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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

८२ गरीबदास जी की बानी
स्वर्ग पतालों सकल में है अनुरागी राम ।
नरसिंघ होकर अवतरे प्रहलाद भक्त के काम१ ॥४१॥
जहँ जन की महिमा सुनूँ तहँ मैं गमन करंत ।
वो तौ नगर अमान है जहँ मेरे प्यारे संत ॥४२॥
साध साध सब कोउ कहै साध समुन्दर तीर ।
अवगत की गत को लखै मिल गये नीर कबीर२ ॥४३॥
नीर कबीर निरंजनं अंजन धरे सदेस३ ।
अंजन मंजन माँजिये जब होवे परवेस ॥४४॥
साध कहावन कठिन है मग पर धरे न पाँव ।
सहँगी४ संगत है नहीं चढ़ो नाम की नाव ॥४५॥
साध कहाया जगत में परचे पड़े न प्रान ।
जग सोभा जब होयगी मिलै अलख निरबान ॥४६॥
सब्द मिलावा अंग रस परसन है दीदार ।
रोम रोम तारी लगै झिलमिल किरन अपार ॥४७॥
बरषे किरन अवरन गत रिमझिम रिमझिम रंग ।
जो देखै सोई कहै अरस परस परसंग ॥४८॥
संत सकल के मुकट हैं साँईं साध समान ।
बड़ भागी वे हंस हैं जिन संतों नाल पिछान ॥४६॥
॥ राग-धुनि ॥
आज मेरे आये सन्त सुजान ।
तन मन धन वारूँगी प्रान ॥ टेक ॥
चरन कमल रज डारूँ सीस ।
मानो आप मिले जगदीस ॥ १ ॥
(१) देखो नोट पृष्ठ ७३ । (२) कबीर साहब नौजनमतुआ बालक की दशा में
काशी के लहरतारा तालाब में बहते मिले थे [ देखो जीवन-चरित्र कबीर शब्दावली भाग
१ में ] । (३) निकट । (४) सस्ती, सहज ।