।
बका बकाई करत हैं जिन्ह हद्दी गुरु फेंट२ ॥७६॥
जिन के अंतर लगन है जोर कहेंगे राम।
बका बकाई करत हैं आन भखैं बेकाम ॥७७॥
पृथ्बी का गुन लीजिये औगुन उर नाहिं धार।
जिनके दिल में एक है दूजे को दें डार ॥७८॥
सब्द अनाहद जो रते दूजा नहीं उपाव।
सुन्न मँडल में रम रहा ना जहँ करम लगाव ॥७६॥
अनहद मंदल३ बाजहीं बारह मास अचंभ।
कबीर दास गरीब कूँ भक्ति दई आरंभ ॥८०॥
(१) उघारिये। (२) जो संसारी गुरू की लपेट में रहेंगे वह बाद बिबाद में जन्म
गँवावेंगे। (३) तबला, मृदंग।
१०
७० गरीबदास जी की बानी
॥ निश्चय का अंग ॥
अपने दिल साधू नहीं वा कूँ दरसा साध ।
भैंस सींग से जानिये गत कुछ अगम अगाध१ ॥ १ ॥
उसके मन की फुरत है अपने मनकी नाहिं ।
गनिका चढ़ी बिमान में अजामील की बाँहि२ ॥ २ ॥
तीन धात हैं पिता की चार धात हैं माय३ ।
सिष स्वामी इकसा मिलै हंसा पहुँचै ठाँय ॥ ३ ॥
निःचय ऊपर नामदेव पाहन दूध पिलाये ।
भैंस सींग में साहब आये नाम रतन धन पाये४ ॥ ४ ॥
निःचय ही से देवल फेरा पूजो क्यों न पहारा ।
नामदेव दरवाजे बैठा पंडित के पिछवारा ॥ ५ ॥
(१) देखो नोट पृष्ठ २० । (२) अजामिल के कुकर्मी होने और अन्त में नारायण
नाम के प्रताप से तर जाने की कथा नोट पृष्ठ २१ में लिखी है परन्तु उसकी बदौलत
उसकी बेश्या का भी उद्धार होने का प्रमान कहीं नहीं पाया जाता । (३) बालक में पिता
और माता दोनों के अंश से तीन तीन बस्तु की उत्पत्ति लिखी है— पिता के अंश से
हड्डी रग और मज्जा (या गूदा) और माँ से बाल लोहू और मांस, चौथी वस्तु माँ के
अंश से कौन सी बनी है इसका प्रमान हम को कहीं नहीं मिला । महात्मा चरनदास
जी ने पिता के अंश में रग की जगह बीर्ज लिखा है और माता के अंश में बाल की
जगह त्वचा ।
(४) नामदेवजी की प्रचंड भक्ति जगत-प्रसिद्ध है। यह बामदेव जी की विधवा कन्या
के उदर से भगवंत की दया दृष्टि से हजरत ईसा की भाँत जनमे थे । इन के नाना भी
बड़े भक्त और माता पूरी सती और प्रेमी थीं। नामदेवजी के विषय में बहुत से चमत्कार
लिखे हैं । लड़कपन ही से इन की परमार्थ में रुचि थी और उसी अवस्था में एक बार
उनके नाना ठाकुर जी की सेवा उनके सुपुर्द कर के बाहर गये । जब नामदेवजी ने ठाकुर
जी के सामने दूध धरा और उन्होंने न पिया तो इन्होंने समझा कि हमसे अप्रसन्न हैं
और तीन दिन तक मन्दिर में बिना अन्न पानी के दुखी पड़े रहे अंत को ठाकुर जी ने
कटोरा उनके हाथ से लेकर दूध पी लिया और थोड़ा सा उनको प्रसाद दिया ।
किसी मेले के समय में नामदेव जी अपना जूता कमर में बाँध कर पंढरपुर के
ठाकुरद्वारे में दर्शन को गये संयोग से जूता किसी ने देख लिया और इन को मार कर
मन्दिर से निकाल दिया । बेचारे मंदिर के पीछे जाकर दर्शन न मिलने से व्याकुल होकर
बैठ गये और वहाँ विनती करने लगे उसी दम मंदिर जड़ से फिर कर द्वारा उनकी
ओर हो गया ।
निश्चय का अंग ७१
निःचय ही से गऊ जिआई निःचय बच्छा चूगै ।
देस दिसंतर भक्ति गई है फिर को लावै भूगै१ ॥ ६ ॥
गोपीचन्द भरथरी जोगी निःचय राज बिराजी२ ।
निःचय होय तो नेड़े निपजै क्या पंडित क्या काजी ॥७॥
निःचय सेऊ सीस चढ़ाया चोरी संत सिधारे ।
बनियाँ कूँ जहँ पकड़ लिया है करदे३ सीस उतारे४ ॥८॥
पिता समन और माता नेकी जिनके निःचय भारी ।
जहाँ कबीर कमाल फरीदा भोजन की भइ त्यारी४ ॥६॥
सेऊ के धड़ सीस चढ़ाया मीन मेख नहिं कोई ।
हाजिर नाजिर मिले बिसंभर ऐसा निःचय होई ॥१०॥
तपिया के तौ जकतक५ कीना लोदिया के घर आये ।
ताड़ी घाल लिये परमेसर निःचय हाथ बँधाये ॥११॥
निःचय ऊपर बालद आई और केसो बनजारा ।
नौलख बोरी लदा लदीना कासी नगर मँझारा६ ॥१२॥
निःचय पंडा पाव७ बुझाया जगन्नाथ के माहीं ।
अटका फूट पड़ा पाँवन पर अजहूँ बात न भाई ॥१३॥
