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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 186 में से

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पृष्ठ 81

निश्चय का अंग ७३
नरसी की तो हुंडी भाली कागज सीस चढ़ाया ।
ध्योती का तो ब्याह भया जब भात भरन कूँ आया१ ॥२२॥
तिरलोचन के भये बिरतिया ऐसी भक्ति कमाई ।
संतों के तो नाल फिरे अरु तीन लोक ठकुराई२ ॥२३॥
जीवन मूल बिसम्भर३ साहब आतमदेव बिनानी४ ।
जहँ जहँ भीर परी संतों कूँ छाना दूध अरु पानी ॥२४॥
प्रहलाद भक्त कूँ दई कसौटी चौरासी बरताया ।
नरसिंह रूप धरे नारायन खंभ फार कर आया५ ॥२५॥
(१) नरसी जी गुजरात देश के बासी थे जिन की प्रचंड भगवत भक्ति प्रसिद्ध
है । इनकी महिमा ग्रन्थों में बहुत कुछ बर्नन की है । दो चमत्कार जो इस कड़ी में
लिखे हैं एक तो यह है कि जब नरसी जी दान देते देते कंगाल हो गये थे एक समय
साधुओं ने आकर इन को घेरा कि द्वारिका की यात्रा के लिये खर्च दो । नरसी जी
ने अपनी नादारी हजार कही पर जब साधुओं ने पिंड न छोड़ा तो हुण्डी द्वारिका को
भगवान के ऊपर साँवल साह के नाम से लिख दी । वहाँ ईश्वर ने आप साँवल साह
का रूप धर कर उनकी हुण्डी का दाम चुका दिया । दूसरे यह कि जब उनकी बड़ी बेटी
के लड़का हुआ अर्थात् नरसी जी के दोहता पैदा हुआ तो छठियारे के लिये कुछ न था
भगवान ने आप उस रसम को अदा किया ।
(२) तिरलोचन देव वैश्य कुल के भक्त थे इन को साधु सेवा में सहायता के
लिये एक नौकर की बड़ी खोज थी और मन का आदमी नहीं मिलता था आखिर
को भगवान तीन लोक के ठाकुर अर्थात् स्वामी नौकर का भेष धर आप इनकी
चाकरी में रहे ।
(३) बिशवंभर ।। (४) बिज्ञानी ।
(५) प्रह्लाद भक्त का पिता हिरण्य-कश्यप बड़ा ईश्वर-द्रोही था और अपने
बेटे को राम नाम लेने से रोकता था । इसी अकस से प्रह्लाद को सारे दंड चौरासी
के दिये, अर्थात् पहाड़ से गिराया, जंजीर से बाँधकर नदी में डलवाया, हाथी से
रुँदवाना चाहा, जमीन में गड़वाया, अंग में साँप लिपटवाया, तोप पर रक्खा, सिर
पर आरा फेरा, उलटा टाँग कर तीर चलाये, चिता बना कर जलवाया, (देखो होलिका
की कथा नोट पृष्ठ ५४ ), विष पिलाया और आखिर को खंभे से बाँध कर खङ्ग से
सिर काट डालना चाहा तब ईश्वर ने नरसिंह रूप धर कर हिरण्य-कश्यप का पेट नख
से फाड़ कर उसका बध किया । इस अवसर के भयानकपन को नीचे लिखे हुए दंडक
छंद में इस तरह लिखा है :-