गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपारख का अङ्ग ८५
गरजैं इन्द्र अनंत दल बहु बिध बरषा होय ।
संखों जिव परलै करें संखों उत्पति होय ॥ ८ ॥
इच्छा कर मारैं नहीं बिन इच्छा मर जाहिं ।
निःकामी निज संत हैं तहँ नहिं पाप लगाहिं ॥ ९ ॥
बरषैं तड़कैं डोब दें तारैं तीनों लोक ।
ऐसे हरिजन संत हैं सौदा रोकम रोक१ ॥१०॥
बहतर छोहन छै करी कुरुक्छत्तर देख२ ।
कपिल सँघारे सगर के पाप लगा नहिं एक३ ॥११॥
द्वादस कोट निनानबे गोरख जनक बिदेह ।
यूँ तारे यूँ डोब दे यामें नहीं संदेह ॥१२॥
सील माहिं सब लोक हैं ज्ञान ध्यान बैराग ।
जोग जग्य तप होम नेम गंगा गया पराग ॥१३॥
संतोष स्वर्ग पाताल सब और कहा मृत लोक ।
फिर पीछे कूँ क्या रहा जब आया संतोष ॥१४॥
बिबेक बिहंगम अचल है आया हिरदे माहिं ।
भक्ति मुक्ति औ ज्ञान गति फिर पीछे कुछ नाहिं ॥१५॥
दया सर्ब का मूल है छिमा छका जो होय ।
तिरलोकी कूँ तार दे नाम निरंजन गोय ॥१६॥
दस हजार रापत४ बली कामदेव महभंत ।
जा सिर अंकुस सील का तोरत गज के दंत ॥१७॥
क्रोध बली चंडाल है बल रापत द्वादस सहंस ।
एक पलक में डोब दे अनंत कोट जिव हंस ॥१८॥
(१) नकद, खरा । (२) कथा है कि कुरुक्षेत्र में महाभारत के संग्राम में बहत्तर
छोहनी दल जमा हुआ था जिन में से एक न बचा—एक छोहनी में दस हजार हाथी, तीस
हजार रथ, एक लाख मल्ल या पहलवान, दस लाख घोड़े, और छत्तीस करोड़ सिपाही
होना बतलाते हैं । (३) कपिलमुनि ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को जो उनसे
दुर्वचन बोले थे भस्म कर दिया । (४) हाथी ।
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