गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 186 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिश्चय का अंग ७५
सील सँतोष बिबेक बुध दया धर्म इक तार ।
बिन निःचै पावै नहीं साहब का दीदार ॥३७॥
सत बोलै साँची कहै दिल में परै न बाँक ।
मुसकी घोड़ा सेत होय अकल अकीनै झाँक ॥३८॥
निचै गोकुल गूजरी बिनही बेड़े पार ।
पाँडत के दिल दुई थी गुरवा रह गये वार१ ॥३६॥
ज्यों मीरा राठौर को राखी नहीं अधार ।
पकरचो लोहा ज्ञान को कोटों कटक सँघार ॥४०॥
मीरा हाथ सितार था पद गावै लौ लाय ।
पत्थर की थी पर्तिमा जा में गई समाय२ ॥४१॥
(१) श्रीकृष्ण का आज्ञा से गोपियाँ दुर्वासा ऋषि के लिये भोजन लेकर जमुना
पार गई थीं जब कि जमुना जी ने फट कर जाने का रास्ता दे दिया ।
(२) मीरा बाई मेरते के राजा की बेटी और.चित्तौड़ के राना की पतोहू थीं। इन
की अनुपम भक्ति संसार भर जानता है। देवी की पूजा करने से इनकार करने पर इन
को सास ने अपने घर से अलग दूसरे घर में रख दिया जहाँ वह बेरौंक टोक भगवत-भक्ति
और साध सेवा में रात दिन लगी रहती थीं। यह बात राना को न सुहाई खासकर
साधुओं की बेधड़क संगत करना । राना ने मीरा बाई को रोकने के लिये कोई जतन
उठा न रक्खा लेकिन जब कुछ बस न चला तो चरनामृत के नाम से घोर बिष का
प्याला उसको भेजा । मीरा बाई उसे सिर पर चढ़ा कर पी गई और कुछ असर न हुआ।
कहते हैं कि भगवान इनके साथ साक्षात बैठ कर चौसर खेलते थे । मीराबाई वृन्दावन
गईं और वहाँ जीव गोसाईं से मिलना चाहा । गोसाईं जी ने कहला भेजा कि हम
स्त्रियों से नहीं मिलते जिस पर मीराबाई ने जवाब दिया कि मैं तो वृन्दावन में सिवाय
श्रीकृष्ण के सब को सखी रूप जानती थी आज मालूम हुआ कि उनके और भी
पट्टीदार हैं। यह सुन कर गुसाईं जी अति लज्जित हुए और मीराबाई के दर्शन को आप
नंगे पाँव दौड़े आये । वृन्दावन से मीराबाई फिर चित्तौड़ लौटीं पर राना की बुद्धि
वैसी ही भ्रष्ट पाकर द्वारिका में जा बसीं । चित्तौड़ में मीराबाई के छोड़ते ही ऐसे उपद्रव
खड़े हुए कि राना डरा कि मीराबाई को दुख देने के कारन ईश्वर का कोप हुआ और
घबरा कर उनको बुलाने के लिये आदमी भेजे । जब वह न आईं तो कई ब्राह्मन भेजे
जो मीराबाई के द्वार पर धरना बैठे अंत को मीरा बाई रनछोड़ जी से बिदा होने को
उनके मंदिर में गईं और भक्तमाल में लिखा है कि मूर्ति के सम्मुख एक प्रेम का पद
जिसकी अन्तिम कड़ी यह है— 'मीरा के प्रभु गिरिधर नागर मिलि बिछुड़न नहिं कीजै”
गाया कि मूर्ति में समा कर लुप्त हो गईं और सिवाय इसके कि रनछोड़ जी की मूर्ति
पर पीताम्बर की जगह मीराबाई की सारी देख पड़ी और कोई चिन्ह उनका बाकी
न रहा।