(१) एक बार बादशाह ने उनको पकड़ बुलाया और कहा कि तुमने सिद्धाई का
ढचर फैला रक्खा है हमारी गाय मर गई है उसको जिला दो नहीं तो कतल कर डाले
जाओगे । नामदेवजी ने बहुत उजर किया कि मैं तो एक नीच छीपी हूँ मुझ में कोई गुन
नहीं है—पर बादशाह ने न माना आखिर को महात्मा जी ने भगवत चरन में बिनती
की और गाय जी उठी ।
एक बार घर में आग लगी तो नामदेवजी और सामान जो घर के बाहर रक्खा
हुआ था उसको भी आग में मालिक की मौज से उसका लगना समझ कर डालने लगे ।
भगवान ने उनका छप्पर का घर दूसरा बिचित्र रीति से आप रच दिया ।
(२) राजा भरथरी बड़े त्यागी और जोगी हुए और राजा गोपीचन्द उनके भांजे
उनके चेले बने । (३) छुरी से । (४) देखो नोट पृष्ठ १३ । (५) झगड़ा । (६) देखो
नोट पृष्ठ २६ । (७) पावक = आग [ जगन्नाथ जी के मन्दिर में आग लग जाने से
वहाँ का रसोइया जलने लगा कबीर साहब ने काशी में धरती पर पानी गिरा कर
आग बुझा दी ] ।
७२ गरीबदास जी की बानी
कासी तज कर मगहर पहुँचे ऐसा निःचा कहिये।
सतगुरु साख समझ ले भाई थीर पकर थिर रहिये१ ॥१४॥
कासी मरे सो जाय मुक्ति कूँ मगहर गदहा होई।
पुरुष कबीर चले मगहर कूँ ऐसा निःचा जोई१ ॥१५॥
कासी के तो पंडित कूकैं मगहर मरो न भाई।
वा तौ पृथ्वी सूची नाहीं त्रिसंक पड़ो चिल्लाई१ ॥१६॥
कासी तज मगहर कूँ चाले किया कबीर पयाना।
चादर फूल बिछेही छाँड़े सब्दै सब्द समाना२ ॥१७॥
मगहर में तो कबर बनाई बिजलीखान पठाना।
कासी-चौरा उड़ गया भौंरा दूनों दीन दिवाना ॥१८॥
कनक जनेऊ कंध दिखाया है रैदास रँगीला।
धरे सातसै रूप तास कूँ ऐसी अद्भुत लीला३ ॥१६॥
पीपा तो दरिया में कूदे ऐसा निःचा कहिये।
मिले बिसम्भर नाथ तासु कूँ झूठी भक्ति न गहिये४ ॥२०॥
सेना के घर साहब आये करी हजामत सेवा।
संतों की तो सरधा राखी पारब्रह्म निज देवा५ ॥२१॥
(१) कबीर साहब काशी से जाकर मगहर में रहे थे और वहीं शरीर त्याग किया।
मगहर को मगह देस बोलते हैं और लोगों का विश्वास है कि वहाँ मरने से गधे की
जोनि मिलती है क्योंकि गुरुद्रोही राजा त्रिशंकु का शरीर जो अधर में लटक रहा है उसकी
छाया उस भूमि पर पड़ने से वह अपवित्र हो गई है।
(२) कबीर साहब के अंतकाल के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध है कि हिन्दुओं ने इनके
मृतक शरीर को जलाना और मुसलमानों ने गाड़ना चाहा इस पर बहुत झगड़ा हुआ
अंत को चादर उठा कर देखा तो मृतक स्थान पर शरीर नदारद था फूल और खाट पड़ी
थी (कितने खाट की जगह पान कहते हैं) तब हिन्दुओं ने फूल लेकर मगहर में उनकी
समाधि बनाई और मुसलमानों ने जिनमें कबीर साहब का जेठा चेला बिजलीखाँ पठान
प्रधान था कबर बनाई। काशी में उसी समय एक भौंरे के कहने से कबीर साहब के
गुरुमुख शिष्य धर्म्मदासजी ने कबीर-चौरा बनाया। (३) देखो नोट पृष्ठ २७। (४) देखो
नोट पृष्ठ २८। (५) देखो नाट पृष्ठ २७।
निश्चय का अंग ७३
नरसी की तो हुंडी भाली कागज सीस चढ़ाया ।
ध्योती का तो ब्याह भया जब भात भरन कूँ आया१ ॥२२॥
तिरलोचन के भये बिरतिया ऐसी भक्ति कमाई ।
संतों के तो नाल फिरे अरु तीन लोक ठकुराई२ ॥२३॥
जीवन मूल बिसम्भर३ साहब आतमदेव बिनानी४ ।
जहँ जहँ भीर परी संतों कूँ छाना दूध अरु पानी ॥२४॥
प्रहलाद भक्त कूँ दई कसौटी चौरासी बरताया ।
नरसिंह रूप धरे नारायन खंभ फार कर आया५ ॥२५॥
(१) नरसी जी गुजरात देश के बासी थे जिन की प्रचंड भगवत भक्ति प्रसिद्ध
है । इनकी महिमा ग्रन्थों में बहुत कुछ बर्नन की है । दो चमत्कार जो इस कड़ी में
लिखे हैं एक तो यह है कि जब नरसी जी दान देते देते कंगाल हो गये थे एक समय
साधुओं ने आकर इन को घेरा कि द्वारिका की यात्रा के लिये खर्च दो । नरसी जी
