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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 186 में से

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पृष्ठ 89

साध महिमा का अंग ८१
कमल पत्र की बासना जाको कवन सरूप ।
महकै गंध अपार गति सँूघत बड़े बड़े भूप ॥२६॥
भूप संत साधु कहे जुगन जुगन के राव ।
सप्त पुरी नहिं बासना जिनके भक्ति पसाव१ ॥३०॥
मन मधुकैर काया केवड़ा महकत गंध अजोख ।
हूँट हाथ गढ़ अगम है रच राखे सब लोक ॥३१॥
स्वर्ग सलेमा२ बास है तिरबेनी के घाट ।
आगे अगम अगाध गति अवर नहाहीं आट३ ॥३२॥
संत सरोवर हंस हैं भच्छन करें बिचार ।
पुहुप बासना ज्यूँ रहैं राई रिंच न भार४ ॥३३॥
साध कमल मध बासना ऐसा हलका अंग ।
मैल मनोरथ ना रहै निरमल धारा गंग ॥३४॥
साध सँगत हरि भक्ति बिन कोई न पावै पार ।
निरमल आदि अनादि है गंदा सब संसार ॥३५॥
साध साध सब कोउ कहै साध सुमत सें जान ।
कुमत कमावे जीव है जैसे जल पाखान ॥३६॥
ज्यूँ जल में पाखान है भींजत नाहीं अंग ।
चकमक लागे अगिन है कहा करे सतसंग ॥३७॥
जहँ महिमा है साध की चरन कमल से हेत ।
जुगन जुगन उर में रखूँ ध्रू प्रहलाद सकेत ॥३८॥
साध संत के अैन५ में बसैं हुजूर अमान ।
जा घर निन्दा साध की सो घर डूबे जान ॥३६॥
लख छल छिद्दर मैं करूँ अपने संतों काज ।
हिरनाकुस ज्यूँ मारहूँ नरसिंघ धरहूँ साज६ ॥४०॥
(१) क़दर । (२) सुखाला । (३) पाँच तत्व और तीन गुन । (४) जैसे फूल में सुगंध जिसका रत्ती भर बोझ नहीं होता । (५) घर, आँख । (६) देखो नोट पृष्ठ ७३ ।