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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

जरना का अंग ६६
जरना जरै सो जालिम जोगी जरना जालिम जिंद।
जरना जरै सो आपै आपं काल करम नहि फंद ॥६६॥
परदा कभी न पाड़िये१ जे सिर जलै अँगौठ।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार की पीठ ॥७०॥
परदा कभी न पाड़िये जे सिर बलै अँगार।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार सिर भार ॥७१॥
परदा कभी न पाड़िये अपने ही सिर लेह।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार मुख खेह ॥७२॥
परदा कभी न पाड़िये जे सिर आई होय।
चाबुक तोड़ौ चौपटे सार झरंता लोह ॥७३॥
परदा कभी न पाड़िये जे जाता है सीस।
चाबुक तोड़ौ चौपटे हुकम सरे जगदीस ॥७४॥
परदा कभी न पाड़िये जो जाती है जान।
चाबुक तोड़ौ चौपटे नीर छीर कूँ छान ॥७५॥
एती जरना जब जरै सतगुरु से है भेंट।
बका बकाई करत हैं जिन्ह हद्दी गुरु फेंट२ ॥७६॥
जिन के अंतर लगन है जोर कहेंगे राम।
बका बकाई करत हैं आन भखैं बेकाम ॥७७॥
पृथ्बी का गुन लीजिये औगुन उर नाहिं धार।
जिनके दिल में एक है दूजे को दें डार ॥७८॥
सब्द अनाहद जो रते दूजा नहीं उपाव।
सुन्न मँडल में रम रहा ना जहँ करम लगाव ॥७६॥
अनहद मंदल३ बाजहीं बारह मास अचंभ।
कबीर दास गरीब कूँ भक्ति दई आरंभ ॥८०॥
(१) उघारिये। (२) जो संसारी गुरू की लपेट में रहेंगे वह बाद बिबाद में जन्म
गँवावेंगे। (३) तबला, मृदंग।
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