ने अपनी नादारी हजार कही पर जब साधुओं ने पिंड न छोड़ा तो हुण्डी द्वारिका को
भगवान के ऊपर साँवल साह के नाम से लिख दी । वहाँ ईश्वर ने आप साँवल साह
का रूप धर कर उनकी हुण्डी का दाम चुका दिया । दूसरे यह कि जब उनकी बड़ी बेटी
के लड़का हुआ अर्थात् नरसी जी के दोहता पैदा हुआ तो छठियारे के लिये कुछ न था
भगवान ने आप उस रसम को अदा किया ।
(२) तिरलोचन देव वैश्य कुल के भक्त थे इन को साधु सेवा में सहायता के
लिये एक नौकर की बड़ी खोज थी और मन का आदमी नहीं मिलता था आखिर
को भगवान तीन लोक के ठाकुर अर्थात् स्वामी नौकर का भेष धर आप इनकी
चाकरी में रहे ।
(३) बिशवंभर ।। (४) बिज्ञानी ।
(५) प्रह्लाद भक्त का पिता हिरण्य-कश्यप बड़ा ईश्वर-द्रोही था और अपने
बेटे को राम नाम लेने से रोकता था । इसी अकस से प्रह्लाद को सारे दंड चौरासी
के दिये, अर्थात् पहाड़ से गिराया, जंजीर से बाँधकर नदी में डलवाया, हाथी से
रुँदवाना चाहा, जमीन में गड़वाया, अंग में साँप लिपटवाया, तोप पर रक्खा, सिर
पर आरा फेरा, उलटा टाँग कर तीर चलाये, चिता बना कर जलवाया, (देखो होलिका
की कथा नोट पृष्ठ ५४ ), विष पिलाया और आखिर को खंभे से बाँध कर खङ्ग से
सिर काट डालना चाहा तब ईश्वर ने नरसिंह रूप धर कर हिरण्य-कश्यप का पेट नख
से फाड़ कर उसका बध किया । इस अवसर के भयानकपन को नीचे लिखे हुए दंडक
छंद में इस तरह लिखा है :-
७४ गरीबदास जी की बानी
ध्रू का ध्यान अमान अगोचर डिगै न डोलै भाई।
सप्त पुरी पर तारी लागी कोटि कल्प जुग जाई१ ॥२६॥
नारद पुंडरीक और व्यासा गोरख जनक बिदेही।
द्वादस कोट बंध जिन तोरी भक्ता परम सनेही२ ॥२७॥
सुल्तानी बाजीद फरीदा देत तत्त गलताना।
जब राजा कूँ नाम दिया जब सबदै सब्द समाना२ ॥२८॥
कहा बखानूँ कोटिन निर्णय राजा पारँग कीन्हा।
अकल अजीत उदित अध्यातम गोरख से परबीना२ ॥२६॥
बसिष्ट विश्वामित मद माते मन माया जिन जीते।
कागभसुंड डंड नहिं जाके अवगत आनंद चीते२ ॥३०॥
लोमष ऋषि और मार्कंड को ध्यान लगा वा पद में।
अबिनासी से अरस परस है सुरत बसी अनहद में२ ॥३१॥
मोरध्वज तामरध्वज राजा अम्बरीक अनुरागी।
हरीचन्द पद हाजिर नाजिर मन से माया त्यागी२ ॥३२॥
द्रोपद सुता के चीर बढ़ाये पीतंबर पहराना।
अंत भये कछु वार न पारा दूसासन हैराना३ ॥३३॥
पंडों के जग अस्वमेध में सुपच बजाया संख।
द्रोपदी के दिल में राखी काढी मन की बंक४ ॥३४॥
निःचा ऊपर नाम का कहा ज्ञान कहा ध्यान।
निःचा खेत निपाइया काँकर बोई जान५ ॥३५॥
काम लुब्ध पाखंड रचा धरे बिसंभर रूप।
ऐसा निःचा चाहिये मारे राजा भूप ॥३६॥
गगड़ गड़गड़ान्यो खम्भ फाट्यो चरचराय निकस्यो नरनाहर को रूप अति भयानौ
है। ककट कटकटावै दाढ़ै इशन लपलपावै जीभ अधर फरफरावै मौछ व्योम व्याप्त
मानो
निश्चय का अंग ७५
सील सँतोष बिबेक बुध दया धर्म इक तार ।
बिन निःचै पावै नहीं साहब का दीदार ॥३७॥
सत बोलै साँची कहै दिल में परै न बाँक ।
मुसकी घोड़ा सेत होय अकल अकीनै झाँक ॥३८॥
निचै गोकुल गूजरी बिनही बेड़े पार ।
पाँडत के दिल दुई थी गुरवा रह गये वार१ ॥३६॥
ज्यों मीरा राठौर को राखी नहीं अधार ।
पकरचो लोहा ज्ञान को कोटों कटक सँघार ॥४०॥
मीरा हाथ सितार था पद गावै लौ लाय ।
पत्थर की थी पर्तिमा जा में गई समाय२ ॥४१॥
(१) श्रीकृष्ण का आज्ञा से गोपियाँ दुर्वासा ऋषि के लिये भोजन लेकर जमुना
पार गई थीं जब कि जमुना जी ने फट कर जाने का रास्ता दे दिया ।
(२) मीरा बाई मेरते के राजा की बेटी और.चित्तौड़ के राना की पतोहू थीं। इन
की अनुपम भक्ति संसार भर जानता है। देवी की पूजा करने से इनकार करने पर इन
को सास ने अपने घर से अलग दूसरे घर में रख दिया जहाँ वह बेरौंक टोक भगवत-भक्ति
