गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ गरीबदास जी की बानी
कासीपुरी कबीर कमाल।
गैबी बालद लाइ रसाल१ ॥१३॥
दिया भंडारा जन रैदास।
कनक जनेऊ पद परकास२ ॥१४॥
संत की महिमा कही न जाय।
पीपा कूद परे दरियाय३ ॥१५॥
दास गरीब संत कूँ सेव।
चौरासी मिट गइ सुकदेव४ ॥१६॥
॥ पारख का अंग ॥
अनंत कोटि अवतार हैं नहिं चितवै बुध नास।
खालिक खेलै खलक में छः ऋतु बारस मास ॥ १ ॥
पीछे पीछे हरि फिरैं आगे संत सुजान।
संत करैं सोइ साँच है चारो जुग परमान ॥ २ ॥
साँई सरिखे साध हैं इन सम तुल नहिं और।
संत करैं सोइ होत है साहब अपनी ठौर ॥ ३ ॥
संतों कारन सब रचा सकल जमीं असमान।
चंद सूर पानी पवन जग तीरथ औ दान ॥ ४ ॥
ज्यूँ बच्छा गउ की नजर में यूँ साँईं औ संत।
हरि जन के पीछे फिरैं भक्त बछल भगवंत ॥ ५ ॥
धारा मेरे संत की मुझ से मिटै न अंस।
बुरी भली भाषै नहीं सोई हमारा बंस ॥ ६ ॥
संखौं जिव परलै करै संखौं उत्पति ख्याल।
ऐसे समरथ संत हैं एक खिसै५ नहिं बाल ॥ ७ ॥
(१) भगवंत ने कबीर की लाज रखने को बैलों अन्न उनके द्वारे पर पहुँचा दिया
[देखो नोट पृष्ठ २६] कमाल कबीर साहब के पुत्र और चेले थे। (२) देखो रैदास
जी की कथा, नोट पृष्ठ २८-२६। (३) देखो नोट पृष्ठ २७। (४) तोते की चौरासी छूट कर
शुकदेव जी का चोला पाने की कथा देखो नोट पृष्ठ ७८। (५) उखड़ै।