गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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भवन तेग थी काठ की जैसे चमकी बीज ।
ओटनहारा को नहीं अवगत अलख अभीज१ ॥४२॥
भवन गमन गगनै किया घोरे सुधा गुलाम ।
ज्यों मिसरी साहब मिले बरछी लोह लगाम ॥४३॥
करनहिं जाँचे आन कर मंगत किया जुहार ।
मो कूँ पारस दीजिये दालिदर बेडार२ ॥४४॥
करन तोहि कूँ दसत में सोच परी बड़ भीर ।
धरती कूँ खोदन लगा मेटी जन की पीर२ ॥४५॥
पारस ठहका आन कर लगी तीर की भाल ।
परसत ही सोना भया कीन्हा करन निहाल२ ॥४६॥
ऐसी निःचा चाहिये पारस पूरन हाथ ।
जो रंगे सोई रँगे साँईं जेही दात ॥४७॥
गगन मँडल हुन बरखिया तीन बेर तत सार ।
सीता लछमन राम की मध मूरत करतार ॥४८॥
(१) भवन भक्त, जाति के राजपूत चौहान, राना के एक भारी कामदार थे । एक बेर
राना के साथ शिकार में एक हिरनी के पीछे घोड़ा डाला और उसको तलवार से मारा ।
वह हिरनी गाभिन थी उसका बच्चा भी दो टुकड़े हो गया । भवन जी को बड़ी ग्लानि
आई और उस दिन से प्रण किया कि लोहे की तलवार के बदले काठ की तलवार
रखना । एक चुगलखोर ने राना से कह दिया, राना ने इनको तलवार दिखलाने को
कहा । जब इन्होंने म्यान से काठ की तलवार खींची तो वह फौलाद की हो कर बिजली
की नाईं चमकी कि सब की आँखें चौंधिया गईं । भक्त का ओटनहार अर्थात् रक्षा
करने वाला भगवन्त आप ही हैं ।
(२) कथा है कि राजा करन सवासी मन सोना हर रोज दान किया करते थे एक
दिन भगवान उनकी जांच करने को मँगता के भेष में आये और राजा से ताजा सोना
मांगा [गरीबदास जी ने पारस पत्थर का मांगना लिखा है] राजा का प्रण था कि कभी
किसी का सवाल खाली न जाय इससे बड़ी फिकर में पड़ कर जंगल को निकल गये
और सोच में धरती को तीर से कुरेदने लगे । भगवान को उनकी दशा देख कर करुना
आई और तीर की गाँसी के तले पारस पत्थर रख दिया जिसके छूते ही गाँसी सोने की
हो गई और राजा ने निहाल होकर पारस पत्थर को धरती में से निकाल लिया और
ताजा सोना बन गया ।