और साध सेवा में रात दिन लगी रहती थीं। यह बात राना को न सुहाई खासकर
साधुओं की बेधड़क संगत करना । राना ने मीरा बाई को रोकने के लिये कोई जतन
उठा न रक्खा लेकिन जब कुछ बस न चला तो चरनामृत के नाम से घोर बिष का
प्याला उसको भेजा । मीरा बाई उसे सिर पर चढ़ा कर पी गई और कुछ असर न हुआ।
कहते हैं कि भगवान इनके साथ साक्षात बैठ कर चौसर खेलते थे । मीराबाई वृन्दावन
गईं और वहाँ जीव गोसाईं से मिलना चाहा । गोसाईं जी ने कहला भेजा कि हम
स्त्रियों से नहीं मिलते जिस पर मीराबाई ने जवाब दिया कि मैं तो वृन्दावन में सिवाय
श्रीकृष्ण के सब को सखी रूप जानती थी आज मालूम हुआ कि उनके और भी
पट्टीदार हैं। यह सुन कर गुसाईं जी अति लज्जित हुए और मीराबाई के दर्शन को आप
नंगे पाँव दौड़े आये । वृन्दावन से मीराबाई फिर चित्तौड़ लौटीं पर राना की बुद्धि
वैसी ही भ्रष्ट पाकर द्वारिका में जा बसीं । चित्तौड़ में मीराबाई के छोड़ते ही ऐसे उपद्रव
खड़े हुए कि राना डरा कि मीराबाई को दुख देने के कारन ईश्वर का कोप हुआ और
घबरा कर उनको बुलाने के लिये आदमी भेजे । जब वह न आईं तो कई ब्राह्मन भेजे
जो मीराबाई के द्वार पर धरना बैठे अंत को मीरा बाई रनछोड़ जी से बिदा होने को
उनके मंदिर में गईं और भक्तमाल में लिखा है कि मूर्ति के सम्मुख एक प्रेम का पद
जिसकी अन्तिम कड़ी यह है— 'मीरा के प्रभु गिरिधर नागर मिलि बिछुड़न नहिं कीजै”
गाया कि मूर्ति में समा कर लुप्त हो गईं और सिवाय इसके कि रनछोड़ जी की मूर्ति
पर पीताम्बर की जगह मीराबाई की सारी देख पड़ी और कोई चिन्ह उनका बाकी
न रहा।
७६ गरीबदास जी की बानी
भवन तेग थी काठ की जैसे चमकी बीज ।
ओटनहारा को नहीं अवगत अलख अभीज१ ॥४२॥
भवन गमन गगनै किया घोरे सुधा गुलाम ।
ज्यों मिसरी साहब मिले बरछी लोह लगाम ॥४३॥
करनहिं जाँचे आन कर मंगत किया जुहार ।
मो कूँ पारस दीजिये दालिदर बेडार२ ॥४४॥
करन तोहि कूँ दसत में सोच परी बड़ भीर ।
धरती कूँ खोदन लगा मेटी जन की पीर२ ॥४५॥
पारस ठहका आन कर लगी तीर की भाल ।
परसत ही सोना भया कीन्हा करन निहाल२ ॥४६॥
ऐसी निःचा चाहिये पारस पूरन हाथ ।
जो रंगे सोई रँगे साँईं जेही दात ॥४७॥
गगन मँडल हुन बरखिया तीन बेर तत सार ।
सीता लछमन राम की मध मूरत करतार ॥४८॥
(१) भवन भक्त, जाति के राजपूत चौहान, राना के एक भारी कामदार थे । एक बेर
राना के साथ शिकार में एक हिरनी के पीछे घोड़ा डाला और उसको तलवार से मारा ।
वह हिरनी गाभिन थी उसका बच्चा भी दो टुकड़े हो गया । भवन जी को बड़ी ग्लानि
आई और उस दिन से प्रण किया कि लोहे की तलवार के बदले काठ की तलवार
रखना । एक चुगलखोर ने राना से कह दिया, राना ने इनको तलवार दिखलाने को
कहा । जब इन्होंने म्यान से काठ की तलवार खींची तो वह फौलाद की हो कर बिजली
की नाईं चमकी कि सब की आँखें चौंधिया गईं । भक्त का ओटनहार अर्थात् रक्षा
करने वाला भगवन्त आप ही हैं ।
(२) कथा है कि राजा करन सवासी मन सोना हर रोज दान किया करते थे एक
दिन भगवान उनकी जांच करने को मँगता के भेष में आये और राजा से ताजा सोना
मांगा [गरीबदास जी ने पारस पत्थर का मांगना लिखा है] राजा का प्रण था कि कभी
किसी का सवाल खाली न जाय इससे बड़ी फिकर में पड़ कर जंगल को निकल गये
और सोच में धरती को तीर से कुरेदने लगे । भगवान को उनकी दशा देख कर करुना
आई और तीर की गाँसी के तले पारस पत्थर रख दिया जिसके छूते ही गाँसी सोने की
हो गई और राजा ने निहाल होकर पारस पत्थर को धरती में से निकाल लिया और
ताजा सोना बन गया ।
साध महिमा का अंग ७७
सो मूरत क्यूँ ना पूजहीं पत्थर ढेला डार ।
सीता लछमन राम के लीजे चरन जुहार ॥४६॥
ग्यारह रुद्रों पर तपै द्वादस मद्ध मिलाप ।
