सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 186 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

८० गरीबदास जी की बानी
संत सलहली सेज के जिन में कैसी भिन्न ।
साहब साँईं ऊतरे नाम धराया जन्न१ ॥१८॥
संत सलहली सेज के जिन के कैसी भिन्न ।
साहब परगट संत हैं जिन का एकै मन्न ॥१९॥
मोड़ अमोड़ं मगन है हद बेहद में सैल ।
साहब साधू पाक है उपजी बाजी मैल ॥२०॥
माल मुलक सब घूर है बिन साँईं के नाह२ ।
दुनिया अलग बिजोग है साधू साहब माँह ॥२१॥
माल मुलक सब घूर है पाक परम गुरु संत ।
जिन सूँ साहब निकट है तिन में कैसा अंत ॥२२॥
जिन में नाहीं अंतरा अरस परस परवान ।
साहब साधू एक हैं दुनिया दूजी जान ॥२३॥
संत सामना संत में दुनिया है सो न्यार ।
जिन में दूजी भिन्न क्या राते सिरजनहार ॥२४॥
साध समुन्दर कमल गति माहें साँई गंध ।
जिन में दूजी भिन्न क्या सो साधू निरबंध ॥२५॥
कमल न डूबै जल चढ़ै माहें मधुकर३ बास ।
जैसे चन्द कमोदिनी यूँ साँई निज दास ॥२६॥
नौ नेजे जो जल चढ़ै कमल न भींजै गात ।
माहें ज्ञान सुगन्ध सर४ आदि अंत का साथ ॥२७॥
नौ नेजे जो जल चढ़ै बूँद न लागै पान ।
ऐसे साधू अगम गत संसारी परवान ॥२८॥
इसमें राजा को बाँई आँख से एक आँसू टपक पड़ा । इस पर बूढ़े ब्राह्मण बोले कि
यह दान अब अशुद्ध हो गया क्योंकि तुम रोये जो चिन्ह दुःख और खेद का है । राजा
ने उत्तर दिया कि ऐसा कदापि नहीं है वरन बाँईं आँख अपनी अभाग्यता पर शोक
करती है कि हमारी ओर का अंग साध सेवा में न लगा । इस पर श्रीकृष्ण ने प्रसन्न
होकर निज रूप से दर्शन दिया ।
(१) भक्त । (२) नेह । (३) भँवरा । (४) तालाब ।