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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

७२ गरीबदास जी की बानी
कासी तज कर मगहर पहुँचे ऐसा निःचा कहिये।
सतगुरु साख समझ ले भाई थीर पकर थिर रहिये१ ॥१४॥
कासी मरे सो जाय मुक्ति कूँ मगहर गदहा होई।
पुरुष कबीर चले मगहर कूँ ऐसा निःचा जोई१ ॥१५॥
कासी के तो पंडित कूकैं मगहर मरो न भाई।
वा तौ पृथ्वी सूची नाहीं त्रिसंक पड़ो चिल्लाई१ ॥१६॥
कासी तज मगहर कूँ चाले किया कबीर पयाना।
चादर फूल बिछेही छाँड़े सब्दै सब्द समाना२ ॥१७॥
मगहर में तो कबर बनाई बिजलीखान पठाना।
कासी-चौरा उड़ गया भौंरा दूनों दीन दिवाना ॥१८॥
कनक जनेऊ कंध दिखाया है रैदास रँगीला।
धरे सातसै रूप तास कूँ ऐसी अद्भुत लीला३ ॥१६॥
पीपा तो दरिया में कूदे ऐसा निःचा कहिये।
मिले बिसम्भर नाथ तासु कूँ झूठी भक्ति न गहिये४ ॥२०॥
सेना के घर साहब आये करी हजामत सेवा।
संतों की तो सरधा राखी पारब्रह्म निज देवा५ ॥२१॥
(१) कबीर साहब काशी से जाकर मगहर में रहे थे और वहीं शरीर त्याग किया।
मगहर को मगह देस बोलते हैं और लोगों का विश्वास है कि वहाँ मरने से गधे की
जोनि मिलती है क्योंकि गुरुद्रोही राजा त्रिशंकु का शरीर जो अधर में लटक रहा है उसकी
छाया उस भूमि पर पड़ने से वह अपवित्र हो गई है।
(२) कबीर साहब के अंतकाल के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध है कि हिन्दुओं ने इनके
मृतक शरीर को जलाना और मुसलमानों ने गाड़ना चाहा इस पर बहुत झगड़ा हुआ
अंत को चादर उठा कर देखा तो मृतक स्थान पर शरीर नदारद था फूल और खाट पड़ी
थी (कितने खाट की जगह पान कहते हैं) तब हिन्दुओं ने फूल लेकर मगहर में उनकी
समाधि बनाई और मुसलमानों ने जिनमें कबीर साहब का जेठा चेला बिजलीखाँ पठान
प्रधान था कबर बनाई। काशी में उसी समय एक भौंरे के कहने से कबीर साहब के
गुरुमुख शिष्य धर्म्मदासजी ने कबीर-चौरा बनाया। (३) देखो नोट पृष्ठ २७। (४) देखो
नोट पृष्ठ २८। (५) देखो नाट पृष्ठ २७।