गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ गरीबदास जी की बानी
सनकादिक से उपज ही सुकदे बोले साख१॥ २ ॥
गंदा अंडा गरद मिल परा बिरिछ के खोढ़।
संकर तत्त सुनाइया पारबती गई पौढ़१॥ ३ ॥
धन संकर धन गीरजा धन सुकदे धन ब्यास।
धन जननी सुकदेव की द्वादश बरस बिलास१॥ ४ ॥
जहाँ साध जन औतरे तहाँ भक्ति का भेव।
गोरख उपजे ज्ञान जब भभूत दई महदेव२ ॥ ५ ॥
सूया अनसूया मिले तीनों देवा ध्यान।
सब्द स्वरूपी औतरे दत्तात्रे परमान३॥ ६ ॥
संत सुरसरी चलत हैं मारू देस बहंत।
बागड़ मंझ बिलास होय नदी सुरसरी संत ॥ ७ ॥
साध नदी दो अगम नग इन सम तुल नहिं और।
साध भक्ति के खंभ हैं नदिया बिरछा मौर ॥ ८ ॥
(१) कथा है कि एक समय में महादेव जी पारबती जी को एकान्त में तत्व-ज्ञान
का उपदेश दे रहे थे पास ही एक पेड़ था जिसके खोढ़र या खोखली पेड़ी में एक गंदा
अंडा सुग्गे का पड़ा हुआ था, वह उस चरचा के प्रताप से सजीव होकर फूटा और
बच्चा बन कर बड़ा हो गया। कथा के बीच में पारबती जी को औंघाई आ गई तब वह
सुग्गा जो कथा को सुन रहा था पारबती जी की जगह हुंकारी भरने लगा जिस में
महादेव जी कथा को बंद न कर दें। जब कथा समाप्त हुई तो महादेव जी ने पारबती
जी को सोता देख कर पूछा कि तुम तो सो गई थीं हुंकारी कौन भरता था। पारबती जी
ने कहा मैं नहीं जानती। इस पर महादेव जी ने क्रोध में भर कर अपना त्रिशूल
छोड़ा। सुग्गा भागा और त्रिशूल ने उसका पीछा किया। रास्ते में व्यास जी की स्त्री
सूर्य्य की पूजा कर रही थीं और उनका मुँह खुला हुआ था सुग्गा उनके मुँह में होकर
पेट में समा गया और बारह बरस तक उनके पेट में रहा क्योंकि त्रिशूल को उस स्त्री
के वध करने का अधिकार न था। जब व्यास आदिक ने जाकर महादेव जी से बिनती
की तब शिव जी ने त्रिशूल को फेर लिया और सुग्गा शुकदेव जी के रूप में व्यास जी
की स्त्री के उदर से निकल कर जंगल को चला। ब्यासजी उनके फेर लाने को पीछे दौड़े
तो शुकदेव जी ने उनको ज्ञान सुनाया।
(२) गोरखनाथ जी जोगी महादेव के उपासक थे। (३) अत्रय ऋषि की स्त्री
अनसूया के अंतर में ध्यान करते समय त्रिदेव ने अपना अंश डाल दिया जिससे
दत्तात्रेयजी उत्पन्न हुए। इन्होंने चौबीस गुरू धारन किये।