गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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जा सिर अंकुस छिमा का मारे तुस तुस१ बीन ।
तिरलोकी से काट दे जे होय साधु प्रवीन ॥१६॥
लोभ सदा लहरा रहै तिरलोकी में इच्छ ।
बल रापत२ बीस सहस है पलक पलक के बिच्च ॥२०॥
ता अंकुस संतोष है तिरलोकी से काढ़ ।
काटै कोटक कटक दल संतोष तेग बड़ बाढ़ ॥२१॥
मोह मवासी मस्त है बल रापत२ तीस सहंस ।
तिरलोकी परिवार है जहँ उपजे तहँ बंस ॥२२॥
जा सिर अंकुस बिबेक है पूरन करै मुराद ।
तिरलोकी की बासना ले बिबेक सब साध ॥२३॥
॥ ब्रह्म बेदी ॥
ज्ञान सागर अति उजागर निरबिकार निरंजनं ।
ब्रह्म ज्ञानी महा ध्यानी सत सुकृत दुख भंजनं ॥ १ ॥
मूल चक्र गनेस बासा रक्त बरन जहँ जानिये ।
क्लिँग जाप कुलीन तज सब सब्द हमरा मानिये ॥ २ ॥
स्वाद चक्र ब्रह्मादि बासा जहँ साबित्री ब्रह्मा रहै ।
ओँ जाप जपत हंसा ज्ञान जोग सतगुरु कहै ॥ ३ ॥
नाभि कमल में बिस्नु बिसंभर जहँ लछमी सँग बास है ।
हँग जाप जपन्त हंसा जानत बिरला दास है ॥ ४ ॥
हृदय कमल महादेव देवं सती पारबती संग है ।
सोहं जाप जपत हंसा ज्ञान जोग भल रंग है ॥ ५ ॥
कंठ कमल में बसै अबिद्या ज्ञान ध्यान बुधि नासही ।
लील चक्र मध काल कर्म आवत दम कूँ फाँसही ॥ ६ ॥
त्रिकुटी कमल परमहंस पूरन सतगुरु समरथ आप है ।
मन पौना सम सिंध मेलो सुरत निरत का जाप है ॥ ७ ॥
(१) भूसी । (२) छिलका । (३) हाथी ।