सूछम मूरत सूँरते ब्रह्म सब्द गरगाप ॥५०॥
कोट धुजा१ किस काम का सूम सकल है चाल ।
असी गंज२ बाँटे नहीं परा तासु पर ज्वाल३ ॥५१॥
दिल दानी है तासुका सदाबरत मन माहिं ।
पृथ्वी पारस हो रही हुन बरषी जिस ठाहिं ॥५२॥
सुअर गऊ कूँ खात है बिसमिल४ करै हमेस ।
दोऊ दीन दोजख गये जम तेहि पकरे केस ॥५३॥
करदी करद५ चलावहीं जीव जोनि पर जाय ।
नैन बैन सूँ मिलि रहा छाती परदे पाय ॥५४॥
यह तो काफिर करम है धरम नहीं यह पाप ।
द्रोही नबी रसूल के डूबेंगे गरगाप ॥५५॥
जिव हिंसा जो करत हैं या आगे क्या पाप ।
कंटक जूनि जहान में भेंटा सिंह अरु साँप ॥५६॥
आतम प्रान उधार ही ऐसा धरम न और ।
कोटि जग्ग असुमेध फल सब्द समाना भौर ॥५७॥
॥ साध महिमा का अंग ॥
धन जननी धन भूमि धन धन नगरी धन देस ।
धन करनी धन सुकुल धन जहाँ साध परबेस ॥ १ ॥
जा ऊदर साधू बसै सो ऊदर है पाख६ ।
(१) पहिले कायदा था कि पूरे करोड़ रुपये पर एक फरहरा खड़ा कर दिया करते
थे जो निशान करोड़पती होने का समझा जाता था। (२) खज़ाना । (३) ज़वाल ।
(४) ज़िबह । (५) छुरी । (६) पाक ।
११
७८ गरीबदास जी की बानी
सनकादिक से उपज ही सुकदे बोले साख१॥ २ ॥
गंदा अंडा गरद मिल परा बिरिछ के खोढ़।
संकर तत्त सुनाइया पारबती गई पौढ़१॥ ३ ॥
धन संकर धन गीरजा धन सुकदे धन ब्यास।
धन जननी सुकदेव की द्वादश बरस बिलास१॥ ४ ॥
जहाँ साध जन औतरे तहाँ भक्ति का भेव।
गोरख उपजे ज्ञान जब भभूत दई महदेव२ ॥ ५ ॥
सूया अनसूया मिले तीनों देवा ध्यान।
सब्द स्वरूपी औतरे दत्तात्रे परमान३॥ ६ ॥
संत सुरसरी चलत हैं मारू देस बहंत।
बागड़ मंझ बिलास होय नदी सुरसरी संत ॥ ७ ॥
साध नदी दो अगम नग इन सम तुल नहिं और।
साध भक्ति के खंभ हैं नदिया बिरछा मौर ॥ ८ ॥
(१) कथा है कि एक समय में महादेव जी पारबती जी को एकान्त में तत्व-ज्ञान
का उपदेश दे रहे थे पास ही एक पेड़ था जिसके खोढ़र या खोखली पेड़ी में एक गंदा
अंडा सुग्गे का पड़ा हुआ था, वह उस चरचा के प्रताप से सजीव होकर फूटा और
बच्चा बन कर बड़ा हो गया। कथा के बीच में पारबती जी को औंघाई आ गई तब वह
सुग्गा जो कथा को सुन रहा था पारबती जी की जगह हुंकारी भरने लगा जिस में
महादेव जी कथा को बंद न कर दें। जब कथा समाप्त हुई तो महादेव जी ने पारबती
जी को सोता देख कर पूछा कि तुम तो सो गई थीं हुंकारी कौन भरता था। पारबती जी
ने कहा मैं नहीं जानती। इस पर महादेव जी ने क्रोध में भर कर अपना त्रिशूल
छोड़ा। सुग्गा भागा और त्रिशूल ने उसका पीछा किया। रास्ते में व्यास जी की स्त्री
सूर्य्य की पूजा कर रही थीं और उनका मुँह खुला हुआ था सुग्गा उनके मुँह में होकर
पेट में समा गया और बारह बरस तक उनके पेट में रहा क्योंकि त्रिशूल को उस स्त्री
के वध करने का अधिकार न था। जब व्यास आदिक ने जाकर महादेव जी से बिनती
की तब शिव जी ने त्रिशूल को फेर लिया और सुग्गा शुकदेव जी के रूप में व्यास जी
की स्त्री के उदर से निकल कर जंगल को चला। ब्यासजी उनके फेर लाने को पीछे दौड़े
तो शुकदेव जी ने उनको ज्ञान सुनाया।
(२) गोरखनाथ जी जोगी महादेव के उपासक थे। (३) अत्रय ऋषि की स्त्री
अनसूया के अंतर में ध्यान करते समय त्रिदेव ने अपना अंश डाल दिया जिससे
दत्तात्रेयजी उत्पन्न हुए। इन्होंने चौबीस गुरू धारन किये।
साध महिमा का अंग ७६
साँईं सरिखे संत हैं यामें मीन न मेख ।
परदा अंग अनादि है बाहर भीतर एक ॥६॥
साँईं सरिखे देखले बरतावै जे कोय ।
सप्त कोस जल चढ़ गया जहाँ साध मुख धोय१ ॥१०॥
सकल मेदिनी२ भर गई सब्द न पूटा३ फेर ।
सप्त कोस क्या बात है डूबे मेरु सुमेर ॥११॥
ऐसे साधू संत जन पार ब्रह्म की जात ।
सदा रते हरि नाम सँू अंतर नाहीं घात ॥१२॥
