गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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ध्रू का ध्यान अमान अगोचर डिगै न डोलै भाई।
सप्त पुरी पर तारी लागी कोटि कल्प जुग जाई१ ॥२६॥
नारद पुंडरीक और व्यासा गोरख जनक बिदेही।
द्वादस कोट बंध जिन तोरी भक्ता परम सनेही२ ॥२७॥
सुल्तानी बाजीद फरीदा देत तत्त गलताना।
जब राजा कूँ नाम दिया जब सबदै सब्द समाना२ ॥२८॥
कहा बखानूँ कोटिन निर्णय राजा पारँग कीन्हा।
अकल अजीत उदित अध्यातम गोरख से परबीना२ ॥२६॥
बसिष्ट विश्वामित मद माते मन माया जिन जीते।
कागभसुंड डंड नहिं जाके अवगत आनंद चीते२ ॥३०॥
लोमष ऋषि और मार्कंड को ध्यान लगा वा पद में।
अबिनासी से अरस परस है सुरत बसी अनहद में२ ॥३१॥
मोरध्वज तामरध्वज राजा अम्बरीक अनुरागी।
हरीचन्द पद हाजिर नाजिर मन से माया त्यागी२ ॥३२॥
द्रोपद सुता के चीर बढ़ाये पीतंबर पहराना।
अंत भये कछु वार न पारा दूसासन हैराना३ ॥३३॥
पंडों के जग अस्वमेध में सुपच बजाया संख।
द्रोपदी के दिल में राखी काढी मन की बंक४ ॥३४॥
निःचा ऊपर नाम का कहा ज्ञान कहा ध्यान।
निःचा खेत निपाइया काँकर बोई जान५ ॥३५॥
काम लुब्ध पाखंड रचा धरे बिसंभर रूप।
ऐसा निःचा चाहिये मारे राजा भूप ॥३६॥
गगड़ गड़गड़ान्यो खम्भ फाट्यो चरचराय निकस्यो नरनाहर को रूप अति भयानौ
है। ककट कटकटावै दाढ़ै इशन लपलपावै जीभ अधर फरफरावै मौछ व्योम व्याप्त
मानो