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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

साध महिमा का अंग ७६
साँईं सरिखे संत हैं यामें मीन न मेख ।
परदा अंग अनादि है बाहर भीतर एक ॥६॥
साँईं सरिखे देखले बरतावै जे कोय ।
सप्त कोस जल चढ़ गया जहाँ साध मुख धोय१ ॥१०॥
सकल मेदिनी२ भर गई सब्द न पूटा३ फेर ।
सप्त कोस क्या बात है डूबे मेरु सुमेर ॥११॥
ऐसे साधू संत जन पार ब्रह्म की जात ।
सदा रते हरि नाम सँू अंतर नाहीं घात ॥१२॥
साध अगाध अपार जन परमानँद सँू प्रीत ।
कहवत के तौ संत हैं अवगत अलख अतीत ॥१३॥
साध सगे हैं जगत में संत सगाई साँच ।
साधू ढूँढ़न नीकलूँ बहु बिधि काछूँ काछ ॥१४॥
साध समुंदर गगन गत सुन्न समाने सोय ।
परमानँद के परमहंस एक कहूँ की दोय ॥१५॥
साध समुन्दर लाल नग संत हीरों की खान ।
सतगुरु बेदी बाँचहीं सुनतेही परवान ॥१६॥
महिमा कीजै संत की तन मन धन सब देहि ।
सिर माँगे टालो नहीं मोरध्वज लखि लेहि४ ॥१७॥
(१) गिरनार पहाड़ जहाँ अच्छे साधू रहते हैं वहाँ से सात कोस नीचे हनुमान
धारा गिरती है। (२) पृथ्वी। (३) पीठ।
(४) राजा मोरध्वज की प्रचण्ड भक्ति की बहुत सी कथा हैं। जिस बात का यहाँ
ज़िकर है वह यह है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को राजा मोरध्वज की असदृश भक्ति की लीला
दिखलाने को आप एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धर कर और अर्जुन को अपना पुत्र बना
कर राजा के घर आये और कहा कि रास्ते में लड़के को बाघ ने पकड़ा था और हमारे
बहुत बिनती करने पर इस शर्त पर छोड़ा कि राजा मोरध्वज का दाहिना अंग हमारे
खाने को लाओ। राजा ने जवाब दिया कि बड़े भाग मेरे कि यह निकाम देह साध सेवा
में काम आवै और बूढ़े ब्राह्मण के कहने मुताबिक अपनी रानी और कुँवर को आज्ञा दी
कि आरे से चीर कर सिर से पाँव तक दो टुकड़े कर दो। आरा उठा कर राजा के सिर
पर रक्खा गया और एक ओर से रानी और दूसरी ओर से राजकँवर चलाने लगे कि