साध अगाध अपार जन परमानँद सँू प्रीत ।
कहवत के तौ संत हैं अवगत अलख अतीत ॥१३॥
साध सगे हैं जगत में संत सगाई साँच ।
साधू ढूँढ़न नीकलूँ बहु बिधि काछूँ काछ ॥१४॥
साध समुंदर गगन गत सुन्न समाने सोय ।
परमानँद के परमहंस एक कहूँ की दोय ॥१५॥
साध समुन्दर लाल नग संत हीरों की खान ।
सतगुरु बेदी बाँचहीं सुनतेही परवान ॥१६॥
महिमा कीजै संत की तन मन धन सब देहि ।
सिर माँगे टालो नहीं मोरध्वज लखि लेहि४ ॥१७॥
(१) गिरनार पहाड़ जहाँ अच्छे साधू रहते हैं वहाँ से सात कोस नीचे हनुमान
धारा गिरती है। (२) पृथ्वी। (३) पीठ।
(४) राजा मोरध्वज की प्रचण्ड भक्ति की बहुत सी कथा हैं। जिस बात का यहाँ
ज़िकर है वह यह है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को राजा मोरध्वज की असदृश भक्ति की लीला
दिखलाने को आप एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धर कर और अर्जुन को अपना पुत्र बना
कर राजा के घर आये और कहा कि रास्ते में लड़के को बाघ ने पकड़ा था और हमारे
बहुत बिनती करने पर इस शर्त पर छोड़ा कि राजा मोरध्वज का दाहिना अंग हमारे
खाने को लाओ। राजा ने जवाब दिया कि बड़े भाग मेरे कि यह निकाम देह साध सेवा
में काम आवै और बूढ़े ब्राह्मण के कहने मुताबिक अपनी रानी और कुँवर को आज्ञा दी
कि आरे से चीर कर सिर से पाँव तक दो टुकड़े कर दो। आरा उठा कर राजा के सिर
पर रक्खा गया और एक ओर से रानी और दूसरी ओर से राजकँवर चलाने लगे कि
८० गरीबदास जी की बानी
संत सलहली सेज के जिन में कैसी भिन्न ।
साहब साँईं ऊतरे नाम धराया जन्न१ ॥१८॥
संत सलहली सेज के जिन के कैसी भिन्न ।
साहब परगट संत हैं जिन का एकै मन्न ॥१९॥
मोड़ अमोड़ं मगन है हद बेहद में सैल ।
साहब साधू पाक है उपजी बाजी मैल ॥२०॥
माल मुलक सब घूर है बिन साँईं के नाह२ ।
दुनिया अलग बिजोग है साधू साहब माँह ॥२१॥
माल मुलक सब घूर है पाक परम गुरु संत ।
जिन सूँ साहब निकट है तिन में कैसा अंत ॥२२॥
जिन में नाहीं अंतरा अरस परस परवान ।
साहब साधू एक हैं दुनिया दूजी जान ॥२३॥
संत सामना संत में दुनिया है सो न्यार ।
जिन में दूजी भिन्न क्या राते सिरजनहार ॥२४॥
साध समुन्दर कमल गति माहें साँई गंध ।
जिन में दूजी भिन्न क्या सो साधू निरबंध ॥२५॥
कमल न डूबै जल चढ़ै माहें मधुकर३ बास ।
जैसे चन्द कमोदिनी यूँ साँई निज दास ॥२६॥
नौ नेजे जो जल चढ़ै कमल न भींजै गात ।
माहें ज्ञान सुगन्ध सर४ आदि अंत का साथ ॥२७॥
नौ नेजे जो जल चढ़ै बूँद न लागै पान ।
ऐसे साधू अगम गत संसारी परवान ॥२८॥
इसमें राजा को बाँई आँख से एक आँसू टपक पड़ा । इस पर बूढ़े ब्राह्मण बोले कि
यह दान अब अशुद्ध हो गया क्योंकि तुम रोये जो चिन्ह दुःख और खेद का है । राजा
ने उत्तर दिया कि ऐसा कदापि नहीं है वरन बाँईं आँख अपनी अभाग्यता पर शोक
करती है कि हमारी ओर का अंग साध सेवा में न लगा । इस पर श्रीकृष्ण ने प्रसन्न
होकर निज रूप से दर्शन दिया ।
(१) भक्त । (२) नेह । (३) भँवरा । (४) तालाब ।
साध महिमा का अंग ८१
कमल पत्र की बासना जाको कवन सरूप ।
महकै गंध अपार गति सँूघत बड़े बड़े भूप ॥२६॥
भूप संत साधु कहे जुगन जुगन के राव ।
सप्त पुरी नहिं बासना जिनके भक्ति पसाव१ ॥३०॥
मन मधुकैर काया केवड़ा महकत गंध अजोख ।
हूँट हाथ गढ़ अगम है रच राखे सब लोक ॥३१॥
स्वर्ग सलेमा२ बास है तिरबेनी के घाट ।
आगे अगम अगाध गति अवर नहाहीं आट३ ॥३२॥
संत सरोवर हंस हैं भच्छन करें बिचार ।
पुहुप बासना ज्यूँ रहैं राई रिंच न भार४ ॥३३॥
साध कमल मध बासना ऐसा हलका अंग ।
मैल मनोरथ ना रहै निरमल धारा गंग ॥३४॥
साध सँगत हरि भक्ति बिन कोई न पावै पार ।
निरमल आदि अनादि है गंदा सब संसार ॥३५॥
साध साध सब कोउ कहै साध सुमत सें जान ।
