गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिश्चय का अंग ७१
निःचय ही से गऊ जिआई निःचय बच्छा चूगै ।
देस दिसंतर भक्ति गई है फिर को लावै भूगै१ ॥ ६ ॥
गोपीचन्द भरथरी जोगी निःचय राज बिराजी२ ।
निःचय होय तो नेड़े निपजै क्या पंडित क्या काजी ॥७॥
निःचय सेऊ सीस चढ़ाया चोरी संत सिधारे ।
बनियाँ कूँ जहँ पकड़ लिया है करदे३ सीस उतारे४ ॥८॥
पिता समन और माता नेकी जिनके निःचय भारी ।
जहाँ कबीर कमाल फरीदा भोजन की भइ त्यारी४ ॥६॥
सेऊ के धड़ सीस चढ़ाया मीन मेख नहिं कोई ।
हाजिर नाजिर मिले बिसंभर ऐसा निःचय होई ॥१०॥
तपिया के तौ जकतक५ कीना लोदिया के घर आये ।
ताड़ी घाल लिये परमेसर निःचय हाथ बँधाये ॥११॥
निःचय ऊपर बालद आई और केसो बनजारा ।
नौलख बोरी लदा लदीना कासी नगर मँझारा६ ॥१२॥
निःचय पंडा पाव७ बुझाया जगन्नाथ के माहीं ।
अटका फूट पड़ा पाँवन पर अजहूँ बात न भाई ॥१३॥
(१) एक बार बादशाह ने उनको पकड़ बुलाया और कहा कि तुमने सिद्धाई का
ढचर फैला रक्खा है हमारी गाय मर गई है उसको जिला दो नहीं तो कतल कर डाले
जाओगे । नामदेवजी ने बहुत उजर किया कि मैं तो एक नीच छीपी हूँ मुझ में कोई गुन
नहीं है—पर बादशाह ने न माना आखिर को महात्मा जी ने भगवत चरन में बिनती
की और गाय जी उठी ।
एक बार घर में आग लगी तो नामदेवजी और सामान जो घर के बाहर रक्खा
हुआ था उसको भी आग में मालिक की मौज से उसका लगना समझ कर डालने लगे ।
भगवान ने उनका छप्पर का घर दूसरा बिचित्र रीति से आप रच दिया ।
(२) राजा भरथरी बड़े त्यागी और जोगी हुए और राजा गोपीचन्द उनके भांजे
उनके चेले बने । (३) छुरी से । (४) देखो नोट पृष्ठ १३ । (५) झगड़ा । (६) देखो
नोट पृष्ठ २६ । (७) पावक = आग [ जगन्नाथ जी के मन्दिर में आग लग जाने से
वहाँ का रसोइया जलने लगा कबीर साहब ने काशी में धरती पर पानी गिरा कर
आग बुझा दी ] ।