गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजरना का अंग ६७
जरना साहब संत है जरना सतगुरु साँच ।
जरना पाँचो तत्त है ऐसी जरना काँछ ॥४६॥
जरै सो अबिचल रहेगा जरै सो परलय नाहिं ।
जरना जोगी ना मरै आवागमन ना जाहि ॥४७॥
जरै सो निरगुन नूर है जरै सो निरगुन तंत ।
जरै सो साहब आप है जरै सो सत भगवंत ॥४८॥
ज्ञान जोग कूँ सब जरै जरै नाम निरधार ।
आठ सिद्ध नौ निद्ध कूँ जरना अधम उधार ॥४६॥
भक्ति मुक्ति कूँ सब जरै जरै जोग बैराग ।
आपा ठहरावै नहीं यह मत पूरन भाग ॥५०॥
दया धर्म को सब जरै जरै सील सन्तोष ।
मनी कुफर ब्यापै नहीं मिल पद रहै अजोख ॥५१॥
मुख से कहै सो सब जरै सरवन सुनै समोय ।
मन की धारन सब जरै सो जन निःचल होय ॥५२॥
चार मुक्ति जरना जरै बिहिस्त बैकुंठ बिलास ।
काया माया सब जरै सो साधू निज दास ॥५३॥
पुर पट्टन नगरी बसै भेद न काहू देत ।
कीड़ी कुंजर१ पोषता अपना नाम न लेत ॥५४॥
पुर पट्टन नगरी बसै निरधारं आधार ।
लख चौरासी पोषता ऐसी जरना सार ॥५५॥
चौरासी भाँड़े गढ़ै खेलै खेल अनंत ।
जाकी जरना देख कर जे कोइ साधै संत ॥५६॥
चौरासी भाँड़े गढ़ै खेलै खेल अपार ।
खान पान सब देत है ऐसा समरथ सार ॥५७॥
(१) चींटी से हाथी तक ।