कुमत कमावे जीव है जैसे जल पाखान ॥३६॥
ज्यूँ जल में पाखान है भींजत नाहीं अंग ।
चकमक लागे अगिन है कहा करे सतसंग ॥३७॥
जहँ महिमा है साध की चरन कमल से हेत ।
जुगन जुगन उर में रखूँ ध्रू प्रहलाद सकेत ॥३८॥
साध संत के अैन५ में बसैं हुजूर अमान ।
जा घर निन्दा साध की सो घर डूबे जान ॥३६॥
लख छल छिद्दर मैं करूँ अपने संतों काज ।
हिरनाकुस ज्यूँ मारहूँ नरसिंघ धरहूँ साज६ ॥४०॥
(१) क़दर । (२) सुखाला । (३) पाँच तत्व और तीन गुन । (४) जैसे फूल में सुगंध जिसका रत्ती भर बोझ नहीं होता । (५) घर, आँख । (६) देखो नोट पृष्ठ ७३ ।
८२ गरीबदास जी की बानी
स्वर्ग पतालों सकल में है अनुरागी राम ।
नरसिंघ होकर अवतरे प्रहलाद भक्त के काम१ ॥४१॥
जहँ जन की महिमा सुनूँ तहँ मैं गमन करंत ।
वो तौ नगर अमान है जहँ मेरे प्यारे संत ॥४२॥
साध साध सब कोउ कहै साध समुन्दर तीर ।
अवगत की गत को लखै मिल गये नीर कबीर२ ॥४३॥
नीर कबीर निरंजनं अंजन धरे सदेस३ ।
अंजन मंजन माँजिये जब होवे परवेस ॥४४॥
साध कहावन कठिन है मग पर धरे न पाँव ।
सहँगी४ संगत है नहीं चढ़ो नाम की नाव ॥४५॥
साध कहाया जगत में परचे पड़े न प्रान ।
जग सोभा जब होयगी मिलै अलख निरबान ॥४६॥
सब्द मिलावा अंग रस परसन है दीदार ।
रोम रोम तारी लगै झिलमिल किरन अपार ॥४७॥
बरषे किरन अवरन गत रिमझिम रिमझिम रंग ।
जो देखै सोई कहै अरस परस परसंग ॥४८॥
संत सकल के मुकट हैं साँईं साध समान ।
बड़ भागी वे हंस हैं जिन संतों नाल पिछान ॥४६॥
॥ राग-धुनि ॥
आज मेरे आये सन्त सुजान ।
तन मन धन वारूँगी प्रान ॥ टेक ॥
चरन कमल रज डारूँ सीस ।
मानो आप मिले जगदीस ॥ १ ॥
(१) देखो नोट पृष्ठ ७३ । (२) कबीर साहब नौजनमतुआ बालक की दशा में
काशी के लहरतारा तालाब में बहते मिले थे [ देखो जीवन-चरित्र कबीर शब्दावली भाग
१ में ] । (३) निकट । (४) सस्ती, सहज ।
साध महिमा का अंग ८३
संत की महिमा कही न जाय ।
अठसठ तीरथ चरनों माँय ॥ २ ॥
संत की महिमा अपरम्पार ।
पूरन ब्रह्म मिले करतार ॥ ३ ॥
संत की महिमा अगम अगाध ।
नारद से उधरे प्रहलाद¹ ॥ ४ ॥
ध्रु भेंटे नारद निर्बान ।
अमरापुर पर रचे बिमान¹ ॥ ५ ॥
संत की महिमा अगम अगाह ।
बूड़न तें राखे गज ग्राह² ॥ ६ ॥
संत की महिमा निश्चल थीर ।
द्रोपद सुता की बढ़ गई चीर³ ॥ ७ ॥
संत की महिमा अधिक सुमेर ।
भिलनी के जूठे खाये बेर४ ॥ ८ ॥
संत की महिमा निश्चल अंक ।
बालमीक का बाजा संख५ ॥ ६ ॥
संत की महिमा अमन अमान ।
देखो गनिका चढ़ी बिमान६ ॥१०॥
संत की महिमा पद गरगाप ।
तिरलोचन के बिर्तिया आप७ ॥११॥
पंडरपुर नामा निर्बान ।
देवल फेर छवा दई छान८ ॥१२॥
(१) प्रह्लाद भक्त की कथा नोट पृष्ठ ७३ में और ध्रू भक्त की नोट पृष्ठ २७ में
दी है । प्रह्लाद को गर्भ में और ध्रू को बन में नारद मुनि ने उपदेश दिया था ।
(२) देखो नोट पृष्ठ २० । (३) देखो नोट पृष्ठ २० । (४) सेवरी भिल्लिनी के दाँत से कुतर
कर चीखे हुए बेर श्री रामचन्द्र ने बड़ी रुचि से भोग लगाये । (५) देखो नोट पृष्ठ
५५-५६ । (६) देखो नोट पृष्ठ २० । (७) देखो नोट पृष्ठ ७३ । (८) पंडरपुर के ठाकुरद्वारे
का दरवाजा फिर जाने और नया छप्पर बन जाने का हाल नामदेव भक्त की कथा नोट
पृष्ठ ७१ में देखो ।
८४ गरीबदास जी की बानी
कासीपुरी कबीर कमाल।
गैबी बालद लाइ रसाल१ ॥१३॥
दिया भंडारा जन रैदास।
कनक जनेऊ पद परकास२ ॥१४॥
संत की महिमा कही न जाय।
पीपा कूद परे दरियाय३ ॥१५॥
दास गरीब संत कूँ सेव।
चौरासी मिट गइ सुकदेव४ ॥१६॥
॥ पारख का अंग ॥
अनंत कोटि अवतार हैं नहिं चितवै बुध नास।
खालिक खेलै खलक में छः ऋतु बारस मास ॥ १ ॥
पीछे पीछे हरि फिरैं आगे संत सुजान।
संत करैं सोइ साँच है चारो जुग परमान ॥ २ ॥
साँई सरिखे साध हैं इन सम तुल नहिं और।
संत करैं सोइ होत है साहब अपनी ठौर ॥ ३ ॥
संतों कारन सब रचा सकल जमीं असमान।
चंद सूर पानी पवन जग तीरथ औ दान ॥ ४ ॥
ज्यूँ बच्छा गउ की नजर में यूँ साँईं औ संत।
हरि जन के पीछे फिरैं भक्त बछल भगवंत ॥ ५ ॥
धारा मेरे संत की मुझ से मिटै न अंस।
बुरी भली भाषै नहीं सोई हमारा बंस ॥ ६ ॥
संखौं जिव परलै करै संखौं उत्पति ख्याल।
ऐसे समरथ संत हैं एक खिसै५ नहिं बाल ॥ ७ ॥
(१) भगवंत ने कबीर की लाज रखने को बैलों अन्न उनके द्वारे पर पहुँचा दिया
[देखो नोट पृष्ठ २६] कमाल कबीर साहब के पुत्र और चेले थे। (२) देखो रैदास
जी की कथा, नोट पृष्ठ २८-२६। (३) देखो नोट पृष्ठ २७। (४) तोते की चौरासी छूट कर
शुकदेव जी का चोला पाने की कथा देखो नोट पृष्ठ ७८। (५) उखड़ै।
पारख का अङ्ग ८५
गरजैं इन्द्र अनंत दल बहु बिध बरषा होय ।
संखों जिव परलै करें संखों उत्पति होय ॥ ८ ॥
इच्छा कर मारैं नहीं बिन इच्छा मर जाहिं ।
निःकामी निज संत हैं तहँ नहिं पाप लगाहिं ॥ ९ ॥
बरषैं तड़कैं डोब दें तारैं तीनों लोक ।
ऐसे हरिजन संत हैं सौदा रोकम रोक१ ॥१०॥
बहतर छोहन छै करी कुरुक्छत्तर देख२ ।
कपिल सँघारे सगर के पाप लगा नहिं एक३ ॥११॥
द्वादस कोट निनानबे गोरख जनक बिदेह ।
यूँ तारे यूँ डोब दे यामें नहीं संदेह ॥१२॥
सील माहिं सब लोक हैं ज्ञान ध्यान बैराग ।
जोग जग्य तप होम नेम गंगा गया पराग ॥१३॥
संतोष स्वर्ग पाताल सब और कहा मृत लोक ।
फिर पीछे कूँ क्या रहा जब आया संतोष ॥१४॥
बिबेक बिहंगम अचल है आया हिरदे माहिं ।
भक्ति मुक्ति औ ज्ञान गति फिर पीछे कुछ नाहिं ॥१५॥
दया सर्ब का मूल है छिमा छका जो होय ।
तिरलोकी कूँ तार दे नाम निरंजन गोय ॥१६॥
दस हजार रापत४ बली कामदेव महभंत ।
जा सिर अंकुस सील का तोरत गज के दंत ॥१७॥
क्रोध बली चंडाल है बल रापत द्वादस सहंस ।
एक पलक में डोब दे अनंत कोट जिव हंस ॥१८॥
(१) नकद, खरा । (२) कथा है कि कुरुक्षेत्र में महाभारत के संग्राम में बहत्तर
छोहनी दल जमा हुआ था जिन में से एक न बचा—एक छोहनी में दस हजार हाथी, तीस
हजार रथ, एक लाख मल्ल या पहलवान, दस लाख घोड़े, और छत्तीस करोड़ सिपाही
होना बतलाते हैं । (३) कपिलमुनि ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को जो उनसे
दुर्वचन बोले थे भस्म कर दिया । (४) हाथी ।
१२
८६ गरीबदास जी की बानी
जा सिर अंकुस छिमा का मारे तुस तुस१ बीन ।
तिरलोकी से काट दे जे होय साधु प्रवीन ॥१६॥
लोभ सदा लहरा रहै तिरलोकी में इच्छ ।
बल रापत२ बीस सहस है पलक पलक के बिच्च ॥२०॥
ता अंकुस संतोष है तिरलोकी से काढ़ ।
काटै कोटक कटक दल संतोष तेग बड़ बाढ़ ॥२१॥
मोह मवासी मस्त है बल रापत२ तीस सहंस ।
तिरलोकी परिवार है जहँ उपजे तहँ बंस ॥२२॥
जा सिर अंकुस बिबेक है पूरन करै मुराद ।
तिरलोकी की बासना ले बिबेक सब साध ॥२३॥
॥ ब्रह्म बेदी ॥
ज्ञान सागर अति उजागर निरबिकार निरंजनं ।
ब्रह्म ज्ञानी महा ध्यानी सत सुकृत दुख भंजनं ॥ १ ॥
मूल चक्र गनेस बासा रक्त बरन जहँ जानिये ।
क्लिँग जाप कुलीन तज सब सब्द हमरा मानिये ॥ २ ॥
स्वाद चक्र ब्रह्मादि बासा जहँ साबित्री ब्रह्मा रहै ।
ओँ जाप जपत हंसा ज्ञान जोग सतगुरु कहै ॥ ३ ॥
नाभि कमल में बिस्नु बिसंभर जहँ लछमी सँग बास है ।
हँग जाप जपन्त हंसा जानत बिरला दास है ॥ ४ ॥
हृदय कमल महादेव देवं सती पारबती संग है ।
सोहं जाप जपत हंसा ज्ञान जोग भल रंग है ॥ ५ ॥
कंठ कमल में बसै अबिद्या ज्ञान ध्यान बुधि नासही ।
लील चक्र मध काल कर्म आवत दम कूँ फाँसही ॥ ६ ॥
त्रिकुटी कमल परमहंस पूरन सतगुरु समरथ आप है ।
मन पौना सम सिंध मेलो सुरत निरत का जाप है ॥ ७ ॥
(१) भूसी । (२) छिलका । (३) हाथी ।